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Ballia News: जिले में ढ़ाई हजार हेक्टेयर में होगी प्राकृतिक खेती
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बलिया। जिले में किसानों की आर्थिक सेहत सुधारने के लिए प्राकृतिक खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। जिले में खरीफ मौसम में 2500 हेक्टेयर क्षेत्रफल में देशी अरहर, मक्का, ज्वार जैसी प्राकृतिक फसलें बोई जाएंगी। इसके अलावा परंपरागत औषधीय खेती पर भी जोर दिया जाएगा। कृषि विभाग ने इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं। इसके तहत गंगा नदी के तटवर्ती पांच ब्लॉकों से अब तक एक हजार किसानों का चयन किया गया है। इसके लिए 50-50 हेक्टेयर का क्लस्टर बनाकर उन्हें प्राकृतिक तरीके से खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। साथ शेष किसानों के चयन की प्रक्रिया भी गतिमान है।
कृषि विभाग के आंकड़े के अनुसार, वर्तमान में जिले में दो लाख 99 हजार 265 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले जनपद में 73.38 प्रतिशत यानी दो लाख 19 हजार 599 हेक्टेयर भू-भाग पर खेती की जाती है। इसमें रबी की खेती एक लाख 80 हजार 518 हेक्टेयर में की जाती है। जबकि शेष भूमि पर खरीफ की खेती की जाती है। रासायनिक खादों के अधाधुंध प्रयोग से खेती की सेहत बिगड़ती जा रही है। आलम यह है कि धीरे-धीरे कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो रही है। सरकार द्वारा ऐसी जमीनों में हरियाली लाने के लिए जैविक खेती को बढ़ावा देनेपर जोर दिया जा रहा है।
इसके लिए कृषि विभाग ने कार्ययोजना तैयार की है। खरीफ मौसम में प्राकृतिक खेती के लिए जिले के पांच ब्लॉकों में पांच-पांच कलस्टर बनाए गए हैं। एक हजार किसानों का चयन कर लिया गया है। किसानों को देशी अरहर, मक्का, ज्वार के साथ ही परपंराग खेती के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकी जानकारी दी जाएगी। इसके बाद किसानों को रिसोर्स पर्सन प्रशिक्षण देंगे।
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खरीफ की सफलता के बाद रबी में भी प्राकृतिक खेती का लक्ष्य निर्धारित किया जाएगा। इसमें मोटा अनाज कठिया, सांवा कोदा (कटकी) काकन की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि परंपरागत व जैविक खेती में लागत कम और आमदनी अधिक है। इसमें पानी की भी कम आवाश्यकता पड़ती है। प्राकृतिक खेती में गोबर से बनी खाद व कीटनाशक का प्रयोग किया जाएगा।
केंचुआ खाद के लिए करेंगे प्रेरित
उप निदेशक इंद्राज ने बताया कि रासायनिक खादों से कहीं ताकतवर जैविक खाद होती है। केंचुआ खाद से जमीन के अंदर के पोषक तत्व मरते नहीं हैं और जमीन एक फीट नीचे तक पोली हो जाती है। पानी को अधिक ग्रहण करती है। इससे अधिक समय तक नमी बनी रहती है।
गोबर खरीदने की बनेगी योजना
किसानों को 80 फीसदी सब्सिडी पर जैविक खाद व बीज उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए गांव-गांव किसानों से गोबर खरीदने की योजना है। चयनित किसानों को गोवंश रखने के लिए प्रेरित किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर उन्हें मुख्यमंत्री निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना से गाय दिलाई जाएगी।
हरी खाद के लिए दिए जाएंगे बीज
किसानों को गोबर के साथ ही हरी खाद उगाने के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। इसके लिए बीज दिए जाएंगे। हरी खाद में उत्पादन को 20 फीसदी बढ़ाने की क्षमता होती है। इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी और पोली हो जाती है। जमीन के पोषक तत्व मरते नहीं हैं।
प्राकृतिक खेती करने के किसानों का चयन किया जा रहा है। विभाग बीज, खाद से लेकर हर संभव मदद करेगा। उन्हें प्राकृतिक खेती करने के तौर तरीके सिखाए जाएंगे। इससे किसानों की आमदनी में दो गुना का इजाफा होगा। - इंद्राज, उप निदेशक (कृषि)
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कृषि विभाग के आंकड़े के अनुसार, वर्तमान में जिले में दो लाख 99 हजार 265 हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले जनपद में 73.38 प्रतिशत यानी दो लाख 19 हजार 599 हेक्टेयर भू-भाग पर खेती की जाती है। इसमें रबी की खेती एक लाख 80 हजार 518 हेक्टेयर में की जाती है। जबकि शेष भूमि पर खरीफ की खेती की जाती है। रासायनिक खादों के अधाधुंध प्रयोग से खेती की सेहत बिगड़ती जा रही है। आलम यह है कि धीरे-धीरे कृषि भूमि बंजर में तब्दील हो रही है। सरकार द्वारा ऐसी जमीनों में हरियाली लाने के लिए जैविक खेती को बढ़ावा देनेपर जोर दिया जा रहा है।
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इसके लिए कृषि विभाग ने कार्ययोजना तैयार की है। खरीफ मौसम में प्राकृतिक खेती के लिए जिले के पांच ब्लॉकों में पांच-पांच कलस्टर बनाए गए हैं। एक हजार किसानों का चयन कर लिया गया है। किसानों को देशी अरहर, मक्का, ज्वार के साथ ही परपंराग खेती के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। कृषि विज्ञान केंद्र के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती की तकनीकी जानकारी दी जाएगी। इसके बाद किसानों को रिसोर्स पर्सन प्रशिक्षण देंगे।
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खरीफ की सफलता के बाद रबी में भी प्राकृतिक खेती का लक्ष्य निर्धारित किया जाएगा। इसमें मोटा अनाज कठिया, सांवा कोदा (कटकी) काकन की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि परंपरागत व जैविक खेती में लागत कम और आमदनी अधिक है। इसमें पानी की भी कम आवाश्यकता पड़ती है। प्राकृतिक खेती में गोबर से बनी खाद व कीटनाशक का प्रयोग किया जाएगा।
केंचुआ खाद के लिए करेंगे प्रेरित
उप निदेशक इंद्राज ने बताया कि रासायनिक खादों से कहीं ताकतवर जैविक खाद होती है। केंचुआ खाद से जमीन के अंदर के पोषक तत्व मरते नहीं हैं और जमीन एक फीट नीचे तक पोली हो जाती है। पानी को अधिक ग्रहण करती है। इससे अधिक समय तक नमी बनी रहती है।
गोबर खरीदने की बनेगी योजना
किसानों को 80 फीसदी सब्सिडी पर जैविक खाद व बीज उपलब्ध कराया जाएगा। इसके लिए गांव-गांव किसानों से गोबर खरीदने की योजना है। चयनित किसानों को गोवंश रखने के लिए प्रेरित किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर उन्हें मुख्यमंत्री निराश्रित गोवंश सहभागिता योजना से गाय दिलाई जाएगी।
हरी खाद के लिए दिए जाएंगे बीज
किसानों को गोबर के साथ ही हरी खाद उगाने के लिए भी प्रेरित किया जाएगा। इसके लिए बीज दिए जाएंगे। हरी खाद में उत्पादन को 20 फीसदी बढ़ाने की क्षमता होती है। इससे खेत की मिट्टी भुरभुरी और पोली हो जाती है। जमीन के पोषक तत्व मरते नहीं हैं।
प्राकृतिक खेती करने के किसानों का चयन किया जा रहा है। विभाग बीज, खाद से लेकर हर संभव मदद करेगा। उन्हें प्राकृतिक खेती करने के तौर तरीके सिखाए जाएंगे। इससे किसानों की आमदनी में दो गुना का इजाफा होगा। - इंद्राज, उप निदेशक (कृषि)