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कौड़ी के भाव साइकिल व मोबाइल बेच कर पैदल चल पड़े गांव के लिए
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मजबूर हैं क्योंकि हम मजदूर हैं। पैदल चलते एनएच 31 स्थित रामगढ़ ढाले से गुजरते मजदूर।
- फोटो : BALLIA
रामगढ़। पंजाब में फैक्ट्री बंद होने के बाद पगार नहीं मिली। दाने-दाने को मोहताज हो गए। ऐसे में साइकिल और मोबाइल औने-पौने दाम पर बेच कर रुपये एकत्रित किए और गांव के लिए चल पड़े। यह कहना है बिहार के खगड़िया और छपरा निवासी आठ मजदूरों का। सभी लुधियाना से चलकर 21वें दिन सोमवार को रामगढ़ बाजार पहुंचे थे।
आठों मजदूरों ने बताया कि लुधियाना में की ऊनी कपड़े की फैक्ट्री में वे सात वर्षों से काम कर रहे थे। बताया कि ऊनी स्वेटर का एक बड़ा आउटलेट था और बाद में मालिक ने खुद का प्रोडक्शन शुरू करवाया। हम सबको काम सिखाकर कारीगर के रूप में फैक्ट्री के अंदर काम दी। छोटे आउटलेट से फैक्ट्री तक का सफर तय करने में हम मजदूरों ने दिन रात मेहनत की। हम सभी कारखाने के अस्थायी निवास में रहते थे। लॉकडाउन तीसरे चरण की शुरुआत तक फैक्ट्री का मालिक हमे रोज भोजन देता रहा लेकिन बाद में मालिक ने असमर्थता जताते हुए खुद खाने का प्रबंध करने की बात कही। कुछ दिन निजी बचत से जैसे-तैसे जीवनयापन हुआ। फैक्ट्री के मालिक ने तीन माह का मानदेय नहीं दिया तो स्थिति खराब हो गई। भोजन के लाले पड़ गए। इसके बाद साइकिल, मोबाइल आदि सामान बेचकर रुपये एकत्रित किया और लुधियाना से पैदल अपने घर को चल पड़े। बताया कि लुधियाना से अम्बाला तक पैदल आते वक्त एक ट्रक मिल गया जिससे मुरादाबाद तक आए। इसके बाद रास्ते में बिस्कुट, चुड़ा-गुड़ खाकर जहां तहां विश्राम करते पैदल ही चलते गए। मजदूरों ने कहा कि अब वे गांव में ही मजदूरी कर परिवार की जीविका चलाएंगे। पंजाब कमाने के लिए नहीं जाएंगे।
हाय रे कोरोना, अपने भी कर रहे अजनवी सा व्यवहार
रामगढ़। रायपुर से गांव लौटने के बाद क्वारंटीन युवक ने बताया कि कोरोना के चलते अपने भी गैरों जैसा व्यवहार कर रहे हैं। वह रायपुर में निजी कंपनी में काम करता था। 19 दिनों तक पैदल चलकर गांव पहुंचा था। उसे घर से नहीं निकलने दिया जाता है। परिवार के लोग करीब नहीं आते हैं। कभी अगर पेड़ के नीचे बैठ गया तो परिवार के लोग नजरें चुराकर दूर चले जाते हैं।
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आठों मजदूरों ने बताया कि लुधियाना में की ऊनी कपड़े की फैक्ट्री में वे सात वर्षों से काम कर रहे थे। बताया कि ऊनी स्वेटर का एक बड़ा आउटलेट था और बाद में मालिक ने खुद का प्रोडक्शन शुरू करवाया। हम सबको काम सिखाकर कारीगर के रूप में फैक्ट्री के अंदर काम दी। छोटे आउटलेट से फैक्ट्री तक का सफर तय करने में हम मजदूरों ने दिन रात मेहनत की। हम सभी कारखाने के अस्थायी निवास में रहते थे। लॉकडाउन तीसरे चरण की शुरुआत तक फैक्ट्री का मालिक हमे रोज भोजन देता रहा लेकिन बाद में मालिक ने असमर्थता जताते हुए खुद खाने का प्रबंध करने की बात कही। कुछ दिन निजी बचत से जैसे-तैसे जीवनयापन हुआ। फैक्ट्री के मालिक ने तीन माह का मानदेय नहीं दिया तो स्थिति खराब हो गई। भोजन के लाले पड़ गए। इसके बाद साइकिल, मोबाइल आदि सामान बेचकर रुपये एकत्रित किया और लुधियाना से पैदल अपने घर को चल पड़े। बताया कि लुधियाना से अम्बाला तक पैदल आते वक्त एक ट्रक मिल गया जिससे मुरादाबाद तक आए। इसके बाद रास्ते में बिस्कुट, चुड़ा-गुड़ खाकर जहां तहां विश्राम करते पैदल ही चलते गए। मजदूरों ने कहा कि अब वे गांव में ही मजदूरी कर परिवार की जीविका चलाएंगे। पंजाब कमाने के लिए नहीं जाएंगे।
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