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राम से बढ़ कर राम का नाम
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दयाछपरा। राम से बढ़ कर राम का नाम है। राम दीपक हैं तो राम का नाम प्रकाश है। जिस प्रकार जलता दीपक है लेकिन प्रकाश की महत्ता होती है।
उक्त बातें राम चरित मानस प्रचार परिषद दयाछपरा द्वारा आयोजित नौ दिवसीय मानस सम्मेलन में गुरुवार की रात प्रवचन के क्रम में आए बिहार राज्य धर्म संघ के अध्यक्ष पंडित रमाशंकर शास्त्री ने कही। बताया कि कलयुग केवल नाम अधारा, केवल प्रभु का नाम लेने से जीव सभी दुखों से छुटकारा पाकर प्रभु में लीन हो सकता है। कहा कि मंत्र से भी अधिक नाम की महत्ता है। बताया कि मंत्र जपने के लिए स्थान शुद्धि, शरीर शुद्धि आदि अनेक शुद्धियां करनी पड़ती है। जबकि नाम लेने के लिए किसी प्रकार की शुद्धि की जरूरत नहीं पड़ती। जैसे मित्र को याद करने के लिए किसी समय स्थान की जरूरत नहीं होती और कहीं भी, कभी भी मित्र को कोई याद किया जा सकता है।
उसी प्रकार प्रभु का नाम किसी भी समय लिया जा सकता है। प्रवचनकर्ता विजय शरण दास ने बताया कि जब रिश्ता एक बार किसी भी प्रकार से चाहे मौखिक या व्यवहारिक हो उसे निभाना चाहिए। मां पार्वती ने प्रभु श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए मां सीता का रूप बना ली। इसके बाद जब भगवान भोलेनाथ के पास आई तो भोलेनाथ ने कहा कि मैं सीता को मां मानता हूं और तुम सीता का रूप धारण कर ली और इस जन्म में पत्नी के रूप में तुझे स्वीकार करना बहुत बड़ा पाप होगा। जिसके फलस्वरूप दक्ष के यज्ञ कुंड में सती को शरीर का त्याग करना पड़ा। कथा देर रात तक चलती रही। इस मौके पर हरेंद्र पांडेय, बिजली दुबे, मैथिली शरण उपाध्याय, आकाश उपाध्याय, बाबू उपाध्याय, राम जी प्रधान, एमएस उपाध्याय, सर्वेश्वर नाथ उपाध्याय आदि रहे। सम्मेलन के अध्यक्ष पंडित शुभ नारायन पांडेय ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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उक्त बातें राम चरित मानस प्रचार परिषद दयाछपरा द्वारा आयोजित नौ दिवसीय मानस सम्मेलन में गुरुवार की रात प्रवचन के क्रम में आए बिहार राज्य धर्म संघ के अध्यक्ष पंडित रमाशंकर शास्त्री ने कही। बताया कि कलयुग केवल नाम अधारा, केवल प्रभु का नाम लेने से जीव सभी दुखों से छुटकारा पाकर प्रभु में लीन हो सकता है। कहा कि मंत्र से भी अधिक नाम की महत्ता है। बताया कि मंत्र जपने के लिए स्थान शुद्धि, शरीर शुद्धि आदि अनेक शुद्धियां करनी पड़ती है। जबकि नाम लेने के लिए किसी प्रकार की शुद्धि की जरूरत नहीं पड़ती। जैसे मित्र को याद करने के लिए किसी समय स्थान की जरूरत नहीं होती और कहीं भी, कभी भी मित्र को कोई याद किया जा सकता है।
उसी प्रकार प्रभु का नाम किसी भी समय लिया जा सकता है। प्रवचनकर्ता विजय शरण दास ने बताया कि जब रिश्ता एक बार किसी भी प्रकार से चाहे मौखिक या व्यवहारिक हो उसे निभाना चाहिए। मां पार्वती ने प्रभु श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए मां सीता का रूप बना ली। इसके बाद जब भगवान भोलेनाथ के पास आई तो भोलेनाथ ने कहा कि मैं सीता को मां मानता हूं और तुम सीता का रूप धारण कर ली और इस जन्म में पत्नी के रूप में तुझे स्वीकार करना बहुत बड़ा पाप होगा। जिसके फलस्वरूप दक्ष के यज्ञ कुंड में सती को शरीर का त्याग करना पड़ा। कथा देर रात तक चलती रही। इस मौके पर हरेंद्र पांडेय, बिजली दुबे, मैथिली शरण उपाध्याय, आकाश उपाध्याय, बाबू उपाध्याय, राम जी प्रधान, एमएस उपाध्याय, सर्वेश्वर नाथ उपाध्याय आदि रहे। सम्मेलन के अध्यक्ष पंडित शुभ नारायन पांडेय ने सभी आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त किया।
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