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कुदरत का कहर, किसानों की टूटी कमर

Sun, 05 Apr 2015 11:16 PM IST
ब्यूरो, अमर उजाला, बलिया
ब्यूरो, अमर उजाला, बलिया Updated Sun, 05 Apr 2015 11:16 PM IST
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Nature's havoc, farmers broken hip
कृषि प्रधान देश में किसानों की खेती कुदरत पर ही निर्भर है। चाहे वह खेत सिंचित हो या असिंचित। मौसम के बिगड़े मिजाज ने किसानों की कमर ही तोड़ दी है। इस बार कुदरत का ऐसा कहर है कि किसानों का लागत भी निकलना मुश्किल दिख रहा है।
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26 जनवरी से शुरू हुई बूंदाबांदी फरवरी, मार्च और अब अप्रैल में भी जारी है। यही वजह है कि खेतों में खड़ी फसलें तैयार नहीं हुई और पैदावार काफी कम हो गई। आलम यह है कि दलहन, तिलहन, गेहूं, हरी सब्जी, प्याज, सूरजमुखी, मक्के की खेती चौपट हो गई है। शनिवार और रविवार को हुई हल्की बारिश ने खलिहान में रखी फसलों को नुकसान पहुंचाया है। अब तो अनाज के साथ भूसा भी काले रंग का हो जाएगा। खलिहान में फसलों के बोझ को खोलकर बार-बार सूखाने में हिम्मत भी अब जवाब देने लगी है। पिछले तीन महीने से किसानों के अरमानों पर पानी फिर रहा है। गड़हाचल के किसानों के नुकसान का आकलन करें तो सबसे कम मटर की खेती को नुकसान पहुंचा है। जबकि मसूर 50 फीसदी, खेसारी 50, चना 40, सरसों 20, गेहूं 35, आम की फसल 35 फीसदी के साथ ही मक्का, प्याज की खेती को नुकसान पहुंचा है। अभी भी 80 फीसदी किसान फसलों की मड़ाई नहीं कर पाए हैं। सिर्फ साधन संपन्न किसान ही थोड़ा बहुत मड़ाई करके अनाज अपने घरों तक पहुंचा पाए हैं। ऐसे में लगातार हो रही बारिश से लागत मूल्य भी निकलना मुश्किल दिखाई दे रहा है। उल्टे किसानों की मेहनत भी व्यर्थ जाती हुई दिख रही है। अब तो किसानों को डर सताने लगा है कि मौसम का मिजाज ऐसे ही आगे बना रहा तो फसलें सड़ सकती है। ऐसे में किसान जाय तो जाय कहां? 
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