{"_id":"670571d757c113e3b00c0025","slug":"village-milk-does-not-go-out-villagers-play-holi-of-ghee-ballia-news-c-190-1-svns1007-124394-2024-10-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Ballia News: बाहर नहीं जाता गांव का दूध, ग्रामीण खेलते हैं घी की होली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Ballia News: बाहर नहीं जाता गांव का दूध, ग्रामीण खेलते हैं घी की होली
विज्ञापन
हल्दी। एक ओर जहां देश के मंदिरों में प्रयोग किए जाने वाले घी में मिलावट को लेकर बहस छिड़ी है तो दूसरी ओर जिले के भरसौता गांव के लोग नवरात्र में अष्टमी-नवमीं की रात में गाय के घी से होली खेलते है। इसके लिए पांच से लेकर 21 किग्रा घी का ग्रामीणों द्वारा उपयोग किया जाता है। महंगाई के इस दौर में ग्रामीणों यह कृत्य चर्चा का केंद्र बना हुआ है। हालांकि इसके पीछे ग्रामवासी धार्मिक मान्यताओं के होने की बात करते है। लेकिन यह परंपरा वर्ष के दोनों नवरात्र में बदस्तूर रहती है।
परंपरा के अनुसार हर साल चैत्र व शारदीय नवरात्र में अष्टमी-नवमीं तिथि की मध्य रात्रि 12 बजे पूजा प्रारंभ होता है। इसमें वेद लक्षणा गाय के घी का इस्तेमाल होता है। ग्रामीणों द्वारा मन्नतें पूरी होने पर करीब पांच,11 और 21 किग्रा गाय का घी चढ़ाया जाता है। पुजारी की मौजूदगी में खौलते हुए घी को उपस्थित लोगों के ऊपर छिड़का जाता है और ग्रामीण घी की होली खेलते हैं।
इतना ही नहीं गांव के रहवासी गाय का दूध और उससे बने उत्पाद को बेचना तो दूर गांव की सीमा से बाहर भी नहीं ले जाते हैं। न ही अपने सगे संबंधियों को देते हैं। इसका अनुपालन गांव के सभी धर्म, वर्ग और जाति के लोग करते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि ऐसा करने से उनके अराध्य देव श्रीनरसिंह भगवान कुपित हो जाते हैं और लोगों को जन-धन की हानि झेलनी पड़ती है। भरसौंता गांव के 90 वर्षीय बैजनाथ सिंह व 70 वर्षीय बीरेंद्र सिंह व जलालुद्दीन खां बताते हैं कि ग्राम सभा के केवल हिंदू ही नहीं, मुस्लिम परिवार भी दूध और उससे बने उत्पाद नहीं बेचते हैं। इतना ही नहीं, ग्राम सभा के लोग गाय के दूध और उससे बना कोई भी उत्पाद गांव के मौजा से बाहर ले जाकर नहीं खा सकते हैं। संवाद
विज्ञापन
नहीं खाते लोग झूठी कसमें
ग्रामीणों के अनुसार, भरसौता गांव में बघेल वंश के राजपूत रहते हैं। ये श्रीनरसिंह भगवान को अपना अराध्य मानते हैं। लगभग 600 वर्ष पूर्व बसे इस गांव के मध्य में श्री नरसिंह भगवान का बिना प्रतिमा का एक मंदिर है, जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। इतना ही नहीं, लोग यहां झूठी कसमें खाने से कांपते हैं। ऐसी मान्यता है कि श्रीनरसिंह भगवान के दरबार में तुरंत न्याय मिलता है।
000
गांव का नाम बदलने का दिया था सुझाव
वर्ष 2020 में भरसौता आएं त्रिदंडी स्वामी के शिष्य लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने गांव का नाम बदल कर नृसिंह नगर करने का सुझाव दिया था। साथ मंदिर में एक सप्ताह तक स्वामी जी ने अपने शिष्य ब्रह्मचारी को पूजा अर्चना के लिए भेजा था। मैसूर के श्री लक्ष्मी नरसिंह भगवान के मंदिर के मुख्य पुजारी (मठाधीश) भी सितंबर 2022 में यहां आए थे, जो काफी देर तक पूजा करने के बाद गांव के बाहर विशाल मंदिर बनाने की बात कही थी।
000
13 बामर का मिला है आर्डर
गांव में वर्षों से मिट्टी का बर्तन बनाने वाले अमरनाथ प्रजापति ने बताया कि अब तक 13 बामर (घी रखने वाला पात्र) बनाने का आर्डर आ चुका है, जो बनकर तैयार भी हो गया है। एक बामर में पांच किलो घी रखा जाता है, यह गमला सरीखा होता है। बामर में सवा गज की बाती लगाई जाती है जो घी दान करने वाला ही लाता है।
विज्ञापन
परंपरा के अनुसार हर साल चैत्र व शारदीय नवरात्र में अष्टमी-नवमीं तिथि की मध्य रात्रि 12 बजे पूजा प्रारंभ होता है। इसमें वेद लक्षणा गाय के घी का इस्तेमाल होता है। ग्रामीणों द्वारा मन्नतें पूरी होने पर करीब पांच,11 और 21 किग्रा गाय का घी चढ़ाया जाता है। पुजारी की मौजूदगी में खौलते हुए घी को उपस्थित लोगों के ऊपर छिड़का जाता है और ग्रामीण घी की होली खेलते हैं।
विज्ञापन
इतना ही नहीं गांव के रहवासी गाय का दूध और उससे बने उत्पाद को बेचना तो दूर गांव की सीमा से बाहर भी नहीं ले जाते हैं। न ही अपने सगे संबंधियों को देते हैं। इसका अनुपालन गांव के सभी धर्म, वर्ग और जाति के लोग करते हैं। इसके पीछे मान्यता है कि ऐसा करने से उनके अराध्य देव श्रीनरसिंह भगवान कुपित हो जाते हैं और लोगों को जन-धन की हानि झेलनी पड़ती है। भरसौंता गांव के 90 वर्षीय बैजनाथ सिंह व 70 वर्षीय बीरेंद्र सिंह व जलालुद्दीन खां बताते हैं कि ग्राम सभा के केवल हिंदू ही नहीं, मुस्लिम परिवार भी दूध और उससे बने उत्पाद नहीं बेचते हैं। इतना ही नहीं, ग्राम सभा के लोग गाय के दूध और उससे बना कोई भी उत्पाद गांव के मौजा से बाहर ले जाकर नहीं खा सकते हैं। संवाद
विज्ञापन
नहीं खाते लोग झूठी कसमें
ग्रामीणों के अनुसार, भरसौता गांव में बघेल वंश के राजपूत रहते हैं। ये श्रीनरसिंह भगवान को अपना अराध्य मानते हैं। लगभग 600 वर्ष पूर्व बसे इस गांव के मध्य में श्री नरसिंह भगवान का बिना प्रतिमा का एक मंदिर है, जहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। इतना ही नहीं, लोग यहां झूठी कसमें खाने से कांपते हैं। ऐसी मान्यता है कि श्रीनरसिंह भगवान के दरबार में तुरंत न्याय मिलता है।
000
गांव का नाम बदलने का दिया था सुझाव
वर्ष 2020 में भरसौता आएं त्रिदंडी स्वामी के शिष्य लक्ष्मी प्रपन्न जीयर स्वामी ने गांव का नाम बदल कर नृसिंह नगर करने का सुझाव दिया था। साथ मंदिर में एक सप्ताह तक स्वामी जी ने अपने शिष्य ब्रह्मचारी को पूजा अर्चना के लिए भेजा था। मैसूर के श्री लक्ष्मी नरसिंह भगवान के मंदिर के मुख्य पुजारी (मठाधीश) भी सितंबर 2022 में यहां आए थे, जो काफी देर तक पूजा करने के बाद गांव के बाहर विशाल मंदिर बनाने की बात कही थी।
000
13 बामर का मिला है आर्डर
गांव में वर्षों से मिट्टी का बर्तन बनाने वाले अमरनाथ प्रजापति ने बताया कि अब तक 13 बामर (घी रखने वाला पात्र) बनाने का आर्डर आ चुका है, जो बनकर तैयार भी हो गया है। एक बामर में पांच किलो घी रखा जाता है, यह गमला सरीखा होता है। बामर में सवा गज की बाती लगाई जाती है जो घी दान करने वाला ही लाता है।