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कटानरोधी कार्य : 74 मजदूर, चार मशीन बिहार में लगा दी गई, एक दिन भी नहीं टिके 90 मजदूर, आठ मशीन
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चक्की नौरंगा में चल रहा कटानरोधी कार्य।संवाद
मझौवां। गंगा नदी के दक्षिणी छोर पर स्थित नौरंगा और चक्की नौरंगा में लगभग 35 करोड़ रुपये से चल रहे कटानरोधी कार्यों की धीमी प्रगति से ग्रामीणों में नाराजगी है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिलाधिकारी के निर्देश के बावजूद परियोजना स्थलों पर पर्याप्त मजदूर और मशीनें नहीं लगाई जा रही हैं, जिससे बरसात से पहले कार्य पूरा होने की संभावना धूमिल होती जा रही है।
ग्रामीणों के अनुसार, जिलाधिकारी के निर्देश पर दोनों परियोजनाओं में लगाए गए 90 मजदूर और 8 पोकलेन मशीनें एक दिन भी नहीं टिक सकीं। वर्तमान में नौरंगा में 9 मजदूर और दो पोकलेन मशीन और चक्की नौरंगा में 7 मजदूर और दो पोकलेन मशीन काम कर रही हैं। आरोप है कि इनमें से 74 मजदूर और 4 पोकलेन मशीनों को यूपी-बिहार सीमा पर स्थित जेवईनिया गांव में कटानरोधी कार्य में लगा दिया गया है। इससे नौरंगा और चक्की नौरंगा परियोजनाओं की गति और धीमी हो गई है।
तटवर्ती गांवों के लोगों का कहना है कि मजदूरों को समय से भुगतान नहीं मिलने के कारण वे कार्यस्थल छोड़कर जेवईनिया में निर्माण कार्यों में चले गए हैं। वर्तमान में नौरंगा परियोजना स्थल पर मात्र 9 मजदूर और दो पोकलेन मशीन के भरोसे कार्य संचालित होने का आरोप लगाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग की मंशा गंभीर होती तो 45 दिन की देरी से शुरू हुए कार्य को अतिरिक्त संसाधनों और दिन-रात की शिफ्टों में पूरा कराया जाता। इसके विपरीत परियोजना स्थलों से संसाधन ही हटाए जा रहे हैं। लोगों ने आशंका जताई कि यदि समय रहते कार्य पूरा नहीं हुआ तो बरसात में एक बार फिर तटवर्ती गांवों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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गुणवत्ता पर भी उठे सवाल
ग्रामीणों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कार्यस्थल पर लगाए जा रहे पार्कोपाइन जमीन पर रखते ही टूट रहे हैं। मानकों के अनुसार इनमें 7/8 एमएम सरिया, एम-15 ग्रेड कंक्रीट तथा मजबूत वायर बाइंडिंग का प्रयोग होना चाहिए, लेकिन घटिया सामग्री के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आ रही हैं। इसके अलावा नौरंगा में बनाए जा रहे 18 कटरों में सिल्ट के स्थान पर मिट्टी भरने और बिना सिलाई के निर्माण कराए जाने का आरोप भी लगाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि इस प्रकार का निर्माण बाढ़ के दबाव को झेलने में सक्षम नहीं होगा।
अधिकारियों की मौजूदगी पर भी सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि कार्यस्थल पर विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी भी नाममात्र की रहती है। उनके अनुसार जूनियर इंजीनियर सुबह कुछ समय के लिए पहुंचते हैं, जबकि सहायक अभियंता अधिकांश समय अनुपस्थित रहते हैं। जबकि जिलाधिकारी ने अधिकारियों को मौके पर रहकर 30 जून तक कार्य पूरा कराने के निर्देश दिए हैं।
नींद से जागा विभाग
चक्की नौरंगा में 235 मीटर क्षेत्र में कार्य शुरू न होने की खबर संवाद न्यूज एजेंसी की ओर से अमर उजाला के लिए प्रकाशित की गई थी। इसके बाद विभाग में हलचल मच गई। इसके बाद सोमवार को आनन-फानन में मिट्टी स्लोपिंग का कार्य शुरू कराया गया। ग्रामीणों का कहना है कि 37 दिनों में 15 प्रतिशत कार्य भी पूरा नहीं हो सका है, ऐसे में अगले 20 दिनों में शेष 85 प्रतिशत कार्य पूरा होना मुश्किल दिखाई देता है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल मजदूरों और मशीनों की संख्या बढ़ाकर कार्य में तेजी नहीं लाई गई तो वे मुख्यमंत्री से शिकायत करने के लिए लखनऊ कूच करेंगे।
2019 की परियोजना बाढ़ में हुई थी ध्वस्त, गिरे थे 124 मकान
नौरंगा और चक्की नौरंगा गंगा कटान की भयावह त्रासदी झेल चुके गांव हैं। वर्ष 2019-20 में नौरंगा को बचाने के लिए करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से 1200 मीटर लंबी कटानरोधी परियोजना बनाई गई थी, लेकिन उसी वर्ष आई भीषण बाढ़ में पूरी परियोजना ध्वस्त हो गई। पिछले वर्ष गंगा की प्रचंड धारा ने चक्की नौरंगा के 124 पक्के और आठ कच्चे मकानों को निगल लिया था। वहीं नौरंगा और चक्की नौरंगा के किसानों की करीब 127 एकड़ कृषि भूमि भी कटान की भेंट चढ़ गई थी। इसके बाद शासन ने नौरंगा में 24.97 करोड़ रुपये की लागत से 2600 मीटर लंबी नई परियोजना स्वीकृत की। इस परियोजना में 300 मीटर क्षेत्र में 18 डैम्पनर तथा शेष 2300 मीटर क्षेत्र में पार्कोपाइन विधि से कटानरोधी कार्य कराया जा रहा है। वहीं चक्की नौरंगा में 9.98 करोड़ रुपये की लागत से 315 मीटर क्षेत्र में बोल्डर पिचिंग और हिट ट्रैकिंग का कार्य चल रहा है।
जेवईनिया में 45.84 करोड़ की परियोजना
यूपी-बिहार सीमा पर स्थित जेवईनिया गांव में 45 करोड़ 84 लाख 73 हजार रुपये की लागत से 1200 मीटर लंबाई में ईसी बैग प्लेटफाॅर्म और 18 लेयर बोल्डर पिचिंग का कार्य प्रस्तावित है। पिछले वर्ष आई बाढ़ में यहां 318 मकान और 210 एकड़ कृषि भूमि गंगा में समा गई थी, जिससे पूरा गांव लगभग उजड़ गया था।
यदि समय रहते कटानरोधी कार्य पूरा नहीं हुआ तो नौरंगा, चक्की नौरंगा समेत कई गांवों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। प्रशासन को तत्काल अतिरिक्त मजदूर और मशीनें लगाकर युद्धस्तर पर कार्य कराना चाहिए। - अभिनंदन ठाकुर
हर वर्ष लोग गंगा कटान की त्रासदी झेलते हैं, लेकिन विभाग की लापरवाही जारी है। घटिया सामग्री और धीमी गति से हो रहा निर्माण भविष्य में बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। - कुलदीप ठाकुर
नौरंगा परियोजना स्थल पर 11 पोकलेन मशीनें और लगभग 150 मजदूर कार्यरत हैं। 18 डैंपनर में से 14वें डैंपनर का निर्माण चल रहा है। अब तक 35 प्रतिशत कार्य हो चुका है। यह 2600 मीटर लंबी बड़ी परियोजना है और निर्धारित समय में कार्य पूरा कराने का प्रयास है। - संजय कुमार मिश्र, अधिशासी अभियंता, बाढ़ खंड।
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ग्रामीणों के अनुसार, जिलाधिकारी के निर्देश पर दोनों परियोजनाओं में लगाए गए 90 मजदूर और 8 पोकलेन मशीनें एक दिन भी नहीं टिक सकीं। वर्तमान में नौरंगा में 9 मजदूर और दो पोकलेन मशीन और चक्की नौरंगा में 7 मजदूर और दो पोकलेन मशीन काम कर रही हैं। आरोप है कि इनमें से 74 मजदूर और 4 पोकलेन मशीनों को यूपी-बिहार सीमा पर स्थित जेवईनिया गांव में कटानरोधी कार्य में लगा दिया गया है। इससे नौरंगा और चक्की नौरंगा परियोजनाओं की गति और धीमी हो गई है।
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तटवर्ती गांवों के लोगों का कहना है कि मजदूरों को समय से भुगतान नहीं मिलने के कारण वे कार्यस्थल छोड़कर जेवईनिया में निर्माण कार्यों में चले गए हैं। वर्तमान में नौरंगा परियोजना स्थल पर मात्र 9 मजदूर और दो पोकलेन मशीन के भरोसे कार्य संचालित होने का आरोप लगाया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि विभाग की मंशा गंभीर होती तो 45 दिन की देरी से शुरू हुए कार्य को अतिरिक्त संसाधनों और दिन-रात की शिफ्टों में पूरा कराया जाता। इसके विपरीत परियोजना स्थलों से संसाधन ही हटाए जा रहे हैं। लोगों ने आशंका जताई कि यदि समय रहते कार्य पूरा नहीं हुआ तो बरसात में एक बार फिर तटवर्ती गांवों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
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गुणवत्ता पर भी उठे सवाल
ग्रामीणों ने निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि कार्यस्थल पर लगाए जा रहे पार्कोपाइन जमीन पर रखते ही टूट रहे हैं। मानकों के अनुसार इनमें 7/8 एमएम सरिया, एम-15 ग्रेड कंक्रीट तथा मजबूत वायर बाइंडिंग का प्रयोग होना चाहिए, लेकिन घटिया सामग्री के इस्तेमाल की शिकायतें सामने आ रही हैं। इसके अलावा नौरंगा में बनाए जा रहे 18 कटरों में सिल्ट के स्थान पर मिट्टी भरने और बिना सिलाई के निर्माण कराए जाने का आरोप भी लगाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि इस प्रकार का निर्माण बाढ़ के दबाव को झेलने में सक्षम नहीं होगा।
अधिकारियों की मौजूदगी पर भी सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि कार्यस्थल पर विभागीय अधिकारियों की मौजूदगी भी नाममात्र की रहती है। उनके अनुसार जूनियर इंजीनियर सुबह कुछ समय के लिए पहुंचते हैं, जबकि सहायक अभियंता अधिकांश समय अनुपस्थित रहते हैं। जबकि जिलाधिकारी ने अधिकारियों को मौके पर रहकर 30 जून तक कार्य पूरा कराने के निर्देश दिए हैं।
नींद से जागा विभाग
चक्की नौरंगा में 235 मीटर क्षेत्र में कार्य शुरू न होने की खबर संवाद न्यूज एजेंसी की ओर से अमर उजाला के लिए प्रकाशित की गई थी। इसके बाद विभाग में हलचल मच गई। इसके बाद सोमवार को आनन-फानन में मिट्टी स्लोपिंग का कार्य शुरू कराया गया। ग्रामीणों का कहना है कि 37 दिनों में 15 प्रतिशत कार्य भी पूरा नहीं हो सका है, ऐसे में अगले 20 दिनों में शेष 85 प्रतिशत कार्य पूरा होना मुश्किल दिखाई देता है। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि तत्काल मजदूरों और मशीनों की संख्या बढ़ाकर कार्य में तेजी नहीं लाई गई तो वे मुख्यमंत्री से शिकायत करने के लिए लखनऊ कूच करेंगे।
2019 की परियोजना बाढ़ में हुई थी ध्वस्त, गिरे थे 124 मकान
नौरंगा और चक्की नौरंगा गंगा कटान की भयावह त्रासदी झेल चुके गांव हैं। वर्ष 2019-20 में नौरंगा को बचाने के लिए करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से 1200 मीटर लंबी कटानरोधी परियोजना बनाई गई थी, लेकिन उसी वर्ष आई भीषण बाढ़ में पूरी परियोजना ध्वस्त हो गई। पिछले वर्ष गंगा की प्रचंड धारा ने चक्की नौरंगा के 124 पक्के और आठ कच्चे मकानों को निगल लिया था। वहीं नौरंगा और चक्की नौरंगा के किसानों की करीब 127 एकड़ कृषि भूमि भी कटान की भेंट चढ़ गई थी। इसके बाद शासन ने नौरंगा में 24.97 करोड़ रुपये की लागत से 2600 मीटर लंबी नई परियोजना स्वीकृत की। इस परियोजना में 300 मीटर क्षेत्र में 18 डैम्पनर तथा शेष 2300 मीटर क्षेत्र में पार्कोपाइन विधि से कटानरोधी कार्य कराया जा रहा है। वहीं चक्की नौरंगा में 9.98 करोड़ रुपये की लागत से 315 मीटर क्षेत्र में बोल्डर पिचिंग और हिट ट्रैकिंग का कार्य चल रहा है।
जेवईनिया में 45.84 करोड़ की परियोजना
यूपी-बिहार सीमा पर स्थित जेवईनिया गांव में 45 करोड़ 84 लाख 73 हजार रुपये की लागत से 1200 मीटर लंबाई में ईसी बैग प्लेटफाॅर्म और 18 लेयर बोल्डर पिचिंग का कार्य प्रस्तावित है। पिछले वर्ष आई बाढ़ में यहां 318 मकान और 210 एकड़ कृषि भूमि गंगा में समा गई थी, जिससे पूरा गांव लगभग उजड़ गया था।
यदि समय रहते कटानरोधी कार्य पूरा नहीं हुआ तो नौरंगा, चक्की नौरंगा समेत कई गांवों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। प्रशासन को तत्काल अतिरिक्त मजदूर और मशीनें लगाकर युद्धस्तर पर कार्य कराना चाहिए। - अभिनंदन ठाकुर
हर वर्ष लोग गंगा कटान की त्रासदी झेलते हैं, लेकिन विभाग की लापरवाही जारी है। घटिया सामग्री और धीमी गति से हो रहा निर्माण भविष्य में बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। - कुलदीप ठाकुर
नौरंगा परियोजना स्थल पर 11 पोकलेन मशीनें और लगभग 150 मजदूर कार्यरत हैं। 18 डैंपनर में से 14वें डैंपनर का निर्माण चल रहा है। अब तक 35 प्रतिशत कार्य हो चुका है। यह 2600 मीटर लंबी बड़ी परियोजना है और निर्धारित समय में कार्य पूरा कराने का प्रयास है। - संजय कुमार मिश्र, अधिशासी अभियंता, बाढ़ खंड।