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कामेश्वरधाम में उमड़ते हैं शिवभक्त
अमर उजाला ब्यूरोः बलिया
Updated Sat, 23 Jul 2016 10:32 PM IST
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कारो स्थित कामेश्वर धाम का पोखरा
सावन महीने में शिवभक्त कामेश्वर धाम मंदिर पर भारी संख्या में पहुंच रहे हैं। मान्यता है कि बाबा के दर्शन-पूजन और जलाभिषेक करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सबसे अधिक भीड़ सावन के सोमवार को होती है। इस दिन शिव भक्त उजियार गंगा घाट से गंगाजल लेकर पैदल ही कामेश्वरधाम पहुंच बाबा कामेश्वर का जलभिषेक करते हैं।
मान्यता है कि भगवान शिव इस स्थान पर कामदेव को भस्म किए थे। इस घटना का साक्षी आम का पेड़ आज भी विराजमान है। महर्षि विश्वामित्र भगवान राम और लक्ष्मण को लेकर बक्सर में ताड़का वध के लिए जा रहे थे। रात होने पर राम-लक्ष्मण ने यहां रात में विश्राम किया था। इसका उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है। यहां 52 बिगहा का पोखरा है, जिसमें मछलियां और पछी बरबस ही लोगों के मन को मोह लेते हैं। इस पोखरे को रानी पोखरा के नाम से जाना जाता है।
रानी पोखरा के घाट एक दशक पहले क्षतिग्रस्त होकर गिर गए थे। जिसे गांव सहित आसपास के गांवों के लोगों के सहयोग से आकर्षक बनाया गया। पोखरे के घाटों को अलग-अलग नाम से मौर्य घाट, सम्राट अशोक घाट, प्रजापति घाट, महर्षि विश्वामित्र घाट के नाम से जाना जाता है। इस का जल शिव को भी चढ़ाया जाता है। श्रद्धालु आरोग्य प्राप्ति की कामना से स्नान भी करते हैं। इस सरोवर में कपड़े धोने तथा साबुन का उपयोग पर प्रतिबंध लगा है। मनोरम झील में कमल के फूल और नवंबर माह से फरवरी माह तक हजारों प्रवासी पक्षियों का बसेरा बना रहता है।
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मान्यता है कि भगवान शिव इस स्थान पर कामदेव को भस्म किए थे। इस घटना का साक्षी आम का पेड़ आज भी विराजमान है। महर्षि विश्वामित्र भगवान राम और लक्ष्मण को लेकर बक्सर में ताड़का वध के लिए जा रहे थे। रात होने पर राम-लक्ष्मण ने यहां रात में विश्राम किया था। इसका उल्लेख बाल्मीकि रामायण में मिलता है। यहां 52 बिगहा का पोखरा है, जिसमें मछलियां और पछी बरबस ही लोगों के मन को मोह लेते हैं। इस पोखरे को रानी पोखरा के नाम से जाना जाता है।
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रानी पोखरा के घाट एक दशक पहले क्षतिग्रस्त होकर गिर गए थे। जिसे गांव सहित आसपास के गांवों के लोगों के सहयोग से आकर्षक बनाया गया। पोखरे के घाटों को अलग-अलग नाम से मौर्य घाट, सम्राट अशोक घाट, प्रजापति घाट, महर्षि विश्वामित्र घाट के नाम से जाना जाता है। इस का जल शिव को भी चढ़ाया जाता है। श्रद्धालु आरोग्य प्राप्ति की कामना से स्नान भी करते हैं। इस सरोवर में कपड़े धोने तथा साबुन का उपयोग पर प्रतिबंध लगा है। मनोरम झील में कमल के फूल और नवंबर माह से फरवरी माह तक हजारों प्रवासी पक्षियों का बसेरा बना रहता है।
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