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Ballia News: हुकुम छपरा से लेकर बादिलपुर तक बाढ़ का पानी भरा
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हल्दी क्षेत्र के सुल्तानपुर मुस्लिम बस्ती में ग्रामीणों की ओर से बनाया गया बांस का पुल।
- फोटो : संवाद
मझौवां। गंगा नदी का पानी चार दिनों से लगातार घट रहा है, लेकिन बाढ़ के असर से राहत मिलना अभी दूर की बात है। क्षेत्र के कई हिस्सों में बाढ़ के बाद हालात अभी भी दयनीय बने हुए हैं। जैसे ही गंगा का पानी बस्तियों से निकलने लगा है, दूसरी समस्याओं का सिलसिला शुरू हो गया है। बाढ़ग्रस्त लोगों का कीचड़ और सड़न भरी दुर्गंध से जीना मुहाल हो गया है। सड़कों पर दो फीट कीचड़ हो जाने से पीड़ितों को आवागमन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, अभी तक प्रशासन की ओर से कीटनाशक दवाओं का छिड़काव नहीं कराया गया है।
बाढ़ ने पहले ही सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि को तबाह कर दिया है। अब भी निचले इलाकों के हिस्से बाढ़ के पानी से जलमग्न हैं। हुकुम छपरा से लेकर बादिलपुर तक बाढ़ का पानी भरा है। इस क्षेत्र में फसलों का भारी नुकसान हुआ है। खेतों में नष्ट हुई फसलें और खाली खेत ही बाकी हैं। पशुपालकों को भी भारी संकट का सामना करना पड़ रहा है। चारे की कमी के कारण कई इलाके में लोग अपनी गाय-बकरियों और अन्य मवेशियों को छोड़ने को मजबूर हैं। उनका पालन-पोषण करना अब एक कठिन चुनौती बन गई है। उपजिलाधिकारी बैरिया आलोक प्रताप सिंह ने बताया कि बस्तियों में बिजली सप्लाई चालू कर दी गई है। राहत सामग्री व स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। केन्द्रीय जल आयोग गायघाट गेज के मुताबिक मंगलवार की शाम 4 बजे गंगा नदी का जलस्तर 58.340 मीटर दर्ज किया गया। नदी के जलस्तर में आधा सेमी प्रति घंटे की रफ्तार से घटाव हो रहा है। हालांकि अभी गंगा नदी का पानी खतरा बिन्दु 57.615 मीटर से 725 सेमी ऊपर है।
चक्की नौरंगा में कटान जारी
मझौवां। चक्की नौरंगा में कटान का सिलसिला लगातार जारी है। गंगा के किनारे बसे लोग नदी के कटान से अपने घर और जमीन खो रहे हैं और पलायन करने के लिए मजबूर हो गए हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोगों के पास अब सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है। किसानों की 15 एकड़ जमीन अचानक कटान की भेंट चढ़ गई। लोग अपनी जिंदगियों को बचाने के लिए जमीनें छोड़ने को विवश हैं।
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बीमारियों का खतरा बढ़ा
मझौवां। बाढ़ के बाद स्वास्थ्य संकट और भी गहरा गया है। जलभराव के कारण संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। मच्छरों और अन्य कीटों की सक्रियता में इज़ाफा हुआ है। मलेरिया, डेंगू और जलजनित बीमारियों के मामलों में वृद्धि हो रही है। प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है, इसलिए लोग समय पर इलाज नहीं करा पा रहे हैं। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को विशेष रूप से गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पशुओं के टीकाकरण का अभियान शुरू नहीं किया गया है।
कारण बैराज से छोड़े गए तीन लाख क्यूसेक पानी का है, लेकिन इससे कोई खतरें की बात नहीं है। जिले में इसका ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा। स्थिति सामान्य रहेगी। स्पर के नोज पर नदी का दबाव नहीं है।
संजय कुमार मिश्र , अधिशासी अभियन्ता, बाढ़ खंड
लालगंज से शिवपुर घाट सड़क टूटी
लालगंज। क्षेत्र में आई बाढ़ ने लालगंज से शिवपुर घाट तक जाने वाली सड़क डूब क्षेत्र में क्षतिग्रस्त हो गई है। इससे आने जाने वाले लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। ग्राम प्रधान शिवपुर कपूर दियर रिहायशी गांवों तक आने जाने के लिए सड़क को भरवाने का काम कर रहे हैं। फिर भी आगे की सड़क ज्यादा खराब हो चुकी है। इससे पैदल चलना भी मुश्किल है। सड़क खराब होने के कार नाव से बिहार आने जाने वाले लोगों को कठिनाइयां हो रही है। माझिल तिवारी, मुन्ना तिवारी, जितेंद्र यादव, वीरेंद्र सिंह, कौशल तिवारी आदि ने सड़क मरम्मत की मांग की है।
पशुओं का किया इलाज
दया छपरा। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुशील कुमार मिश्र, उपमुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी अजय कुमार सिंह, डॉ. अजय यादव, राज नारायण यादव की टीम ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्र ग्राम पंचायत गोपालपुर, दया छपरा, जगदेवा के पशुओं का इलाज किया। सीवीओ ने बताया कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के पशुओं को मुंहपका, खुरपका आदि का वैक्सीन पहले ही लगाई जा चुकी है। कीड़ी नाशक व भूख लगने की दवा दी जा रही है। पानी में डूबा हुआ चारा पशुओं को न खिलाएं। सूखा भोजन और पौष्टिक आहार देते रहे। कीचड़ में पशुओं को बांधने से परहेज करें। हरा चारा जो पानी में डूब गया हो उसे खिलाने से पशुओं में बीमारी बढ़ सकती है। अभी बाढ़ चौकी पर पशु चिकित्सकों की टीम लगी रहेगी। ज्यादातर दुधारू पशुओं पर ध्यान देने का समय है। पशुओं के भोजन में कैल्शियम का प्रयोग बढ़ाएं।
ग्रामीणों ने बनाया बांस का पुल
हल्दी। ब्लाॅक बेलहरी के ग्राम सभा सुल्तानपुर की मुस्लिम बस्ती के लोगों ने बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए मिसाल पेश की है। ग्रामीणों ने सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाए खुद समाधान निकाला। चंदा इकट्ठा कर ग्रामीणों ने बांस का पुल तैयार किया, ताकि आवागमन संभव हो सके। गांव के रहमान, जुबेरोत्ती, अख्तर, करामत, प्रहलाद, मुख्तार असलम और अशफाक ने बताया कि बाढ़ के दौरान बिजली और नाव की सुविधा न होने से वे घरों में कैद थे। जैसे ही पानी घटा, सभी ने मिलकर बांस पुल बनाने का निर्णय लिया। हालांकि यह पुल पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, फिर भी ग्रामीणों की समस्या कुछ कम हुई है। पुल की मजबूती बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि वे पिछले डेढ़ दशक से बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं। उन्होंने जिलाधिकारी से स्थायी समाधान की मांग की।
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बाढ़ ने पहले ही सैकड़ों एकड़ कृषि भूमि को तबाह कर दिया है। अब भी निचले इलाकों के हिस्से बाढ़ के पानी से जलमग्न हैं। हुकुम छपरा से लेकर बादिलपुर तक बाढ़ का पानी भरा है। इस क्षेत्र में फसलों का भारी नुकसान हुआ है। खेतों में नष्ट हुई फसलें और खाली खेत ही बाकी हैं। पशुपालकों को भी भारी संकट का सामना करना पड़ रहा है। चारे की कमी के कारण कई इलाके में लोग अपनी गाय-बकरियों और अन्य मवेशियों को छोड़ने को मजबूर हैं। उनका पालन-पोषण करना अब एक कठिन चुनौती बन गई है। उपजिलाधिकारी बैरिया आलोक प्रताप सिंह ने बताया कि बस्तियों में बिजली सप्लाई चालू कर दी गई है। राहत सामग्री व स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। केन्द्रीय जल आयोग गायघाट गेज के मुताबिक मंगलवार की शाम 4 बजे गंगा नदी का जलस्तर 58.340 मीटर दर्ज किया गया। नदी के जलस्तर में आधा सेमी प्रति घंटे की रफ्तार से घटाव हो रहा है। हालांकि अभी गंगा नदी का पानी खतरा बिन्दु 57.615 मीटर से 725 सेमी ऊपर है।
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चक्की नौरंगा में कटान जारी
मझौवां। चक्की नौरंगा में कटान का सिलसिला लगातार जारी है। गंगा के किनारे बसे लोग नदी के कटान से अपने घर और जमीन खो रहे हैं और पलायन करने के लिए मजबूर हो गए हैं। हालात इतने खराब हो चुके हैं कि लोगों के पास अब सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है। किसानों की 15 एकड़ जमीन अचानक कटान की भेंट चढ़ गई। लोग अपनी जिंदगियों को बचाने के लिए जमीनें छोड़ने को विवश हैं।
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बीमारियों का खतरा बढ़ा
मझौवां। बाढ़ के बाद स्वास्थ्य संकट और भी गहरा गया है। जलभराव के कारण संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। मच्छरों और अन्य कीटों की सक्रियता में इज़ाफा हुआ है। मलेरिया, डेंगू और जलजनित बीमारियों के मामलों में वृद्धि हो रही है। प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है, इसलिए लोग समय पर इलाज नहीं करा पा रहे हैं। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को विशेष रूप से गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पशुओं के टीकाकरण का अभियान शुरू नहीं किया गया है।
कारण बैराज से छोड़े गए तीन लाख क्यूसेक पानी का है, लेकिन इससे कोई खतरें की बात नहीं है। जिले में इसका ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ेगा। स्थिति सामान्य रहेगी। स्पर के नोज पर नदी का दबाव नहीं है।
संजय कुमार मिश्र , अधिशासी अभियन्ता, बाढ़ खंड
लालगंज से शिवपुर घाट सड़क टूटी
लालगंज। क्षेत्र में आई बाढ़ ने लालगंज से शिवपुर घाट तक जाने वाली सड़क डूब क्षेत्र में क्षतिग्रस्त हो गई है। इससे आने जाने वाले लोगों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है। ग्राम प्रधान शिवपुर कपूर दियर रिहायशी गांवों तक आने जाने के लिए सड़क को भरवाने का काम कर रहे हैं। फिर भी आगे की सड़क ज्यादा खराब हो चुकी है। इससे पैदल चलना भी मुश्किल है। सड़क खराब होने के कार नाव से बिहार आने जाने वाले लोगों को कठिनाइयां हो रही है। माझिल तिवारी, मुन्ना तिवारी, जितेंद्र यादव, वीरेंद्र सिंह, कौशल तिवारी आदि ने सड़क मरम्मत की मांग की है।
पशुओं का किया इलाज
दया छपरा। मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. सुशील कुमार मिश्र, उपमुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी अजय कुमार सिंह, डॉ. अजय यादव, राज नारायण यादव की टीम ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्र ग्राम पंचायत गोपालपुर, दया छपरा, जगदेवा के पशुओं का इलाज किया। सीवीओ ने बताया कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र के पशुओं को मुंहपका, खुरपका आदि का वैक्सीन पहले ही लगाई जा चुकी है। कीड़ी नाशक व भूख लगने की दवा दी जा रही है। पानी में डूबा हुआ चारा पशुओं को न खिलाएं। सूखा भोजन और पौष्टिक आहार देते रहे। कीचड़ में पशुओं को बांधने से परहेज करें। हरा चारा जो पानी में डूब गया हो उसे खिलाने से पशुओं में बीमारी बढ़ सकती है। अभी बाढ़ चौकी पर पशु चिकित्सकों की टीम लगी रहेगी। ज्यादातर दुधारू पशुओं पर ध्यान देने का समय है। पशुओं के भोजन में कैल्शियम का प्रयोग बढ़ाएं।
ग्रामीणों ने बनाया बांस का पुल
हल्दी। ब्लाॅक बेलहरी के ग्राम सभा सुल्तानपुर की मुस्लिम बस्ती के लोगों ने बाढ़ की समस्या से निपटने के लिए मिसाल पेश की है। ग्रामीणों ने सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाए खुद समाधान निकाला। चंदा इकट्ठा कर ग्रामीणों ने बांस का पुल तैयार किया, ताकि आवागमन संभव हो सके। गांव के रहमान, जुबेरोत्ती, अख्तर, करामत, प्रहलाद, मुख्तार असलम और अशफाक ने बताया कि बाढ़ के दौरान बिजली और नाव की सुविधा न होने से वे घरों में कैद थे। जैसे ही पानी घटा, सभी ने मिलकर बांस पुल बनाने का निर्णय लिया। हालांकि यह पुल पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, फिर भी ग्रामीणों की समस्या कुछ कम हुई है। पुल की मजबूती बढ़ाने पर विचार कर रहे हैं। ग्रामीणों ने बताया कि वे पिछले डेढ़ दशक से बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं। उन्होंने जिलाधिकारी से स्थायी समाधान की मांग की।