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Ballia News: कटान में 1799 परिवार हुए बेघर, 604 को मिला आवासीय पट्टा, 448 परिवार अब भी ठिकाने की तलाश में भटक रहे

Thu, 17 Sep 2026 01:20 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 17 Sep 2026 01:20 AM IST
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1,799 families rendered homeless due to riverbank erosion; 604 received housing land leases, while 448 families are still wandering in search of shelter.
दूबेछपरा ​स्थित एनएच-31 पर शरण लिए कटान पीड़ित।संवाद
बैरिया। बैरिया तहसील क्षेत्र में वर्ष 2015 से अब तक सरयू और गंगा नदी की कटान से 1799 परिवार बेघर हो चुके हैं। इनमें से 604 परिवारों को ही आवासीय पट्टा मिल सका है, जबकि 448 परिवार ऐसे हैं, जिन्हें आज तक स्थायी ठिकाना नहीं मिल पाया है।
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वर्ष 2015 में सरयू नदी के कटान से रेवती ब्लॉक के मांझा क्षेत्र में 128 पक्के मकान और 670 झोपड़ी युक्त मकान नदी में समा गए थे। इनमें से 350 परिवारों को भैंसहा आदि मौजा में आवासीय पट्टा दिया गया। शेष 448 परिवार आज भी जैसे-तैसे जीवन गुजार रहे हैं। इनके पुनर्वास की सुध लेने वाला कोई नहीं है।
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वर्ष 2016 में सदर तहसील के बेलहरी, मझौवा, पचरुखिया, नारायणपुर और गंगापुर के साथ बैरिया तहसील क्षेत्र के 377 कटान पीड़ित परिवारों को भूमि क्रय कर आवासीय पट्टा दिया गया। वर्ष 2017 में इब्राहिमाबाद नौबरार के 152 परिवारों को चांददियर के ग्राम समाज की भूमि पर पट्टा आवंटित हुआ, लेकिन इनमें महज 16 परिवारों को ही कब्जा मिल सका। शेष परिवार बीएसटी बंधे या रिश्तेदारों के यहां शरण लिए हुए हैं।
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वर्ष 2020 में बैरिया तहसील क्षेत्र के गंगा कटान से विस्थापित 58 परिवारों को बहुआरा ग्राम पंचायत में भूमि क्रय कर पट्टा दिया गया। वर्ष 2023 में सदर तहसील के गंगापुर में 65 परिवारों को शासन की ओर से भूमि क्रय कर निशुल्क आवासीय पट्टा दिया गया। वहीं बैरिया तहसील के केहरपुर और गोपालपुर के 81 कटान पीड़ित परिवारों को भी पट्टा मिला। तत्कालीन एसडीएम आत्रेय मिश्र के प्रयास से दयाछपरा में 52 और मानसिंह छपरा में 29 परिवारों को ग्राम समाज की भूमि पर पट्टा दिया गया। दयाछपरा में 52 परिवार मुख्यमंत्री आवास बनाकर रहने लगे, लेकिन मानसिंह छपरा में पट्टा पाने वाले 29 परिवार वहां नहीं जा सके। पैतृक गांव से काफी दूर होने के कारण ये परिवार आज भी एनएच-31 के किनारे शरण लिए हुए हैं।
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केहरपुर-गोपालपुर के 50 से 60 परिवार अब भी बेघर :
केहरपुर और गोपालपुर के करीब 50 से 60 कटान पीड़ित परिवारों को आज तक आवासीय पट्टा नहीं मिला है। अधिकारियों के अनुसार ग्राम समाज की भूमि उपलब्ध नहीं है। जबकि 30 जुलाई 2012 के शासनादेश में भूमि उपलब्ध नहीं होने पर कटान पीड़ितों को भूमि खरीदकर बसाने का प्रावधान है। वर्ष 2024 से अब तक करीब 300 परिवारों के मकान सरयू नदी में समा चुके हैं। इसके सापेक्ष केवल सात परिवारों को आवासीय पट्टा मिल पाया है। पिछले वर्ष इसी क्षेत्र के 65 परिवारों के मकान नदी में विलीन हुए थे, लेकिन उन्हें अब तक पट्टा नहीं मिला। गोपालनगर के तत्कालीन क्षेत्रीय लेखपाल के अनुसार पिछले वर्ष मकान गंवाने वाले 37 लोगों को गोपालनगर में ही 15 गाटा नंबरों में भूमि चिह्नित की गई थी, लेकिन किन्हीं कारणों से अब तक पट्टा आवंटित नहीं हो सका। कई परिवार रामबालक बाबा आश्रम के पीछे बंधे पर रह रहे हैं। चांददियर मौजा में भी कटान पीड़ितों के पुनर्वास के लिए प्रयास हुआ, लेकिन रेलवे, वन और राजस्व विभाग के सीमांकन के अभाव में मामला अटका हुआ है।
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सरकारी आंकड़ों में 58.896 हेक्टेयर जमीन नदी में समाई
नदियों का कटान केवल घर ही नहीं उजाड़ रहा, बल्कि किसानों की उपजाऊ जमीन भी लगातार निगल रहा है। तहसील प्रशासन के वर्ष 2008-09 से 2014-15 तक के आंकड़ों के अनुसार 58.896 हेक्टेयर कृषि भूमि सरयू और गंगा में समा चुकी है। हालांकि ग्रामीणों का दावा है कि वास्तविक नुकसान सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है। उनका कहना है कि हर वर्ष सैकड़ों हेक्टेयर उपजाऊ जमीन नदी में कटती है, लेकिन उसका पूरा रिकॉर्ड दर्ज नहीं हो पाता। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2008-09 में 11.212 हेक्टेयर, वर्ष 2009-10 में 5.50 हेक्टेयर, वर्ष 2010-11 में 21.30 हेक्टेयर और वर्ष 2011-12 में 9.128 हेक्टेयर भूमि घाघरा और गंगा की धारा में समा गई। वर्ष 2012-13 में बहुआरा मौजा की 1.756 हेक्टेयर और वर्ष 2014-15 में करीब 10 हेक्टेयर से अधिक भूमि गंगा नदी की भेंट चढ़ी।



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1955 में बसाया गया था नया गांव, आज फिर विस्थापन का खतरा

जिला मुख्यालय से करीब 35 किलोमीटर दूर बैरिया विकासखंड के गंगापुर के हेमंतपुर, सुरेमनपुर और दुर्जनपुर को भी घाघरा नदी से विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था। वर्ष 1955 में स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस के सहपाठी शिक्षक स्व. धूपनारायण तिवारी के प्रयास से तत्कालीन जिलाधिकारी महमूद बट्ट ने जमीन अधिग्रहित कर इन परिवारों को व्यवस्थित तरीके से बसाया था। हेमंतपुर में गांधी चबूतरे का भी निर्माण कराया गया था। आज नदी की धारा और कटान का संकट इस पुनर्वास की कहानी को फिर दर्दनाक बना रहा है।

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बहुत से कटान पीड़ितों को आवासीय पट्टा उपलब्ध कराया जा चुका है। कुछ कटान पीड़ित वंचित हैं, उनके लिए ग्राम समाज की भूमि तलाशी जा रही है। पहले उपजाऊ भूमि के नदी में कटने पर मुआवजे का प्रावधान नहीं था, लेकिन नए शासनादेश के तहत अब उपजाऊ भूमि के नदी में समाहित होने पर मुआवजा दिया जाएगा। इस वर्ष कई किसानों को मुआवजा दिया गया है। शशिभूषण मिश्र, एसडीएम बैरिया
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-गंगा के जलस्तर में कमी लेकिन कटान में आई तेजी



फोटो-38--



बलिया। सरयू नदी के जलस्तर में घटाव के साथ ही कटान तेज हो गई है। गायघाट गेज पर शाम करीब चार बजे खतरा बिंदु 64.010 मीटर के सापेक्ष नदी 63.93 मीटर पर बह रही थी। गोपालनगर टांडी में सरयू नदी के कारण कटान हो रही है। ग्रामीणों का कहना है कि कटान की रफ्तार पर अंकुश नहीं लगा तो कई मकान इसकी जद में आ सकते हैं। चक्की नौरंगा के पूर्व प्रधान राजमंगल ठाकुर ने जिलाधिकारी को प्रतिवेदन देकर नौरंगा ग्राम पंचायत को कटान से बचाने के लिए तत्काल आवश्यक कदम उठाने की मांग की है। अधिशासी अभियंता संजय मिश्र ने बताया कि बाढ़ का पानी पूरी तरह हटने के बाद कटान की स्थिति का आकलन कर उसे रोकने के लिए आवश्यक उपाय किए जाएंगे।
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कटान पीड़ितों का दर्द--

फोटो--57 से 61 तक-

कटान में मेरा सबकुछ चला गया। परिवार के साथ सड़क किनारे रहना मेरी मजबूरी बन गई है। सरकार की तरफ से भूमि देने का वादा किया गया था लेकिन अभी तक नहीं मिली।
-बिगन राम

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सरकार की राह ताकते-ताकते सात साल गुजर गए लेकिन अभी तक केवल वादा ही मिला। अब जिंदगी किसी तरह से कट रही है। परिवार का पालन पोषण किसी तरह से हो रहा है।

-झागा बाबा
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नदी के कटान में अपना सबकुछ खो दिया। जमीन न होने के कारण बंधे पर शरण लिया हूं। सरकार ने कई बार भूमि आवंटन करने की घोषणा की लेकिन हमें अभी तक नहीं मिली।
-प्रभू नाथ

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नदी की कटान ने सबकुछ छीन लिया। जनप्रतिनिधि व प्रशासन हर साल आश्वासन देता है लेकिन मिलता कुछ नहीं है। गर्मी, सर्दी व बरसात में परिवार व पशुओं के साथ बंधे पर रहने के लिए मजबूर हूं।
-मुन्ना प्रसाद

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वर्ष - कटान पीड़ित
2023---80
2024---116
2025---68

2026---35 अब तक।
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