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Ballia News: सूर्य के राशि परिवर्तन के साथ गूंजने लगेगी शहनाई
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बलिया। लोक पर्व सतुआन आज, यानी मंगलवार को मनाया जाएगा। यह त्योहार सूर्य के राशि परिवर्तन के अवसर पर मनाया जाता है। मंगलवार की मध्याह्न 11 बजकर 45 मिनट पर भगवान सूर्य मीन राशि से मेष राशि में प्रवेश करेंगे।
ज्योतिषाचार्य डॉ. अखिलेश कुमार उपाध्याय ने बताया कि सूर्य के राशि परिवर्तन से चार घंटा पूर्व और चार बाद पुण्य काल माना जाएगा। प्रसाद के तौर पर सत्तू का सेवन और दान किया जाएगा। इस दौरान गंगा में डुबकी लगाकर भगवान सूर्य की आराधना करने तथा सत्तू व आम आदि सामग्रियों के दान का विधान है। इसलिए इसे सतुआ संक्रांति अथवा दिन मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। बताया कि सूर्य के मेष राशि में जाने के साथ ही एक माह से जारी खरमास का समाप्त हो जाएगा और शादी-विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे।
मान्यता के अनुसार इस दिन सत्तू को अपने इष्ट देवता को अर्पित किया जाता है और मिट्टी के बर्तन में पानी, गेहूं, जौ, मकई और चना का सत्तू रखा जाएगा। इसके साथ आम का टिकोरा भी रखा जाएगा और भगवान को भोग लगाया जाता है। साथ ही प्रसाद के तौर पर सत्तू का सेवन और सत्तू दान भी किया जाएगा। विष्णु स्मृति में मेष संक्रांति पर्व पर प्रातःस्नान महापातक के नाश करने वाला बताया गया है। साथ ही इस दिन धर्मघट का दान, पितरों का तर्पण व मधुसूदन भगवान के पूजन का विशेष महत्व भी है
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सत्तू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छोड़ा छाप, बनाना काफी आसान : संपूर्ण उत्तर भारत सहित देश के कई प्रदेशों में लोक पर्व लोग सत्तू का सेवन लोग करते है। भूने चने और जौ से बनाया यह एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसे बनाने में न चूल्हे की आवश्यकता होती है, न बर्तन का झंझट। अगर आपके पास सत्तू है तो उसे गमछा जैसे कपड़े पर भी पानी डालकर गूथ कर सेवन कर सकते हैं। डॉ. नवचंद्र तिवारी ने बताया कि लोग इसे खाद्य व पेय दोनों रूप में लेते हैं। गर्मी और लू के दौरान सत्तू का घोल रामबाण है। उत्तर प्रदेश सरकार ने वन डिस्ट्रिक्ट वन फूड (ओडीओएफ) के अंतर्गत अर्थात बलिया जिले के प्रमुख खाद्य पदार्थ के रूप में इसे मान्यता प्रदान की है। नई पीढ़ी मैगी को ही सबसे आसान खाद्य पदार्थ समझती है, परंतु सत्तू उससे भी सहज तथा जल्द तैयार होने वाला खाद्य पदार्थ है।
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ज्योतिषाचार्य डॉ. अखिलेश कुमार उपाध्याय ने बताया कि सूर्य के राशि परिवर्तन से चार घंटा पूर्व और चार बाद पुण्य काल माना जाएगा। प्रसाद के तौर पर सत्तू का सेवन और दान किया जाएगा। इस दौरान गंगा में डुबकी लगाकर भगवान सूर्य की आराधना करने तथा सत्तू व आम आदि सामग्रियों के दान का विधान है। इसलिए इसे सतुआ संक्रांति अथवा दिन मेष संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। बताया कि सूर्य के मेष राशि में जाने के साथ ही एक माह से जारी खरमास का समाप्त हो जाएगा और शादी-विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्य शुरू हो जाएंगे।
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मान्यता के अनुसार इस दिन सत्तू को अपने इष्ट देवता को अर्पित किया जाता है और मिट्टी के बर्तन में पानी, गेहूं, जौ, मकई और चना का सत्तू रखा जाएगा। इसके साथ आम का टिकोरा भी रखा जाएगा और भगवान को भोग लगाया जाता है। साथ ही प्रसाद के तौर पर सत्तू का सेवन और सत्तू दान भी किया जाएगा। विष्णु स्मृति में मेष संक्रांति पर्व पर प्रातःस्नान महापातक के नाश करने वाला बताया गया है। साथ ही इस दिन धर्मघट का दान, पितरों का तर्पण व मधुसूदन भगवान के पूजन का विशेष महत्व भी है
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सत्तू ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छोड़ा छाप, बनाना काफी आसान : संपूर्ण उत्तर भारत सहित देश के कई प्रदेशों में लोक पर्व लोग सत्तू का सेवन लोग करते है। भूने चने और जौ से बनाया यह एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसे बनाने में न चूल्हे की आवश्यकता होती है, न बर्तन का झंझट। अगर आपके पास सत्तू है तो उसे गमछा जैसे कपड़े पर भी पानी डालकर गूथ कर सेवन कर सकते हैं। डॉ. नवचंद्र तिवारी ने बताया कि लोग इसे खाद्य व पेय दोनों रूप में लेते हैं। गर्मी और लू के दौरान सत्तू का घोल रामबाण है। उत्तर प्रदेश सरकार ने वन डिस्ट्रिक्ट वन फूड (ओडीओएफ) के अंतर्गत अर्थात बलिया जिले के प्रमुख खाद्य पदार्थ के रूप में इसे मान्यता प्रदान की है। नई पीढ़ी मैगी को ही सबसे आसान खाद्य पदार्थ समझती है, परंतु सत्तू उससे भी सहज तथा जल्द तैयार होने वाला खाद्य पदार्थ है।