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45 साल पुराना सिताबदियारा खोजते रहे हरिवंश
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सिताब दियारा के पूर्वो में घूम-घूम कर लोगों का कुशल क्षेम पूछते राज्य सभा के उप सभापति हरिवंश।
- फोटो : BALLIA
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जयप्रकाश नगर। दूसरी बार राज्यसभा का उप सभापति बनने के बाद हरिवंश अपने गांव सिताबदियारा के दलजीत टोला पहुंचे। वह एक कार और दो सुरक्षा गार्डों के साथ छह मई को अपने घर आए। वह अपने दरवाजे पर लोगों से मिलते रहे। सोमवार की सुबह अपने प्रवास के अंतिम दिन उन्होंने गांव के बुजुर्गों के घर जाकर कुशल क्षेम पूछा। उन्होंने लोगों 45 साल पुराना भाईचारा वाला समाज बनाने की अपील की।
चार दिवसीय यात्रा पर अपने गांव पहुंचे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के दरवाजे पर सिताबदियारा के 27 पुरवों के लोग बधाई देने के लिए पहुंचते रहे। लोगों का कहना था कि जब भी वे गांव आते हैं तो पूरी सादगी के साथ रहते हैं। लोगों से गांव के संभ्रांत व्यक्ति की तरह सबसे मिलते-जुलते हैं। प्रवास के दौरान कोई गांव की सड़क दुरुस्त कराने की बात कहता रहा तो कोई महुली में गंगा नदी पर पुल निर्माण की। सिताबदियारा के मुखिया सुरेंद्र सिंह ने कहा कि महुली में आपके प्रयास से पीपा पुल बनने लगा है लेकिन जरूरत पुल को पक्का कराने की है।
प्रवास के अंतिम दिन सोमवार को वे राम यादव, संतोष सिंह, लवकुश सिंह के यहां पहुंचे और उनका कुशल क्षेम पूछा। लोगों से अपने अनुभव का साझा करते उन्होंने कहा कि सिताबदियारा 45 साल पहले जैसा नहीं रह गया है। गांव के 27 टोले तब एक सूत्र में बंधे थे। तब गरीबी थी। दो नदियों का घेरा, विशाल दरियाव (नदियों का पाट) पार करना होता था। घाघरा उस पार रिविलगंज और इधर बैरिया, रानीगंज ही तब सबसे बड़े शहर लगते थे। सड़क, अस्पताल, बिजली, फोन नहीं था और चार-पांच महीने पानी में घिरे रहना पड़ता था। इस इलाके में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म किसी वरदान से कम नहीं था। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस इलाके का उद्धार आरंभ किया। बिहार के हिस्से वाले गांवों की सूरत नीतीश कुमार ने बदली। अब गांव में बिजली है, अस्पताल है, सड़कें हैं, स्कूल हैं लेकिन सिताबदियारा में 27 टोले वाला वह समाज नहीं रहा, जो 45 साल पहले था। वह रिश्ता कायम करने की जरूरत है।
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चार दिवसीय यात्रा पर अपने गांव पहुंचे राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश के दरवाजे पर सिताबदियारा के 27 पुरवों के लोग बधाई देने के लिए पहुंचते रहे। लोगों का कहना था कि जब भी वे गांव आते हैं तो पूरी सादगी के साथ रहते हैं। लोगों से गांव के संभ्रांत व्यक्ति की तरह सबसे मिलते-जुलते हैं। प्रवास के दौरान कोई गांव की सड़क दुरुस्त कराने की बात कहता रहा तो कोई महुली में गंगा नदी पर पुल निर्माण की। सिताबदियारा के मुखिया सुरेंद्र सिंह ने कहा कि महुली में आपके प्रयास से पीपा पुल बनने लगा है लेकिन जरूरत पुल को पक्का कराने की है।
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प्रवास के अंतिम दिन सोमवार को वे राम यादव, संतोष सिंह, लवकुश सिंह के यहां पहुंचे और उनका कुशल क्षेम पूछा। लोगों से अपने अनुभव का साझा करते उन्होंने कहा कि सिताबदियारा 45 साल पहले जैसा नहीं रह गया है। गांव के 27 टोले तब एक सूत्र में बंधे थे। तब गरीबी थी। दो नदियों का घेरा, विशाल दरियाव (नदियों का पाट) पार करना होता था। घाघरा उस पार रिविलगंज और इधर बैरिया, रानीगंज ही तब सबसे बड़े शहर लगते थे। सड़क, अस्पताल, बिजली, फोन नहीं था और चार-पांच महीने पानी में घिरे रहना पड़ता था। इस इलाके में लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म किसी वरदान से कम नहीं था। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस इलाके का उद्धार आरंभ किया। बिहार के हिस्से वाले गांवों की सूरत नीतीश कुमार ने बदली। अब गांव में बिजली है, अस्पताल है, सड़कें हैं, स्कूल हैं लेकिन सिताबदियारा में 27 टोले वाला वह समाज नहीं रहा, जो 45 साल पहले था। वह रिश्ता कायम करने की जरूरत है।
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