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Balrampur News: उम्मीद और आंसुओं के सहारे जी रहा राम बुझारत का परिवार
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बलरामपुर के गैड़ास बुजुर्ग में घर में बच्चे के साथ बैठी राम बुझारत की पत्नी ।-संवाद
गैड़ास बुजुर्ग। थाने के सामने आत्मदाह करने वाले राम बुझारत की तस्वीर अब भी घर की दीवार पर टंगी है। धुएं से पीली पड़ी फोटो के नीचे अगरबत्ती की राख और सूखी माला लटक रही है। घर की खामोशी दर्द बयां करती है। कभी अपनी फसल को खेतों में देख हंसने-गुनगुनाने वाले राम बुझारत अब नहीं हैं, लेकिन उनके परिवार का दर्द और संघर्ष बदस्तूर जारी है।
पत्नी कुसमा देवी अब भी हर सुबह पति की तस्वीर देखकर कहती हैं कि सरकार ने कहा था कि हमें मदद मिलेगी...पर अब तक कुछ नहीं हुआ। अनुसूचित गरीब परिवार की बात कौन सुनता है? कुसमा की आंखों में नमी और चेहरे पर चिंता की लकीरें बताती हैं कि तकलीफ शब्दों में बयां नहीं हो सकता। एक दरोगा की जिद ने कैसे पूरे परिवार को तबाह कर दिया, यह देखने और समझने के लिए जिम्मेदारों को राम बुझारत के घर आना होगा।
घर की टूटी हुई चारपाई पर मां के साथ बैठा दस साल का प्रियांशु अब भी पिता की राह देखता है। बड़ी बेटी ज्योति (15) बुआ के घर रहकर पढ़ाई कर रही है, जबकि हिमांशु (13) अपने मामा के यहां है। गरीबी, बेबसी और अनिश्चितता के बीच तीनों बच्चे एक साथ नहीं रह पाते। विडंबना है कि परिवार टुकड़ों में बांटा हुआ है।
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कुसमा बताती हैं कि घटना के बाद अधिकारी आए थे...फोटो खिंचावाया...कागजों पर हस्ताक्षर कराए और आश्वासन देकर चले गए। कहते थे कि सरकार सब देख लेगी, लेकिन अब तक सिर्फ 30 हजार रुपये मिले। मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चों को पढ़ने का मौका मिले।
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ग्रामीणों को आज भी याद है राम बुझारत की यादें
गांव के बुजुर्ग हरिराम यादव बताते हैं कि राम बुझारत सीधा-सादा आदमी था। उसने कई बार थाने जाकर बताया कि उसकी जमीन पर कब्जा हो रहा है, लेकिन पुलिस ने उल्टा डांट दिया। उसी दिन सब खत्म हो गया। राम बुझारत की मौत के बाद गांव में कुछ दिन तक हलचल रही, टीवी कैमरे आए, नेताओं ने संवेदना जताई, लेकिन जैसे ही खबर ठंडी पड़ी, परिवार फिर अकेला पड़ गया। अब न मीडिया आती है और न कोई अफसर ही यहां झांकता है। ग्रामीणों ने एक बार फिर जिला प्रशासन से अपील की है कि राम बुझारत के परिवार को आर्थिक सहायता, आवास और बच्चों की शिक्षा की गारंटी दी जाए।
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दरोगा पर कार्रवाई न होने से है लोगों में गुस्सा
थाने के सामने हुई आत्मदाह की घटना को एक साल से ज्यादा बीत चुका है। आरोपित दरोगा पवन कनौजिया के खिलाफ चार्जशीट दाखिल तो हो गई, लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई। इससे गांव के लोगों में भी रोष है। महिला रामप्यारी कहती हैं कि गरीब आदमी न्याय के लिए मर जाता है और कोई सुनवाई नहीं होती। अब राम बुझारत के घर में न बिजली है, न ढंग का चूल्हा। खेत भी विवादित हैं। मजदूरी का काम मुश्किल से मिलता है।
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पत्नी कुसमा देवी अब भी हर सुबह पति की तस्वीर देखकर कहती हैं कि सरकार ने कहा था कि हमें मदद मिलेगी...पर अब तक कुछ नहीं हुआ। अनुसूचित गरीब परिवार की बात कौन सुनता है? कुसमा की आंखों में नमी और चेहरे पर चिंता की लकीरें बताती हैं कि तकलीफ शब्दों में बयां नहीं हो सकता। एक दरोगा की जिद ने कैसे पूरे परिवार को तबाह कर दिया, यह देखने और समझने के लिए जिम्मेदारों को राम बुझारत के घर आना होगा।
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घर की टूटी हुई चारपाई पर मां के साथ बैठा दस साल का प्रियांशु अब भी पिता की राह देखता है। बड़ी बेटी ज्योति (15) बुआ के घर रहकर पढ़ाई कर रही है, जबकि हिमांशु (13) अपने मामा के यहां है। गरीबी, बेबसी और अनिश्चितता के बीच तीनों बच्चे एक साथ नहीं रह पाते। विडंबना है कि परिवार टुकड़ों में बांटा हुआ है।
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कुसमा बताती हैं कि घटना के बाद अधिकारी आए थे...फोटो खिंचावाया...कागजों पर हस्ताक्षर कराए और आश्वासन देकर चले गए। कहते थे कि सरकार सब देख लेगी, लेकिन अब तक सिर्फ 30 हजार रुपये मिले। मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चों को पढ़ने का मौका मिले।
ग्रामीणों को आज भी याद है राम बुझारत की यादें
गांव के बुजुर्ग हरिराम यादव बताते हैं कि राम बुझारत सीधा-सादा आदमी था। उसने कई बार थाने जाकर बताया कि उसकी जमीन पर कब्जा हो रहा है, लेकिन पुलिस ने उल्टा डांट दिया। उसी दिन सब खत्म हो गया। राम बुझारत की मौत के बाद गांव में कुछ दिन तक हलचल रही, टीवी कैमरे आए, नेताओं ने संवेदना जताई, लेकिन जैसे ही खबर ठंडी पड़ी, परिवार फिर अकेला पड़ गया। अब न मीडिया आती है और न कोई अफसर ही यहां झांकता है। ग्रामीणों ने एक बार फिर जिला प्रशासन से अपील की है कि राम बुझारत के परिवार को आर्थिक सहायता, आवास और बच्चों की शिक्षा की गारंटी दी जाए।
दरोगा पर कार्रवाई न होने से है लोगों में गुस्सा
थाने के सामने हुई आत्मदाह की घटना को एक साल से ज्यादा बीत चुका है। आरोपित दरोगा पवन कनौजिया के खिलाफ चार्जशीट दाखिल तो हो गई, लेकिन गिरफ्तारी नहीं हुई। इससे गांव के लोगों में भी रोष है। महिला रामप्यारी कहती हैं कि गरीब आदमी न्याय के लिए मर जाता है और कोई सुनवाई नहीं होती। अब राम बुझारत के घर में न बिजली है, न ढंग का चूल्हा। खेत भी विवादित हैं। मजदूरी का काम मुश्किल से मिलता है।