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Ballia News: 30 सितंबर से होगी पितृपक्ष की शुरुआत
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मऊ। आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तिथि तक मनाए जाने वाले पितृपक्ष की शुरुआत 30 सितंबर से होगी। समापन 14 अक्तूबर को होगा। मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितरों का श्राद्ध करना आत्मशांति और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे उत्तम प्रयोजन है। ऐसा करना बेहद शुभ और उत्तम फलदायी होता है।
मुहम्मदाबाद गोहना कस्बा निवासी पं. विरेंद्र शुक्ल के मुताबिक, भाद्रपद मास की पूर्णिमा शुक्रवार यानि 29 सितंबर को अपराह्न 4.02 बजे तक रहेगी। उदया तिथि से शनिवार यानि 30 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू होगा। खुशहाल और संपन्न जीवन व्यतीत करने के लिए बेहद आवश्यक होता है कि पितरों का आशीर्वाद बना रहे। यदि किसी गलती की वजह से पितृ हमसे नाराज हो जाएं तो इससे व्यक्ति के जीवन में पितृदोष जैसा बड़ा दोष लग जाता है। ऐसे में पितृपक्ष का यह समय पितृदोष जैसे गंभीर दोष से छुटकारा पाने और पितरों की आत्मा की शांति के लिए बेहद ही फलदाई बताया गया है।
पितरों का तर्पण करने के लिए सबसे पहले हाथ में कुश लेकर दोनों हाथों को जोड़कर पितरों का ध्यान करें और उन्हें अपनी पूजा स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करें। पितरों का तर्पण करने के लिए जल, तिल और फूल लेकर तर्पण करना चाहिए। यदि भूल गए हों मृत्यु की तिथि तो पितृपक्ष में मृत्यु की तिथि के अनुसार उसी तिथि पर पितरों का श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि भूल गए हैं या आपको मालूम नहीं है तो ऐसे पूर्वजों का श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।
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पं. विरेंद्र शुक्ल ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष के दिनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। श्राद्ध कर्म के दौरान आप जनेऊ पहनते हैं तो पिंडदान के दौरान उसे बाएं की जगह दाएं कंधे पर रखें। श्राद्ध कर्मकांड करने वाले व्यक्ति को नाखून नहीं काटने चाहिए। इसके अलावा, उसे दाढ़ी या बाल भी नहीं कटवाने चाहिए। नशे के सामग्री का सेवन न करें।
कैसे करे श्राद्ध
श्राद्ध का काम गया में या किसी पवित्र नदी के किनारे भी किया जा सकता है।
इस दौरान पितरों को तृप्त करने के लिए पिंडदान और ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है।
अगर इन दोनों में से किसी जगह पर आप नहीं कर पाते हैं तो किसी गौशाला में जाकर करना चाहिए।
घर पर श्राद्ध करने के लिए सुबह सूर्योदय से पहले नहा लीजिए।
इसके बाद साफ कपड़े पहनकर श्राद्ध और दान का संकल्प कीजिए।
जब तक श्राद्ध ना हो जाए तो कुछ भी ना खाएं।
दक्षिण दिशा में मुंह रखकर बाएं पैर को मोड़कर और घुटने को जमीन पर टिकाकर बैठ जाएं।
इसके बाद तांबे के लोटे में जौ, तिल, चावल, गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद फूल और पानी डालें।
हाथ में कुश लेकर और दल को हाथ में भरकर सीध हाथ के अंगूठे से उसी बर्तन में 11 बार गिराएं।
फिर पितरों के लिए खीर अर्पित करें।
इसके बाद देवता, गाय, कुत्ता, कौआ और चींटी के लिए अलग से भोजन निकालकर रख दीजिए।
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मुहम्मदाबाद गोहना कस्बा निवासी पं. विरेंद्र शुक्ल के मुताबिक, भाद्रपद मास की पूर्णिमा शुक्रवार यानि 29 सितंबर को अपराह्न 4.02 बजे तक रहेगी। उदया तिथि से शनिवार यानि 30 सितंबर से पितृ पक्ष शुरू होगा। खुशहाल और संपन्न जीवन व्यतीत करने के लिए बेहद आवश्यक होता है कि पितरों का आशीर्वाद बना रहे। यदि किसी गलती की वजह से पितृ हमसे नाराज हो जाएं तो इससे व्यक्ति के जीवन में पितृदोष जैसा बड़ा दोष लग जाता है। ऐसे में पितृपक्ष का यह समय पितृदोष जैसे गंभीर दोष से छुटकारा पाने और पितरों की आत्मा की शांति के लिए बेहद ही फलदाई बताया गया है।
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पितरों का तर्पण करने के लिए सबसे पहले हाथ में कुश लेकर दोनों हाथों को जोड़कर पितरों का ध्यान करें और उन्हें अपनी पूजा स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करें। पितरों का तर्पण करने के लिए जल, तिल और फूल लेकर तर्पण करना चाहिए। यदि भूल गए हों मृत्यु की तिथि तो पितृपक्ष में मृत्यु की तिथि के अनुसार उसी तिथि पर पितरों का श्राद्ध कर्म किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु तिथि भूल गए हैं या आपको मालूम नहीं है तो ऐसे पूर्वजों का श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।
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पं. विरेंद्र शुक्ल ने बताया कि शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष के दिनों में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। श्राद्ध कर्म के दौरान आप जनेऊ पहनते हैं तो पिंडदान के दौरान उसे बाएं की जगह दाएं कंधे पर रखें। श्राद्ध कर्मकांड करने वाले व्यक्ति को नाखून नहीं काटने चाहिए। इसके अलावा, उसे दाढ़ी या बाल भी नहीं कटवाने चाहिए। नशे के सामग्री का सेवन न करें।
कैसे करे श्राद्ध
श्राद्ध का काम गया में या किसी पवित्र नदी के किनारे भी किया जा सकता है।
इस दौरान पितरों को तृप्त करने के लिए पिंडदान और ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है।
अगर इन दोनों में से किसी जगह पर आप नहीं कर पाते हैं तो किसी गौशाला में जाकर करना चाहिए।
घर पर श्राद्ध करने के लिए सुबह सूर्योदय से पहले नहा लीजिए।
इसके बाद साफ कपड़े पहनकर श्राद्ध और दान का संकल्प कीजिए।
जब तक श्राद्ध ना हो जाए तो कुछ भी ना खाएं।
दक्षिण दिशा में मुंह रखकर बाएं पैर को मोड़कर और घुटने को जमीन पर टिकाकर बैठ जाएं।
इसके बाद तांबे के लोटे में जौ, तिल, चावल, गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद फूल और पानी डालें।
हाथ में कुश लेकर और दल को हाथ में भरकर सीध हाथ के अंगूठे से उसी बर्तन में 11 बार गिराएं।
फिर पितरों के लिए खीर अर्पित करें।
इसके बाद देवता, गाय, कुत्ता, कौआ और चींटी के लिए अलग से भोजन निकालकर रख दीजिए।