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Ballia News: 34 वर्ग किमी में फैले सुरहाताल को ईको पर्यटन क्षेत्र बनाने के लिए मिले थे 8 करोड़

Sun, 07 Jun 2026 01:17 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 07 Jun 2026 01:17 AM IST
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Surhatal, spread over 34 sq km, received Rs 8 crore to develop it into an eco-tourism zone.
सुरहाताल पंक्षी विहार ​स्थित पानी में तैरती पंक्षी।फाइल फोटो
बलिया। मैरीटार गांव के सामने 34 वर्ग किलोमीटर (किमी) में फैले सुरहाताल को ईको पर्यटन के रूप में विकसित करने के लिए दो साल पहले आठ करोड़ से दो परियोजनाएं शुरू हुईं। हालांकि यह परियाजनाएं बीच में ही अटक गईं।
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इसे गोखुर झील भी कहा जाता है। यह ताल गंगा और सरयू नदियों के दोआब क्षेत्र में स्थित है और गंगा नदी द्वारा निर्मित एक प्राकृतिक झील है। 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के प्रयास से पक्षी विहार अभयराण्य के रूप में ताल को पहचान दिलाई थी। अब पर्यावरण दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुरहा ताल को देश का 100वां और उत्तर-प्रदेश का 13वां ''रामसर साइट'' घोषित किया है। इससे बलियावासियाें में खुशी है।
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रामसर कन्वेंशन दो फरवरी 1971 को आर्द्रभूमि के संरक्षण के उद्देश्य से शुरू किया गया था, जिससे वर्तमान में दुनिया के 170 से ज्यादा देश जुड़े हैं और वैश्विक स्तर पर 2100 से अधिक वेटलैंड सूचीबद्ध हैं। भारत से अब तक 100 वेटलैंड सूची में शामिल हो चुके हैं, जिनमें अब बलिया का ''सुरहा ताल'' (जय प्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य) भी शामिल हो गया है।
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सुरहा ताल लगभग 34 वर्ग किलोमीटर (किमी) क्षेत्र में फैला हुआ है, जो बरसात में बढ़कर 42 वर्ग किलोमीटर तक हो जाता है। यह वर्षभर जलयुक्त रहने वाला क्षेत्र है, जो क्षेत्रीय जलचक्र को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाता है। इस उपलब्धि से बलिया जिले को न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मानचित्र पर नई पहचान मिली है।
2022-23 में सुरहाताल को विकसित कर उसे पर्यटन के रूप में स्थापित करने एवं इसके सुरक्षा एवं संरक्षा के लिए बलिया की पूर्व जिलाधिकारी सौम्या अग्रवाल ने विशेष रुचि दिखाई थी। उनके प्रयास से सुरहा ताल महोत्सव का भी आयोजन हुआ। इस आयोजन में सुरहाताल को पर्यटन के रूप बढ़ाव देने एवं पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए नौका विहार का भी आयोजन किया गया था लेकिन बाद में नौकायन बंद हो गया।
राज्य परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह एवं वर्तमान जिलाधिकारी भवानी प्रसाद सिंह द्वारा भी सुरहा ताल एवं उससे जुड़े कटहल नाला के विकास हेतु एवं पर्यटन को बढ़ावा देने हेतु भरपूर प्रयास किया जा रहा है।
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जैव विविधता में समृद्ध है
जिला गंगा समिति के सदस्य डाॅ. गणेश पाठक ने कहा कि बलिया में जय प्रकाश नारायण पक्षी अभयारण्य (सुरहाताल) को भारत के 100वें रामसर स्थल के रूप में नामित किया गया है। यह आर्द्रभूमि जैव विविधता में समृद्ध है, जो कई प्रवासी और निवासी पक्षियों को आकर्षित करती है। हमारे प्राकृतिक परिवेश और आर्द्रभूमि की रक्षा के लिए भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता इस उपलब्धि में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।
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सुरहा ताल की खासियत
सितंबर-अक्तूबर में आते हैं साइबेरियन पक्षी
सुरहाताल के चतुर्दिक विभिन्न प्रकार के स्थलीय वन- वृक्ष एवं झाड़ियां भी पाई जाती हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण सुरहा ताल परिक्षेत्र को पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के प्रयास से ''पक्षी विहार अभयारण्य के रूप में पहचान दिलाई गई। इसके बाद जलवायु परिवर्तन एवं वन विभाग मंत्रालय की ओर से सुरहा ताल के महत्व एवं इसके अस्तित्व पर उमड़ रहे खतरों को देखते हुए सुरहा ताल परिक्षेत्र को संवेदनशील क्षेत्र ( सेंसेटिव जोन ) घोषित किया गया । सुरहाताल जैव विविधताओं से परिपूर्ण है। इसमें विभिन्न प्रजातियों की मछलियों सहित अनेक तरह के जलीय जीव और वनस्पतियां भी मिलती हैं। साइबेरियन पक्षी भी यहां आते हैं। सितंबर-अक्तूबर तक साइबेरियन पक्षियों के कलरव से सुरहा ताल गुंजायमान रहता है।

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धान, सिंघाड़ा, कमल-पुष्प एवं कुमुदिनी के पुष्प मशहूर

सुरहा ताल अपनी जलीय कृषि के लिए भी प्रसिद्ध है। इस ताल में एक विशेष प्रकार का धान, सिंघाड़ा, कमल-पुष्प एवं कुमुदिनी के पुष्प होते हैं। धान की विशेषता है कि जल का स्तर जितना ऊपर बढ़ता है, धान का पौधा तत्काल बढ़कर जल के ऊपर आ जाता है। इस धान का चावल अत्यन्त स्वादिष्ट एवं सुपाच्य होता है। इस चावल को शुगर के रोगी भी खा सकते हैं। कमल पुष्प के पौधे से अनेक प्रकार के सुपाच्य आहार भी प्राप्त होते हैं। इस ताल की मिटृटी इतनी उपजाऊ होती है कि प्रयोग खाद के रूप में किया जा सकता है।
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