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भोजपुरी के बगैर साहित्य अधूरा : कुलपति
Updated Tue, 21 Feb 2017 08:09 PM IST
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जहां विश्व के 18 देशों में भोजपुरी भाषा बोली जाती है और 25 करोड़ की आबादी इसे अपनी मातृभाषा मानते हैं, उस हिंदी की अभी भी उपेक्षा हो रही है। भोजपुरी को आठवीं अनुसूची में आज तक शामिल नहीं किया गया, यह गंभीर विषय है। यह बातें जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया के कुलपति योगेंद्र सिंह ने अमरनाथ मिश्र पीजी कालेज दूबेछपरा में भोजपुरी भाषा के विकास के तहत आयोजित संगोष्ठी के दौरान मंगलवार को कहीं।
उन्होंने कहा कि भोजपुरी के बगैर साहित्य अधूरा है। आज के परिवेश में खेती व बेटी बचाने की होती है लेकिन आधुनिक युग में समय आ गया है कि दोनों का बढ़ावा देने का जरूरत है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि साहित्यकार जनार्दन राय के कहा कि भोजपुरी भाषा एक लोक भाषा है भोजपुरी बलिष्ठ जाति की व्यवहारिक भाषा है भोजपुरी साहित्य में लोकहित संबंधी और धारणायें भरी पड़ी है।
यदि देखा जाये तो स्वास्थ्य, रक्षा, पर्यावरण चेतना, धर्म अध्यात्म राष्ट्रीय चेतना, दहेज प्रथा, अध्यात्मवाद से संदर्भित साहित्य में लोकहित से जुड़ी अवधारणायें अपना विशेष स्थान रखती हैं। इस मौके पर प्राचार्य डा गणेश पाठक, पूर्व प्रधानाचार्य उमाशंकर मिश्र आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन डा शिवेश राय ने किया।
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उन्होंने कहा कि भोजपुरी के बगैर साहित्य अधूरा है। आज के परिवेश में खेती व बेटी बचाने की होती है लेकिन आधुनिक युग में समय आ गया है कि दोनों का बढ़ावा देने का जरूरत है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि साहित्यकार जनार्दन राय के कहा कि भोजपुरी भाषा एक लोक भाषा है भोजपुरी बलिष्ठ जाति की व्यवहारिक भाषा है भोजपुरी साहित्य में लोकहित संबंधी और धारणायें भरी पड़ी है।
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यदि देखा जाये तो स्वास्थ्य, रक्षा, पर्यावरण चेतना, धर्म अध्यात्म राष्ट्रीय चेतना, दहेज प्रथा, अध्यात्मवाद से संदर्भित साहित्य में लोकहित से जुड़ी अवधारणायें अपना विशेष स्थान रखती हैं। इस मौके पर प्राचार्य डा गणेश पाठक, पूर्व प्रधानाचार्य उमाशंकर मिश्र आदि मौजूद रहे। कार्यक्रम का संचालन डा शिवेश राय ने किया।
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