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उपजाऊ भूमि निगल रहीं नदियां
Ballia
Updated Sat, 13 Jul 2013 05:31 AM IST
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सुरेममनपुर। जिले की नदियां बारिश में तटवर्ती किसानों के लिए कहर बन जातीं हैं। केवल सरकारी आंकड़ों पर ही गौर करें ताे बीते चार वर्षों में ही 48.896 हेक्टेयर ख्ाेती की जमीन नदियों में विलीन हो गई। यह तो सरकारी आंकड़ा है लेकिन हकीकत में हर वर्ष ही सैकड़ों हेक्टेयर जमीन नदियों में समा जाती है। बहुत से किसान जानकारी के अभाव में सहायता राशि से वंचित रह जाते हैं।
जिले की प्रमुख नदियों के कटान से तहसील क्षेत्र के तटवर्ती लोग बेघर होकर दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। तहसील के क्षेत्रफल का एक हिस्सा प्रतिदिन घाघरा और गंगा में समा रहा है। उपजाऊ भूमि जाने से किसानों की कमर टूटती जा रही है। दूसरी ओर शासन-प्रशासन की लापरवाही साफ झलक रही है।
जनप्रतिनिधि और अफसर दोनों जिम्मेदारी के प्रति असंवेदनशील दिख रहे हैं। वैसे तो हर साल तकरीबन सौ हेक्टेयर उपजाऊ जमीन नदियों में समा जाती है लेकिन जिला प्रशासन इसे कागजों पर नहीं दर्शाता। तहसील का क्षेत्रफल लगातार सिमटता जा रहा है। बैरिया तहसील का क्षेत्रफल 42 हजार 213 वर्ग हेक्टेयर है। सिंचिंत भूमि 17 हजार 363 हेक्टेयर, असिंचित भूमि 12 हजार 913 हेक्टेयर है। जबकि 34 हजार 76 हेक्टेयर में आबादी है। इसी तरह अनुपयोगी भूमि आठ हजार 461 हेक्टेयर है।
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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008-09 में 11.212 हेक्टेयर, वर्ष 09-10 में 5.50 हेक्टेयर, वर्ष 2011 में 21.30 हेक्टेयर और 2011-12 में 09.128 हेक्टेयर भूमि घाघरा तथा गंगा में समा गया है। वर्ष 2012-13 में बहुआरा मौजा का 1.756 हेक्टेयर भूमि गंगा नदी की भेंट चढ़ गया। तहसील प्रशासन के अनुसार इब्र्राहिमाबाद नौबरार में 95 किसानों की करीब 30 हेक्टेयर भूमि घाघरा में समा गई है। द्वाबा के 77 किसानों को अनुदान दिया गया है। भूसौला गांव के त्रिभुवन, राजनाथ, त्रिलोकी, जयप्रकाश, सूर्यकांत, रामनारायण, अयोध्या, पवन, हरिशंकर, योगेंद्र समेत 10 लोगों के मकान गंगा में विलीन हो गए हैं। तहसील प्रशासन प्रति व्यक्ति के हिसाब 35 हजार रुपये सहायता राशि दिए हैं। जबकि सच्चाई इससे इतर है। कई लोगों के मकान चले जाते हैं लेकिन या तो कटान पीड़ित तहसील प्रशासन को बताने नहीं जाते या फिर प्रशासन मुआयना नहीं करता।
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जिले की प्रमुख नदियों के कटान से तहसील क्षेत्र के तटवर्ती लोग बेघर होकर दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। तहसील के क्षेत्रफल का एक हिस्सा प्रतिदिन घाघरा और गंगा में समा रहा है। उपजाऊ भूमि जाने से किसानों की कमर टूटती जा रही है। दूसरी ओर शासन-प्रशासन की लापरवाही साफ झलक रही है।
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जनप्रतिनिधि और अफसर दोनों जिम्मेदारी के प्रति असंवेदनशील दिख रहे हैं। वैसे तो हर साल तकरीबन सौ हेक्टेयर उपजाऊ जमीन नदियों में समा जाती है लेकिन जिला प्रशासन इसे कागजों पर नहीं दर्शाता। तहसील का क्षेत्रफल लगातार सिमटता जा रहा है। बैरिया तहसील का क्षेत्रफल 42 हजार 213 वर्ग हेक्टेयर है। सिंचिंत भूमि 17 हजार 363 हेक्टेयर, असिंचित भूमि 12 हजार 913 हेक्टेयर है। जबकि 34 हजार 76 हेक्टेयर में आबादी है। इसी तरह अनुपयोगी भूमि आठ हजार 461 हेक्टेयर है।
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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2008-09 में 11.212 हेक्टेयर, वर्ष 09-10 में 5.50 हेक्टेयर, वर्ष 2011 में 21.30 हेक्टेयर और 2011-12 में 09.128 हेक्टेयर भूमि घाघरा तथा गंगा में समा गया है। वर्ष 2012-13 में बहुआरा मौजा का 1.756 हेक्टेयर भूमि गंगा नदी की भेंट चढ़ गया। तहसील प्रशासन के अनुसार इब्र्राहिमाबाद नौबरार में 95 किसानों की करीब 30 हेक्टेयर भूमि घाघरा में समा गई है। द्वाबा के 77 किसानों को अनुदान दिया गया है। भूसौला गांव के त्रिभुवन, राजनाथ, त्रिलोकी, जयप्रकाश, सूर्यकांत, रामनारायण, अयोध्या, पवन, हरिशंकर, योगेंद्र समेत 10 लोगों के मकान गंगा में विलीन हो गए हैं। तहसील प्रशासन प्रति व्यक्ति के हिसाब 35 हजार रुपये सहायता राशि दिए हैं। जबकि सच्चाई इससे इतर है। कई लोगों के मकान चले जाते हैं लेकिन या तो कटान पीड़ित तहसील प्रशासन को बताने नहीं जाते या फिर प्रशासन मुआयना नहीं करता।