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समा गई निशानियां, पर बिखरीं है हर ओर यादें
ब्यूरो,अमर उजाला,बलिया
Updated Thu, 07 Jul 2016 10:24 PM IST
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छात्र जीवन से लेकर युवा तुर्क बनने तक पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर जी का विशेष लगाव बलिया जिले के शाहपुर बभनौली गांव से बना रहा। यहां अक्सर स्वामी ओमकारानंद के निवास पर समय बीताते थे और दर्जनों की संख्या में अपने करीबियों के संग एक साथ बैठकर बाटी-चोखा खाते थे। उसी दौरान राजनीति की भी चर्चा होती थी।
हालांकि गंगा कटान में वह स्थान आज नदी में विलीन हो चुका है। फिर भी लोग आज भी उन दिनों को याद करते हैं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व आजीवन ग्राम प्रधान रहे स्वामी ओमकारानंद चिंतक भी थे। जिनसे चंद्रशेखर जी राजनीति का ककहरा सीखा। यही वजह रही कि आजादी के बाद जिले में पहला पुस्तकालय शाहपुर बभनौली गांव में खोला गया।
यहां चंद्रशेखर जी आकर राजनीति के किताबों से सीख लेते थे। पूर्व प्रधान मोतीलाल यादव कहते हैं कि चंद्रशेखर जी की शाहपुर बभनौली से इतनी यादें जुड़ी हैं आज भी गांव के लोगों में आम चर्चा के दौरान उनका जिक्र आ ही जाता है। रामजी पांडेय का कहना है कि जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री बने तो हम गांववासी के खुशी का ठिकाना नहीं था। गंगा भले शाहपुर बभनौली की उन निशानियों लेकर चली गई पर उनकी यादें आज भी फिजाओं में हर ओर बिखरीं हैं।
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हालांकि गंगा कटान में वह स्थान आज नदी में विलीन हो चुका है। फिर भी लोग आज भी उन दिनों को याद करते हैं। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व आजीवन ग्राम प्रधान रहे स्वामी ओमकारानंद चिंतक भी थे। जिनसे चंद्रशेखर जी राजनीति का ककहरा सीखा। यही वजह रही कि आजादी के बाद जिले में पहला पुस्तकालय शाहपुर बभनौली गांव में खोला गया।
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यहां चंद्रशेखर जी आकर राजनीति के किताबों से सीख लेते थे। पूर्व प्रधान मोतीलाल यादव कहते हैं कि चंद्रशेखर जी की शाहपुर बभनौली से इतनी यादें जुड़ी हैं आज भी गांव के लोगों में आम चर्चा के दौरान उनका जिक्र आ ही जाता है। रामजी पांडेय का कहना है कि जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री बने तो हम गांववासी के खुशी का ठिकाना नहीं था। गंगा भले शाहपुर बभनौली की उन निशानियों लेकर चली गई पर उनकी यादें आज भी फिजाओं में हर ओर बिखरीं हैं।
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