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चार सौ वर्षो में चार महामारी ने मानव जीवन पर लगाया ग्रहण

Wed, 15 Apr 2020 08:30 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 15 Apr 2020 08:30 PM IST
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In four hundred years, four epidemics eclipsed human life
बलिया। इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के आरंभ में चीन के वुहान शहर से पैदा हुआ कोरोना वायरस ने अब लगभग पूरी दुनिया को अपने आगोश में ले लिया है। आलम ये है कि दुनिया भर में इस वायरस ने बड़े पैमाने पर लोगों जान ली है और सिलसिला अब भी जारी है। अब प्रकृति का कुपित होना कहें या संतुलन, चाहे जो हो, लेकिन पिछले 400 साल के इतिहास को टटोलें तो प्रत्येक सौ साल के बाद दुनिया में एक ऐसी महामारी ने जन्म लिया है जिसने धरा पर न सिर्फ जमकर कहर बरपाया बल्कि मानव जीवन पर ग्रहण भी लगाया। रोचक तथ्य यह भी है कि महामारी ने कहर बरपाने का जो समय चुना वह सदी का बीसवां वर्ष रहा। मसलन वर्ष 1720, 1820, 1920 और 2020 में महामारी फैली। विभिन्न यूनिवर्सिटियों के स्नातक परस्नातक की कक्षाओं के प्राचीन इतिहास की पुस्तकों में इसका जिक्र भी है। एनसीआरटी की इतिहास की पुस्तकों में भी इन महामारियों और उनके समय की जानकारी दी गई है। आधुनिक भारत के इतिहास नामक किताब में भी इन सभी महामारियों का व्यापक स्तर पर समय के हिसाब से जानकारी दी गई।
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1720 से शुरू हुआ प्लेग का कहर
वर्ष 1720 में फ्रांस के मार्सेलो शहर से एक महामारी का जन्म हुआ। इसे द ग्रेट प्लेग आफ मार्शेल कहा गया। वैसे तो यह बीमारी मूल रूप से चूहों से फैली और जानकारी तथा इलाज के अभाव में इसने तकरीबन तीन करोड़ लोगों को अपना शिकार बनाया। अकेले भारत में इस महामारी में दो चरणों में करीब एक करोड़ लोग कालकवलित हुए। यही कारण रहा कि इसे ब्लैक डेथ भी कहा जाता था। इसका प्रभाव कई वर्षों तक रहा और इसने चीन, भारत, रूस, आस्ट्रिया, हांगकांग, अमेरिका, थाईलैंड, अरब, जावा, मनीला, बैंकॉक और यूरोप में जमकर तबाही मचाई। इसका असर 19 वीं सदी तक दिखा।
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सौ साल बाद कालरा ने लाखों को बनाया शिकार
इसके ठीक सौ वर्ष बाद वर्ष 1820 में कालरा यानी हैजा के रुप में एक और महामारी ने जन्म लिया। इसने यूरोप समेत एशिया के कई देशों में व्यापक जर पर चीन, जापान, हांगकांग, बैंकॉक, जावा, मनीला, थाईलैंड, इंडोनेशिया, फिलीपींस में इसके कहर से व्यापक तबाही हुई। कालरा के कारण सबसे अधिक मौतें जावा में हुई। पूरे विश्व में तब एक लाख से अधिक लोग मौत का शिकार हुए।
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1920 में शुरू हुआ स्पेनिश फ्लू का कहर
वर्ष 1920 में स्पेनिश फ्लू ने विश्व जगत को अपनी आगोश में लिया। इससे समूची दुनिया में तकरीबन 4 करोड़ मौतें हुईं। जबकि 50 करोड़ लोग इससे से प्रभावित हुए। मौत के साथ-साथ इसका दूसरा प्रभाव यह रहा कि इसने मानव जीवन की आयु को करीब 12 बर्ष तक कम कर दिया। इसके बाद वर्ष 1950 में स्पेनिश फ्लू से मिलते-जुलते लक्षण वाली महामारी एशियन फ्लू अस्तित्व में आई। इससे अकेले अमेरिका में 70 हजार और ब्रिटेन में साढ़े तीन हजार लोगों ने जान गंवाई। इस महामारी ने यूरोप के कई देशों समेत एशिया में भी जमकर तबाही मचाई। इससे एक बारगी ऐसा लगा कि मानव जाति पर संकट उत्पन्न हो गया है। अभी एशियन फ्लू का कहर थमा भी नहीं था कि वर्ष 1968 में स्पेनिश फ्लू के लक्षणों से मिलती जुलती बीमारी हांगकांग फ्लू ने जन्म लिया और दुनिया में फिर तबाही मचानी शुरू कर दी। इस महामारी की चपेट में आकर तकरीबन 10 लाख लोगों ने जान गंवाई।

इतिहास गवाह है, प्राचीन काल में विश्व की कई सभ्यताओं के अंत का कारण महामारियां ही बनी हैं। इसका प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता है, जिसके एक स्थल मोहन जोदड़ो की खुदाई के दौरान बड़ी संख्या में मलेरिया पीडि़तों के कपाल मिले थे। विद्वानों का मत है कि संभ्यता के अंत में मलेरिया बीमारी का बड़ा योगदान रहा था। इसके अलावा प्राकृतिक संसाधनों का अति दोहन,पर्यावरण की क्षति के कारण प्रकृति द्वारा संतुलन बनाने का परिणाम भी सौ-दो वर्षो में महामारी की शक्ल अख्तियार कर मानव जाति पर कहर बरपाती रही है। इसी का परिणाम है कि वर्ष 1720, 1820, 1920 और अब 2020 में महामारी ने जन्म लिया है। इसके पूर्व भी कई सभ्यताओं के अंत का प्रमाण इतिहास के पन्नों में दर्ज है।
डॉ. रवि प्रताप शुक्ला, प्रवक्ता, प्राचीन इतिहास, सतीश चंद्र डिग्री कॉलेज, बलिया
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