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प्रेमचंद ने नारी की पीड़ा को किया रेखांकित
अमर उजाला ब्यूरोः बलिया
Updated Sun, 31 Jul 2016 10:13 PM IST
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अपरमिता संस्था की आेर से आयोजित मुंशी प्रेमचंद जयंती पर उनके चित्र के समक्ष दीप जलाते वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. जनार्दन राय।
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प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री, त्याग, क्षमा, दया और सील की प्रतिमूर्ति है। स्त्रियों के उच्च आदर्श को प्रेमचंद्र ने अपने साहित्य में स्थापित किया है। ये बातें जनपद के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जर्नादन राय ने प्रेमचंद साहित्य में स्त्री विषय पर आयोजित गोष्ठी को संबोधित करते हुए कही। वे संस्था अपरमिता द्वारा सतनी सराय स्थित कैंप कार्यालय पर आयोजित प्रेमचंद्र की जयंती गोष्ठी में बोल रहे थे।
कहा कि प्रेमचंद अपने साहित्य में दलितों, किसानों, मजदूरों के अलावा स्त्रियों की आवाज को बुलंद किया। गोष्ठी का शुभारंभ वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जनार्दन राय ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। संस्था के सचिव सुनीता पाठक ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री संघर्षों की गाथा सुनाई जाती है। उन्होंने अपने अधिकांश लेखों में दलित, किसान, मजदूृर के अलावा स्त्रियों की व्यथा को शब्दों पिरोया है। मुंशी प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू का अधिक ज्ञान था। उन्होंने सामंतवाद का मुखर विरोध किया। मुंशी प्रेमचंद जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वाले साहित्यकार थे। इस मौके पर शैलेंद्र मिश्र, भोला प्रसाद आग्नेय, शशि प्रेमदेव अमित पांडेय, हिमांशु गुप्ता, राजू पांडेय, नेहा पाठक, राजकुमार मिश्र, सोनू, निलम गुप्ता, नीतू, अंकुर गुप्ता, डा. इफ्तेखार खां आदि मौजूद रहे। संकल्प संस्था की तरफ से अमृतपाली स्थित अमृत पब्लिक स्कूल में आयोजित गोष्ठी का शुभारंभ डॉ. जर्नादन राय ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
युवा साहित्यकार रामजी तिवारी ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री संघर्ष करती है। उन्होंने गोदान के धनिया का उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार वह मुखर होकर समाज के सवालों से टकराती है वह उसकी संघर्ष को प्रदर्शित करता है। साहित्यकार डॉ. अर्चना श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद के विचारों और व्यवहारों में समानता थी।
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उन्होंने साहित्य लिखने से ज्यादा साहित्य को लिखा है। युवा साहित्यकार अमित मिश्र ने कहा कि साहित्य में यथार्थ को सबसे पहले प्रेमचंद्र ने स्थापित किया। सौरभ चतुर्वेदी ने प्रेमचंद को स्त्री विमर्श को उकेरने वाला बड़ा लेखक बताया। डॉ. भोला प्रसाद अग्रेय ने प्रेमचंद्र को धरातल का लेखक बताया। युवा रंगकर्मी आशीष त्रिवेदी ने कहा कि प्रेमचंद हमें जीवन जीने का तरीका बताया है। डॉ. राजेंद्र भारती, कृति नारायण दास, सालिनी श्रीवास्तव, डा. उर्मिला शुक्ला, डा. प्रिया सिंह, संजय मौर्य आदि मौजूद रहे।
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कहा कि प्रेमचंद अपने साहित्य में दलितों, किसानों, मजदूरों के अलावा स्त्रियों की आवाज को बुलंद किया। गोष्ठी का शुभारंभ वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जनार्दन राय ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया। संस्था के सचिव सुनीता पाठक ने कहा कि प्रेमचंद की रचनाओं में स्त्री संघर्षों की गाथा सुनाई जाती है। उन्होंने अपने अधिकांश लेखों में दलित, किसान, मजदूृर के अलावा स्त्रियों की व्यथा को शब्दों पिरोया है। मुंशी प्रेमचंद को हिंदी और उर्दू का अधिक ज्ञान था। उन्होंने सामंतवाद का मुखर विरोध किया। मुंशी प्रेमचंद जुल्म के खिलाफ आवाज उठाने वाले साहित्यकार थे। इस मौके पर शैलेंद्र मिश्र, भोला प्रसाद आग्नेय, शशि प्रेमदेव अमित पांडेय, हिमांशु गुप्ता, राजू पांडेय, नेहा पाठक, राजकुमार मिश्र, सोनू, निलम गुप्ता, नीतू, अंकुर गुप्ता, डा. इफ्तेखार खां आदि मौजूद रहे। संकल्प संस्था की तरफ से अमृतपाली स्थित अमृत पब्लिक स्कूल में आयोजित गोष्ठी का शुभारंभ डॉ. जर्नादन राय ने दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
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युवा साहित्यकार रामजी तिवारी ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में स्त्री संघर्ष करती है। उन्होंने गोदान के धनिया का उदाहरण देते हुए बताया कि जिस प्रकार वह मुखर होकर समाज के सवालों से टकराती है वह उसकी संघर्ष को प्रदर्शित करता है। साहित्यकार डॉ. अर्चना श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद के विचारों और व्यवहारों में समानता थी।
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उन्होंने साहित्य लिखने से ज्यादा साहित्य को लिखा है। युवा साहित्यकार अमित मिश्र ने कहा कि साहित्य में यथार्थ को सबसे पहले प्रेमचंद्र ने स्थापित किया। सौरभ चतुर्वेदी ने प्रेमचंद को स्त्री विमर्श को उकेरने वाला बड़ा लेखक बताया। डॉ. भोला प्रसाद अग्रेय ने प्रेमचंद्र को धरातल का लेखक बताया। युवा रंगकर्मी आशीष त्रिवेदी ने कहा कि प्रेमचंद हमें जीवन जीने का तरीका बताया है। डॉ. राजेंद्र भारती, कृति नारायण दास, सालिनी श्रीवास्तव, डा. उर्मिला शुक्ला, डा. प्रिया सिंह, संजय मौर्य आदि मौजूद रहे।