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सद्गुरु की संगत में जाने से मन को मिलती है शांति: विजय
Updated Sun, 24 Sep 2017 09:51 PM IST
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मनियर। मनुष्य का जीवन तभी सार्थक होता है, जब जीव परमात्मा की ओर अग्रसर होता है। मन इतना चंचल है कि हमेशा कहीं न कहीं लगा रहता है। यह परमात्मा की ओर कैसे उन्मुख होगा ? जब मनुष्य कोई तत्व ज्ञानी संत या सद्गुरू के संगत में जाएगा, तभी मन स्थिर होता है। उक्त बातें अयोध्या से पधारें विजय शरण दासजी महाराज ने मनियर कस्बा स्थित पूरब टोला बनवारी दासजी के मठिया में दुर्गा प्रतिमा के प्राण प्रतिष्ठा के लिए चल रहे शतचंडी महायज्ञ के दौरान शनिवार की रात अपने प्रवचन में कहीं।
कहा कि मनिषियों का कथन है कि मानव जहां भी रहे हमेशा स्व अध्याय व सत्कर्म में लगा रहे। आज मनुष्य विभिन्न प्रकार के साहित्य का अध्ययन करता है, लेकिन धार्मिक साहित्य का अध्ययन नहीं करता है। जिससे धर्म का ह्रास हो रहा है। किसी कार्य में रुचि रखने से वह कार्य सफल होता है । सद्गुरू से अर्जित किया गया मंत्र जीवन में सुख देने वाला होता है। तुलसीदास ने रामचरित मानस में सबसे पहले ब्राह्मण का वंदना किए हैं। ब्राम्हण के पास दया, तप, ज्ञान जैसे तत्व विराजमान होते हैं, कोई भी व्यक्ति लोभ छोड़ दें तो वह खुशहाल और मगन रहेगा। साधु व संत का चरित्र कपास के रूवे के समान साफ सुथरा होना चाहिए। ठाकुर मंदिर के पुजारी नारायण दास जी महराज के तत्वाधान में 21 सितम्बर 2017 से प्रारंभ है। जिसका समापन भंडारे के साथ 29 सितंबर2017 को होगा।
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कहा कि मनिषियों का कथन है कि मानव जहां भी रहे हमेशा स्व अध्याय व सत्कर्म में लगा रहे। आज मनुष्य विभिन्न प्रकार के साहित्य का अध्ययन करता है, लेकिन धार्मिक साहित्य का अध्ययन नहीं करता है। जिससे धर्म का ह्रास हो रहा है। किसी कार्य में रुचि रखने से वह कार्य सफल होता है । सद्गुरू से अर्जित किया गया मंत्र जीवन में सुख देने वाला होता है। तुलसीदास ने रामचरित मानस में सबसे पहले ब्राह्मण का वंदना किए हैं। ब्राम्हण के पास दया, तप, ज्ञान जैसे तत्व विराजमान होते हैं, कोई भी व्यक्ति लोभ छोड़ दें तो वह खुशहाल और मगन रहेगा। साधु व संत का चरित्र कपास के रूवे के समान साफ सुथरा होना चाहिए। ठाकुर मंदिर के पुजारी नारायण दास जी महराज के तत्वाधान में 21 सितम्बर 2017 से प्रारंभ है। जिसका समापन भंडारे के साथ 29 सितंबर2017 को होगा।
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