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गोली चलती रही लेकिन क्रांतिकारियों ने फहराया तिरंगा, थाने में शहीद हो गए 17 क्रांतिकारी

Mon, 17 Aug 2020 11:21 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Mon, 17 Aug 2020 11:21 PM IST
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Shooting continued but revolutionaries hoisted the tricolor, 17 revolutionaries were martyred in the police station
बैरिया। आज ही के दिन 18 अगस्त 1942 को बैरिया थाने पर तिरंगा फहराने में 17 क्रांतिकारियों ने सीने पर गोली खाई थी। इतनी बड़ी तादाद में साथियों को खोने के बाद भी आजादी के दीवानों का कारवां रुका नहीं और वे तभी रुके जब थाने की मुंडेर पर तिरंगा लहराने लगा। इसके बाद जेल में अंग्रेजों के दमनकारी बर्ताव ने तीन क्रांतिकारियों की जेल में जान ली थी।
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जिले में कई दिनों से चल रहे अगस्त क्रांति का असर हरेक नागरिक पर हो चला था, जो जहां था वहीं से अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करने के लिए कमर कस चुका था। एक दिन पहले बांसडीह में क्रांतिकारियों को मिली विजय से आम लोगों के हौसले बुलंद थे। भयभीत जिला प्रशासन को जान बचाने के लिए भी जुगत लगानी पड़ रही थी। जिले भर के रेलवे स्टेशन फूंक दिए गए थे और रेल पटरियों को उखाड़ दिया गया था। दो दिन पहले बैरिया में भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह के साथ हजारों की भीड़ के आगे थानेदार काजिम ने खुद ही थाने पर तिरंगा फहराया था और थाना खाली करने के लिए क्रांतिकारियों से दो दिन की मोहलत मांगी थी। लेकिन बाद में उसने उसी दिन रात में जिला मुख्यालय से पांच सशस्त्र पुलिसकर्मियों को बुला लिया था और रात में तिरंगे को उतारकर फेंकवा दिया। इसकी भनक लगते ही क्रांतिकारियों ने थानेदार से बदला लेने के लिए 18 अगस्त का दिन तय किया । दोपहर होते-होते 25 हजार से अधिक की भीड़ ने थाने को घेर लिया। महिलाओं के जत्थे की अगुवाई धनेश्वरी देवी, तेतरी देवी, रामझरिया देवी कर रही थीं। भूपनारायण सिंह, सुदर्शन सिंह, परशुराम सिंह, बलदेव सिंह, हरदेव सिंह, राजकिशोर सिंह, बैजनाथ साह, राजकुमार मिश्र आदि भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। थाने पर बढ़ती भीड़ को देख थानेदार ने थाने की छत पर सिपाहियों संग पहुंच कर मोर्चा संभाल लिया। आजादी के दीवानों का जत्था चला तो थानेदार ने धमकी दी, डराने का प्रयास किया, फिर तिरंगा दूसरी बार लहराने की बात भी कही, लेकिन क्रांतिकारी धोखेबाज थानेदार पर विश्वास नहीं कर रहे थे। इसी बीच कुछ लोग बगल से थाने में घुस गए और थाने के घोड़े को खोलकर अस्तबल ढहा दिया। साथ ही सैकड़ों की भीड़ थाने में घुस गई। यह देख पुलिस ने गोली चलानी शुरू की तो क्रांतिकारियों ने भी पथराव शुरू कर दिया। कौशल कुमार छलांग लगाकर तिरंगा लिए थाने की छत पर पहुंच गए और उसे फहरा दिया, लेकिन पुलिस ने गोली मार दी, वे शहीद होकर नीचे गिर पड़े। शाम तक चले इस संघर्ष में 17 लोग थाना परिसर में ही शहीद हो गए, लेकिन भीड़ जमी रही। कारतूस खत्म होने के कारण थानेदार और सिपाही जिस ओर क्रांतिकारी नहीं थे उस ओर से भाग खड़े हुए। शहीद होने वालों में गोन्हिया छपरा निवासी निर्भय कुमार सिंह, देवबसन कोइरी, विशुनपुरा निवासी नरसिंह राय, तिवारी के मिल्की निवासी रामजनम गोंड, चांदपुर निवासी रामप्रसाद उपाध्याय, टोलागुदरीराय निवासी मैनेजर सिंह, नारायणगढ़ निवासी कौशिला कुमार सिंह, सोनबरसा निवासी रामदेव कुम्हार, बैरिया निवासी रामबृक्ष राय, रामनगीना सोनार, छठू कमकर, देवकी सोनार, शुभनथही निवासी धर्मदेव मिश्र, मुरारपट्टी निवासी श्रीराम तिवारी, बहुआरा निवासी मुक्तिनाथ तिवारी, श्रीपालपुर निवासी विक्रम सोनार, भगवानपुर निवासी भीम अहीर शामिल थे। दयाछपरा निवासी गदाधर नाथ पांडेय, मधुबनी निवासी गौरीशंकर राय, गंगापुर निवासी रामरेखा शर्मा सहित तीन लोग जेल यातना में शहीद हो गए। इसके अलावा भी कई क्रांतिकारियों को जेल की काल कोठरी में डाल दिया गया, जिसका नाम तक प्रकाश में नहीं आ सका।
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