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दीपों के पर्व पर दीए का ही होता है महत्व
Ballia
Updated Mon, 12 Nov 2012 12:00 PM IST
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बलिया। मिट्टी के दीए का चलन न के बराबर रह गया है। कुछ पुराने लोगों को छोड़ दें तो आज सभी मोमबत्ती एवं इलेट्रिक युग में जी रहे हैं। इसका प्रमुख कारण है कि कुम्हारों को दीए का वाजिब मूल्य नहीं मिल रहा है। ऐसे में पिछले कई सालों से वे मजबूरी में पुराने मूल्य पर ही अपने दीए बेचने को विवश हैं।
बनरहीं निवासी पंकज प्रजापति ने बताया कि पांच साल से बाजार में आ रहे हैं। लेकिन दीए के भाव में कोई तब्दीली नहीं दिख रही है। जबकि महंगाई के चलते पेट पर आफत आ गई। कठिन मेहनत के बाद भी इसकी कीमत देने को कोई तैयार नहीं है।
सुनील प्रजापति ने बताया कि 25 रुपया सैकड़ा के हिसाब से करीब दो सालों से हम दीए बेच रहे हैं। महंगाई का असर सब चीजों पर है लेकिन दीए का कारोबार इससे अछूता है। इससे साफ लग रहा है कि दीए का पर्व दीपावली औपचारिकता ही बनकर रह गई है।
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हीरा पाठक ने बताया कि बिक्री के हिसाब से इस पर्व की प्रासंगिकता नहीं रह गई है। लोगों पहले 100-200 दीए अपने घरों में सजाते थे। लेकिन अब औपचारिकता वश ही खरीदते हैं।
समाजसेवी संजीव कुमार डंपू ने बताया कि महंगाई के चलते दीपों का पर्व दीपावली दीए से दूर होता जा रहा है। इसकी जगह झालरों एवं लड़ियों ने ले लिया है।
शिक्षक राजेश कुमार सिंह ने बताया कि दीए का पर्व दीपावली अगर मिट्टी के दीए मेें मनाया जाता है तो अच्छा है। लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के चलते लोग कृत्रिम झालरों एवं बाजार में आए अन्य उपकरणों की तरफ खिंचेे जा रहे हैं। पहले मिट्टी के दीए जलाए जाते थे। जिसमें दीपावली के दिन जलने वाले दीए में कीट फतिंगे जल जाते थे। लेकिन अब वह दीपावली के बाद भी दिखते हैं।
अवधेश पांडेय ने बताया कि दीए का पर्व इस समय केवल औपचारिकता मात्र रह गया है। लोग दीए की जगह झालरों से ही घरों प्रकाशमय बनाने में जुटे हैं।
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बनरहीं निवासी पंकज प्रजापति ने बताया कि पांच साल से बाजार में आ रहे हैं। लेकिन दीए के भाव में कोई तब्दीली नहीं दिख रही है। जबकि महंगाई के चलते पेट पर आफत आ गई। कठिन मेहनत के बाद भी इसकी कीमत देने को कोई तैयार नहीं है।
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सुनील प्रजापति ने बताया कि 25 रुपया सैकड़ा के हिसाब से करीब दो सालों से हम दीए बेच रहे हैं। महंगाई का असर सब चीजों पर है लेकिन दीए का कारोबार इससे अछूता है। इससे साफ लग रहा है कि दीए का पर्व दीपावली औपचारिकता ही बनकर रह गई है।
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हीरा पाठक ने बताया कि बिक्री के हिसाब से इस पर्व की प्रासंगिकता नहीं रह गई है। लोगों पहले 100-200 दीए अपने घरों में सजाते थे। लेकिन अब औपचारिकता वश ही खरीदते हैं।
समाजसेवी संजीव कुमार डंपू ने बताया कि महंगाई के चलते दीपों का पर्व दीपावली दीए से दूर होता जा रहा है। इसकी जगह झालरों एवं लड़ियों ने ले लिया है।
शिक्षक राजेश कुमार सिंह ने बताया कि दीए का पर्व दीपावली अगर मिट्टी के दीए मेें मनाया जाता है तो अच्छा है। लेकिन पाश्चात्य संस्कृति के चलते लोग कृत्रिम झालरों एवं बाजार में आए अन्य उपकरणों की तरफ खिंचेे जा रहे हैं। पहले मिट्टी के दीए जलाए जाते थे। जिसमें दीपावली के दिन जलने वाले दीए में कीट फतिंगे जल जाते थे। लेकिन अब वह दीपावली के बाद भी दिखते हैं।
अवधेश पांडेय ने बताया कि दीए का पर्व इस समय केवल औपचारिकता मात्र रह गया है। लोग दीए की जगह झालरों से ही घरों प्रकाशमय बनाने में जुटे हैं।