{"_id":"57152a5e4f1c1bf66e8b4a43","slug":"villagers-convey-on-cart-bridge","type":"story","status":"publish","title_hn":"लकड़ी का पुल बनाकर पार करते हैं नदी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लकड़ी का पुल बनाकर पार करते हैं नदी
बलिया, उत्तर प्रदेश
Updated Tue, 19 Apr 2016 12:11 AM IST
विज्ञापन
कोट मंझरिया स्थित मगई नदी पर बनाए गए बांस के पुल से बाइक और साइकल लेकर जाते गांव के लोग।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अंतिम छोर पर स्थित कोट मझरिया गांव आज भी उपेक्षा का दंश झेल रहा है। गांव में मगई नदी पर आज तक एक पुल का निर्माण नहीं कराया गया। इसके चलते दर्जनभर गांवों की 25 हजार की आबादी समाज की मुख्य धारा से कटी हुई है।
उपेक्षा का आलम यह है कि क्षेत्र के दर्जनभर गांव के लोग पिछले चार दशक से बांस व लकड़ी का पुल खुद ही बनाकर मगई नदी पार करते आ रहे हैं। सबसे ज्यादा खतरा बच्चे, बूढ़े व महिलाओं को रहता हैं। नदी पर पक्का पुल बनाने के लिए कई बार जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई इसके बावजूद किसी ने भी इस समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया।
ग्रामीणों की माने तो पिछले चार दशक से कोट मझरिया सहित दर्जनभर गांवों के लोग खुद ही मगई नदी पर पुल बनाकर आते-जाते हैं। इसके लिए लकड़ी व बांस की व्यवस्था खुद ग्रामीण ही करते हैं। पुल बनाने वाले मजदूर रास्ते से गुजरने वालों से मजदूरी के रूप में सब्जी, अनाज व दूध लेते हैं। बाढ़ प्रभावित यह इलाका यूपी के अंतिम छोर पर बसा है।
विज्ञापन
बाढ़ के दिनों में गंगा, तमसा व मगई नदी कहर बरपाती है। इन गांवों की सुरक्षा के लिए बैरिया-थम्हनपुरा टीएस बंधा बनाया गया है।
यह बंधा बाढ़ के पानी को भी रोकता है। इस बंधे के रास्ते भी कुछ लोग आते-जाते हैं, लेकिन यह रास्ता बहुत खराब हो चुका है। निकट के शाहपुर बभनौली, इच्छा चौबे के पुरा, मिल्की, पेढ़वा का मठिया, कोट अंजोरपुर, मझरिया, थम्हनपुरा, हसनपुरा, इंदरपुर, भिखारीपुर गांव के ज्यादातर लोग कम दूरी तय करने के चक्कर में लकड़ी का पुल पार करके ही आते-जाते हैं।
विकल्प के रूप से बैरिया-थम्हनपुरा मार्ग से भी कुछ लोगों का आना-जाना होता है, लेकिन दूरी अधिक होने के कारण ज्यादातर लोग एनएच-31 चांदनाला के पास से कच्चे रास्ते से ही आते-जाते हैं। उन्हें बांस व लकड़ी के पुल को ही पार करना होता है। यहां लोग अपना जान जोखिम में डालकर पुल को पार करते हैं। प्रतिवर्ष बरसात के समय यह पुल का अस्तित्व खत्म हो जाता है।
विज्ञापन
उपेक्षा का आलम यह है कि क्षेत्र के दर्जनभर गांव के लोग पिछले चार दशक से बांस व लकड़ी का पुल खुद ही बनाकर मगई नदी पार करते आ रहे हैं। सबसे ज्यादा खतरा बच्चे, बूढ़े व महिलाओं को रहता हैं। नदी पर पक्का पुल बनाने के लिए कई बार जनप्रतिनिधियों से गुहार लगाई गई इसके बावजूद किसी ने भी इस समस्या की ओर ध्यान नहीं दिया।
विज्ञापन
ग्रामीणों की माने तो पिछले चार दशक से कोट मझरिया सहित दर्जनभर गांवों के लोग खुद ही मगई नदी पर पुल बनाकर आते-जाते हैं। इसके लिए लकड़ी व बांस की व्यवस्था खुद ग्रामीण ही करते हैं। पुल बनाने वाले मजदूर रास्ते से गुजरने वालों से मजदूरी के रूप में सब्जी, अनाज व दूध लेते हैं। बाढ़ प्रभावित यह इलाका यूपी के अंतिम छोर पर बसा है।
विज्ञापन
बाढ़ के दिनों में गंगा, तमसा व मगई नदी कहर बरपाती है। इन गांवों की सुरक्षा के लिए बैरिया-थम्हनपुरा टीएस बंधा बनाया गया है।
यह बंधा बाढ़ के पानी को भी रोकता है। इस बंधे के रास्ते भी कुछ लोग आते-जाते हैं, लेकिन यह रास्ता बहुत खराब हो चुका है। निकट के शाहपुर बभनौली, इच्छा चौबे के पुरा, मिल्की, पेढ़वा का मठिया, कोट अंजोरपुर, मझरिया, थम्हनपुरा, हसनपुरा, इंदरपुर, भिखारीपुर गांव के ज्यादातर लोग कम दूरी तय करने के चक्कर में लकड़ी का पुल पार करके ही आते-जाते हैं।
विकल्प के रूप से बैरिया-थम्हनपुरा मार्ग से भी कुछ लोगों का आना-जाना होता है, लेकिन दूरी अधिक होने के कारण ज्यादातर लोग एनएच-31 चांदनाला के पास से कच्चे रास्ते से ही आते-जाते हैं। उन्हें बांस व लकड़ी के पुल को ही पार करना होता है। यहां लोग अपना जान जोखिम में डालकर पुल को पार करते हैं। प्रतिवर्ष बरसात के समय यह पुल का अस्तित्व खत्म हो जाता है।