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जंग हो या फिर इश्क हो, भरपूर होना चाहिए...
ब्यूरो/अमर उजाला, बलिया
Updated Fri, 11 Dec 2015 10:05 PM IST
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‘चाहतों की जरा सी दस्तक पर, दिल का दरवाजा खुल सकता है इश्क ऐसी जुबान है प्यारे, जिससे गूंगा भी बोल सकता है’ डा. कलीम कैसर के इस शेर ने फिजा में शायरी घोल दिया।
इस दौरान शायरों ने एक से बढ़कर शेर पेश किए और पूरी रात लोगों को कभी हंसाया तो कभी उन्हें उनके जवानी के दिनों को याद दिला दी। इसके पूर्व मुख्य मुख्य सीजेएम शोभनाथ सिंह व विशिष्ट अतिथि एडीएम खेमपाल सिंह ने संयुक्त रूप से फीता काटकर किया। इस दौरान दर्शकों की वाह-वाह....ने शायरों का खूब हौसला बुलंद दिया।
शायर डा. राहत इंदौरी ने ‘न हम सफर न किसी हमनशी से निकलेगा, हमारे पांव का कांटा हमी से निकलेगा, फैसला जो कुछ भी हो मंजूर होना चाहिए और जंग हो या फिर इश्क हो, भरपूर होना चाहिए’ पेश किया।
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इसके बाद अबरार काशिफ ‘कभी-कभी तो तेरा गम कमाल करता है, सफर में भी घर की तरह देखभाल करता है’, निर्मल दर्शन के शेर ‘कोई तो मेरे साथ कदम दो कदम चलो, चाहे खुशी चले या फिर खुशी का भ्रम चले’, नीतिश तवारी ने ‘छाये ये कैसा करिश्मा हो गया, टूटकर मैं ओर पुख्ता हो गया, फिर चुनावों की घड़ी नजदीक थी, फिर किसी सूबे में दंगा हो गया’ सुनाकर खूब वाहवाही लूटी।
इसके बाद बारी आई हंसाने की तो सुंदर मालेगांवी ने कह डाला कि ‘इश्क तो बेहिसाब कर डाला, खुदको बासी कबाब कर डाला, घेर के मुझ को मेरे सालों ने, अगला-पिछला हिसाब कर डाला’ सुनाकर दर्शकों इतना गुदगुदाया कि हंसकर वे लोटपोट होते रहे। इस मौके पर कार्यक्रम के सफल आयोजन में अध्यक्ष प्रतिनिधि लक्ष्मण गुप्त, अलीम खां सहयोग सराहनीय रहा।
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इस दौरान शायरों ने एक से बढ़कर शेर पेश किए और पूरी रात लोगों को कभी हंसाया तो कभी उन्हें उनके जवानी के दिनों को याद दिला दी। इसके पूर्व मुख्य मुख्य सीजेएम शोभनाथ सिंह व विशिष्ट अतिथि एडीएम खेमपाल सिंह ने संयुक्त रूप से फीता काटकर किया। इस दौरान दर्शकों की वाह-वाह....ने शायरों का खूब हौसला बुलंद दिया।
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शायर डा. राहत इंदौरी ने ‘न हम सफर न किसी हमनशी से निकलेगा, हमारे पांव का कांटा हमी से निकलेगा, फैसला जो कुछ भी हो मंजूर होना चाहिए और जंग हो या फिर इश्क हो, भरपूर होना चाहिए’ पेश किया।
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इसके बाद अबरार काशिफ ‘कभी-कभी तो तेरा गम कमाल करता है, सफर में भी घर की तरह देखभाल करता है’, निर्मल दर्शन के शेर ‘कोई तो मेरे साथ कदम दो कदम चलो, चाहे खुशी चले या फिर खुशी का भ्रम चले’, नीतिश तवारी ने ‘छाये ये कैसा करिश्मा हो गया, टूटकर मैं ओर पुख्ता हो गया, फिर चुनावों की घड़ी नजदीक थी, फिर किसी सूबे में दंगा हो गया’ सुनाकर खूब वाहवाही लूटी।
इसके बाद बारी आई हंसाने की तो सुंदर मालेगांवी ने कह डाला कि ‘इश्क तो बेहिसाब कर डाला, खुदको बासी कबाब कर डाला, घेर के मुझ को मेरे सालों ने, अगला-पिछला हिसाब कर डाला’ सुनाकर दर्शकों इतना गुदगुदाया कि हंसकर वे लोटपोट होते रहे। इस मौके पर कार्यक्रम के सफल आयोजन में अध्यक्ष प्रतिनिधि लक्ष्मण गुप्त, अलीम खां सहयोग सराहनीय रहा।