{"_id":"61e855270bd05260352d4b36","slug":"parties-did-not-show-seriousness-on-health-services-ballia-news-vns6344525129","type":"story","status":"publish","title_hn":"स्वास्थ्य सेवाओं पर संजीदगी दलों ने नहीं दिखाई","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
स्वास्थ्य सेवाओं पर संजीदगी दलों ने नहीं दिखाई
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बलिया। जनपद की बदहाल स्वास्थ्य सेवाएं किसी से छिपी नहीं हैं। कहने को तो भृगु नगरी में कई अस्पताल हैं, लेकिन बात जब गंभीर बीमारियों की आती है तो लोग वाराणसी या लखनऊ का ही रुख करते हैं। जिले में वर्ष 2014 से एम्स या मेडिकल कालेज खोलने की मांग लगातार हो रही है। विभिन्न संगठनों ने इसे मुद्दा भी बनाया। इसके बाद भी किसी सरकार ने अभी तक इस पर संजीदगी नहीं दिखाई। पिछले दिनों प्रदेश सरकार ने पीपीपी आधार मेडिकल कालेज खोलने की स्वीकृति दी है, लेकिन इस दिशा में भी अभी तक कोई कार्रवाई शुरू नहीं हुई है। पीपीपी माडल को लेकर भी लोगों की राय बंटी हुई है। स्थानीय लोग सरकारी मेडिकल कालेज की मांग कर रहे हैं। जिला और महिला अस्पताल में संसाधनों और विशेषज्ञ चिकित्सकों के अभाव में गंभीर मरीजों को सीधे हायर सेंटर रेफर कर दिया जाता है। इस कारण लोगों को वाराणसी या लखनऊ की ही याद आती है। कोरोना काल में अस्पताल की व्यवस्थाएं थोड़ी सुधारी गई हैं, लेकिन ये सिर्फ कोविड-19 तक ही सीमित हैं। सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी भी बड़ी परेशानी है।
एम्स और मेडिकल कालेज की मांग पुरानी
वर्ष 2017 में प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने पर जनपद वासियों को एम्स की सौगात मिलने की उम्मीद थी, लेकिन पांच वर्ष बीतने के बाद भी ऐसा हो नहीं सका। एम्स तो दूर पड़ोसी जनपदों की तर्ज पर यहां राजकीय मेडिकल कालेज की स्वीकृति भी प्रदेश सरकार ने नहीं दी। एम्स की स्थापना के लिए निरंतर संघर्ष कर रही उच्च शिक्षा एवं चिकित्सा शिक्षा जनजागरण समिति के द्वारा जिले के रसड़ा तहसील अंतर्गत छह सौ एकड़ भूमि भी देने का प्रस्ताव दिया था। इसमें दो सौ एकड़ भूमि निशुल्क देने का प्रस्ताव रखा गया था। इसकी पैमाइश भी कराई गई थी, लेकिन जनप्रतिनिधियों के उदासीन रैवैये और प्रदेश सरकार द्वारा केंद्र को बलिया में एम्स खोलने का प्रस्ताव नहीं भेजे जाने के कारण मामला आज भी अधर में है। एम्स की आस धुंधली पड़ती दिखी तो लोगों ने मेडिकल कॉलेज की मांग की। मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री ने बलिया को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल देने की बात कहीं थी, लेकिन सियासतदानों की उपेक्षा से बलिया को अब तक न एम्स मिल और न ही सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल।
स्वास्थ्य क्षेत्र में पिछड़ा जनपद
चिकित्सीय सुविधा की दृष्टि से बलिया की स्थिति आसपास के जिलों से खराब है। प्रदेश के अंतिम छोर पर स्थित और तीन तरफ से बिहार से घिरे जिले में उन्नत चिकित्सा तकनीकी का आज भी अभाव है। यहां जिला अस्पताल में ट्रामा सेंटर की स्थापना पूर्वर्ती सपा सरकार के कार्यकाल में हुई थी, लेकिन अब तक चिकित्सकों के अभाव और चिकित्सकीय स्टाफ की कमी के कारण ट्रामा सेंटर का संचालन भी शुरू नहीं हो सका है। जिला अस्पताल भी चिकित्सकीय स्टाफ का टोटा है। इसके कारण यह रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। गंभीर बीमारियों के इलाज की बात तो दूर दुर्घटना की शिकार लोगों को भी प्राथमिक उपचार के बाद वाराणसी के लिए रेफर करना जिला अस्पताल की नियति बन गई है। लखनऊ के पीजीआई या फिर वाराणसी के बीएचयू जैंसी सुविधा वाले अस्पताल की कमी बलिया में हमेशा खलती रही है।
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बेहतर इलाज के अभाव में गंवानी पड़ रही जान
उच्च शिक्षा एवं चिकित्सा शिक्षा जनजागरण समिति के जिला संयोजक डॉ.इंद्रजीत प्रसाद के मुताबिक एम्स जैसा अस्पताल नहीं होने की कमी कोरोना की पिछली दिखी है। बेहतर इलाज नहीं मिलने के कारण लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उनकी मांग के समर्थन में शहर के विभिन्न कर्मचारी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति तक से गुहार लगाई है। लेकिन जिले के जनप्रतिनिधियों का साथ नहीं मिला,जिससे मामला अधर में लटका है। कहना है कि एम्स को लेकर जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं दिखी है। बलिया में एम्स की स्थापना होने का लाभ पूर्वाचल समेत बिहार के कुछ हिस्से को भी मिलेगा। उनका कहना है कि एम्स की स्थापना के लिए चलाए जा रहे आंदोलन में अनिल सिंह, विवेक कुमार सिंह, अजय मिश्रा, रविंद्र तिवारी,हिमांशु श्रीवास्तव, बलिराम सिंह, बेचू राम, प्रेमसुख, अजय कुमार तिवारी आदि का सक्रिय योगदान रहा।----
नहीं है कोई सुपरस्पेशियलिटी
बलिया। बलिया में फिलहाल कोई सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल नहीं है। जिले से बड़ी संख्या में जो मरीज बेहतर इलाज के लिए दिल्ली या लखनऊ का रुख करते हैं, इसमें ज्यादातर कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, आर्थोपेडिक सर्जरी, नेप्थ्रोलॉजी, गैस्ट्रोलॉजी, इंडोक्राइन और फेफड़ों की बीमारी से जुड़े होते हैं।
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ये है स्थिति
जिले में कुल 10 सीएचसी है, आठ का निर्माण चल रहा है। इसमें फेफना, बसंतपुर व मनियर सीएचसी को हैंडओवर कर दिया गया है। वहीं रतसर, चिलकहर, बेरूआरबारी, चितबड़ागांव, सहतवार सीएचसी निर्माणाधीन है। कुल 13 पीएचसी और 67 न्यू पीएचसी हैं।
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43 के बजाय नौ चिकित्सक के भरोसे महिला चिकित्सालय
जिला महिला चिकित्सालय में 64 बेड संचालित होते थे, जो वर्तमान में 90 बेड संचालित हो रहे हैं। इसके सापेक्ष 43 चिकित्सक का मानक है। महिला चिकित्सालय में सीएमएस को लेकर तीन चिकित्सक ही स्थायी रूप से तैनात हैं। छह डॉक्टर परार्मशीय हैं। इस प्रकार कुल नौ चिकित्सक तैनात हैं। इसमें से एक चिकित्सक लंबे अवकाश पर तो दूसरी मातृत्व अवकाश पर चली हैं।
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236 बेड की जिम्मेदारी 20 चिकित्सक के भरोसे
बलिया। जिला अस्पताल वर्तमान में लगभग 236 बेड संचालित हो रहे हैं। मंजूरी 176 बेड की है। 176 बेड के सापेक्ष 30 डाक्टरों का मानक है। 236 संचालित बेड पर 20 चिकित्सक के देखभाल की जिम्मेदारी है। जिला अस्पताल में न तो न्यूरो सर्जन है और न ही मानसिक रोग चिकित्सक है।
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221 के बजाय 109 चिकित्सक तैनात
बलिया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के अधीन सीएचसी, पीएचसी, न्यू पीएचसी पर कुल 221 चिकित्सकों का मानक है। जिसमें 167 चिकित्सक कागज में कार्यरत है। जबकि वर्तमान में 109 चिकित्सक वर्तमान में ड्यूटी दे रहे है। शेष 58 चिकित्सक में से 10 से 12 चिकित्सकों ने पिछले वर्ष स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था और अन्य चिकित्सक मेडिकल लेकर कोर्स करने गए हुए है। इसके अलावा एनआरएचएम के तहत पांच एमबीबीएस समेत 108 आयुष चिकित्सक संविदा पर तैनात है। इसमें से 43 आयुष चिकित्सक सीएचसी, पीएचसी, न्यू पीएचसी पर तैनात है।
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एम्स और मेडिकल कालेज की मांग पुरानी
वर्ष 2017 में प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने पर जनपद वासियों को एम्स की सौगात मिलने की उम्मीद थी, लेकिन पांच वर्ष बीतने के बाद भी ऐसा हो नहीं सका। एम्स तो दूर पड़ोसी जनपदों की तर्ज पर यहां राजकीय मेडिकल कालेज की स्वीकृति भी प्रदेश सरकार ने नहीं दी। एम्स की स्थापना के लिए निरंतर संघर्ष कर रही उच्च शिक्षा एवं चिकित्सा शिक्षा जनजागरण समिति के द्वारा जिले के रसड़ा तहसील अंतर्गत छह सौ एकड़ भूमि भी देने का प्रस्ताव दिया था। इसमें दो सौ एकड़ भूमि निशुल्क देने का प्रस्ताव रखा गया था। इसकी पैमाइश भी कराई गई थी, लेकिन जनप्रतिनिधियों के उदासीन रैवैये और प्रदेश सरकार द्वारा केंद्र को बलिया में एम्स खोलने का प्रस्ताव नहीं भेजे जाने के कारण मामला आज भी अधर में है। एम्स की आस धुंधली पड़ती दिखी तो लोगों ने मेडिकल कॉलेज की मांग की। मोदी सरकार के प्रथम कार्यकाल में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री ने बलिया को सुपर स्पेशलिटी अस्पताल देने की बात कहीं थी, लेकिन सियासतदानों की उपेक्षा से बलिया को अब तक न एम्स मिल और न ही सुपरस्पेशिलिटी अस्पताल।
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स्वास्थ्य क्षेत्र में पिछड़ा जनपद
चिकित्सीय सुविधा की दृष्टि से बलिया की स्थिति आसपास के जिलों से खराब है। प्रदेश के अंतिम छोर पर स्थित और तीन तरफ से बिहार से घिरे जिले में उन्नत चिकित्सा तकनीकी का आज भी अभाव है। यहां जिला अस्पताल में ट्रामा सेंटर की स्थापना पूर्वर्ती सपा सरकार के कार्यकाल में हुई थी, लेकिन अब तक चिकित्सकों के अभाव और चिकित्सकीय स्टाफ की कमी के कारण ट्रामा सेंटर का संचालन भी शुरू नहीं हो सका है। जिला अस्पताल भी चिकित्सकीय स्टाफ का टोटा है। इसके कारण यह रेफरल सेंटर बनकर रह गया है। गंभीर बीमारियों के इलाज की बात तो दूर दुर्घटना की शिकार लोगों को भी प्राथमिक उपचार के बाद वाराणसी के लिए रेफर करना जिला अस्पताल की नियति बन गई है। लखनऊ के पीजीआई या फिर वाराणसी के बीएचयू जैंसी सुविधा वाले अस्पताल की कमी बलिया में हमेशा खलती रही है।
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बेहतर इलाज के अभाव में गंवानी पड़ रही जान
उच्च शिक्षा एवं चिकित्सा शिक्षा जनजागरण समिति के जिला संयोजक डॉ.इंद्रजीत प्रसाद के मुताबिक एम्स जैसा अस्पताल नहीं होने की कमी कोरोना की पिछली दिखी है। बेहतर इलाज नहीं मिलने के कारण लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उनकी मांग के समर्थन में शहर के विभिन्न कर्मचारी संगठन, सामाजिक कार्यकर्ताओं ने राष्ट्रपति तक से गुहार लगाई है। लेकिन जिले के जनप्रतिनिधियों का साथ नहीं मिला,जिससे मामला अधर में लटका है। कहना है कि एम्स को लेकर जनप्रतिनिधियों की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं दिखी है। बलिया में एम्स की स्थापना होने का लाभ पूर्वाचल समेत बिहार के कुछ हिस्से को भी मिलेगा। उनका कहना है कि एम्स की स्थापना के लिए चलाए जा रहे आंदोलन में अनिल सिंह, विवेक कुमार सिंह, अजय मिश्रा, रविंद्र तिवारी,हिमांशु श्रीवास्तव, बलिराम सिंह, बेचू राम, प्रेमसुख, अजय कुमार तिवारी आदि का सक्रिय योगदान रहा।----
नहीं है कोई सुपरस्पेशियलिटी
बलिया। बलिया में फिलहाल कोई सुपरस्पेशियलिटी अस्पताल नहीं है। जिले से बड़ी संख्या में जो मरीज बेहतर इलाज के लिए दिल्ली या लखनऊ का रुख करते हैं, इसमें ज्यादातर कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, आर्थोपेडिक सर्जरी, नेप्थ्रोलॉजी, गैस्ट्रोलॉजी, इंडोक्राइन और फेफड़ों की बीमारी से जुड़े होते हैं।
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ये है स्थिति
जिले में कुल 10 सीएचसी है, आठ का निर्माण चल रहा है। इसमें फेफना, बसंतपुर व मनियर सीएचसी को हैंडओवर कर दिया गया है। वहीं रतसर, चिलकहर, बेरूआरबारी, चितबड़ागांव, सहतवार सीएचसी निर्माणाधीन है। कुल 13 पीएचसी और 67 न्यू पीएचसी हैं।
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43 के बजाय नौ चिकित्सक के भरोसे महिला चिकित्सालय
जिला महिला चिकित्सालय में 64 बेड संचालित होते थे, जो वर्तमान में 90 बेड संचालित हो रहे हैं। इसके सापेक्ष 43 चिकित्सक का मानक है। महिला चिकित्सालय में सीएमएस को लेकर तीन चिकित्सक ही स्थायी रूप से तैनात हैं। छह डॉक्टर परार्मशीय हैं। इस प्रकार कुल नौ चिकित्सक तैनात हैं। इसमें से एक चिकित्सक लंबे अवकाश पर तो दूसरी मातृत्व अवकाश पर चली हैं।
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236 बेड की जिम्मेदारी 20 चिकित्सक के भरोसे
बलिया। जिला अस्पताल वर्तमान में लगभग 236 बेड संचालित हो रहे हैं। मंजूरी 176 बेड की है। 176 बेड के सापेक्ष 30 डाक्टरों का मानक है। 236 संचालित बेड पर 20 चिकित्सक के देखभाल की जिम्मेदारी है। जिला अस्पताल में न तो न्यूरो सर्जन है और न ही मानसिक रोग चिकित्सक है।
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221 के बजाय 109 चिकित्सक तैनात
बलिया। मुख्य चिकित्सा अधिकारी के अधीन सीएचसी, पीएचसी, न्यू पीएचसी पर कुल 221 चिकित्सकों का मानक है। जिसमें 167 चिकित्सक कागज में कार्यरत है। जबकि वर्तमान में 109 चिकित्सक वर्तमान में ड्यूटी दे रहे है। शेष 58 चिकित्सक में से 10 से 12 चिकित्सकों ने पिछले वर्ष स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया था और अन्य चिकित्सक मेडिकल लेकर कोर्स करने गए हुए है। इसके अलावा एनआरएचएम के तहत पांच एमबीबीएस समेत 108 आयुष चिकित्सक संविदा पर तैनात है। इसमें से 43 आयुष चिकित्सक सीएचसी, पीएचसी, न्यू पीएचसी पर तैनात है।
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