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गांवों से विलुप्त होने लगी है कजरी
Updated Wed, 02 Aug 2017 10:58 PM IST
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दयाछपरा। एक दौर था जब सावन शुरू होते है बारिश की फुहारों के संग पेड़ों पर झूले और कजरी की मिठास घुल जाती थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। पूरा सावन करीब-करीब बीतने को है, पर न कहीं झूला दिखाई दिया और न कहीं कजरी के बोल।
इसको लेकर बूढ़-पुरनियों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच गई हैं। दयाछपरा निवासी103 वर्षीय बुजुर्ग मोती फुवा बताते हैं कि पहिले गांव के लइकी सबके सावन के बहुते इंतज़ार रहत रहे। सावन में हर घर में झूला डाल के नाया-नाया कनिया संगे झूला झूलत खा कजरी के नाना प्रकार के गीत गावत रहनी सन...।
जिसके बोल कुछ इस प्रकार के हुआ करते थे। यह कजरी गीत पिया मेहदी मँगा द मोती झील से जा के साइकिल से ना पिया मेंहदी मंगा द छोटकी ननदी से पिसा द हमरा हथवा को चढ़ा द काटा किल से जाके साइकिल से ना...। हरी-हरी बाबा के दुवारिया मोरवा बोले ए हरी...। धनि हो खोल ना केवारिया हम बिदेसवा जाई बो ना...। गीत गाकर हास्य परिहास से मनोरंजन कराती थी, पर आज ये सब बीते जमाने की बात हो गई है। ननद भौजाइ का रिश्ता हास्य परिहास को छोड़ नदी के दो हिस्से हो गए हैं। रिश्तों में प्यार के अभाव में कजरी ही नहीं लोक परंपराएं गायब सी होती जा रही हैं। इस बाबत मिढ्ढी निवासी गीता चौबे ने बताया कि पहले प्रेम घर में ही नहीं आस-पड़ोस में भी था, टोला भर की लड़कियां एक जगह जुटकर कजरी गाया कराती थीं। आज प्रेम का आभाव है। एक जगह जुटना तो दूर सबसे मुलाक़ात भी महीनों बाद हो पाती है। परम्पराओं और संस्कृत की बात करने वाले पिछड़े माने जाने लगे हैं। हरपुर मिढ्ढी निवासी लक्ष्मी रूपेश का कहना है कि घर के काम बच्चों को तैयार करना टिफिन बनाना आदि कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती। थोड़ा बहुत दोपहर में समय भी मिलता है, तो कुछ सीरियल टीवी पर देख कर मनोरंजन हो जाता है, फिर कजरी क्या है। उन्हें नहीं मालूम।
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इसको लेकर बूढ़-पुरनियों के माथे पर भी चिंता की लकीरें खींच गई हैं। दयाछपरा निवासी103 वर्षीय बुजुर्ग मोती फुवा बताते हैं कि पहिले गांव के लइकी सबके सावन के बहुते इंतज़ार रहत रहे। सावन में हर घर में झूला डाल के नाया-नाया कनिया संगे झूला झूलत खा कजरी के नाना प्रकार के गीत गावत रहनी सन...।
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जिसके बोल कुछ इस प्रकार के हुआ करते थे। यह कजरी गीत पिया मेहदी मँगा द मोती झील से जा के साइकिल से ना पिया मेंहदी मंगा द छोटकी ननदी से पिसा द हमरा हथवा को चढ़ा द काटा किल से जाके साइकिल से ना...। हरी-हरी बाबा के दुवारिया मोरवा बोले ए हरी...। धनि हो खोल ना केवारिया हम बिदेसवा जाई बो ना...। गीत गाकर हास्य परिहास से मनोरंजन कराती थी, पर आज ये सब बीते जमाने की बात हो गई है। ननद भौजाइ का रिश्ता हास्य परिहास को छोड़ नदी के दो हिस्से हो गए हैं। रिश्तों में प्यार के अभाव में कजरी ही नहीं लोक परंपराएं गायब सी होती जा रही हैं। इस बाबत मिढ्ढी निवासी गीता चौबे ने बताया कि पहले प्रेम घर में ही नहीं आस-पड़ोस में भी था, टोला भर की लड़कियां एक जगह जुटकर कजरी गाया कराती थीं। आज प्रेम का आभाव है। एक जगह जुटना तो दूर सबसे मुलाक़ात भी महीनों बाद हो पाती है। परम्पराओं और संस्कृत की बात करने वाले पिछड़े माने जाने लगे हैं। हरपुर मिढ्ढी निवासी लक्ष्मी रूपेश का कहना है कि घर के काम बच्चों को तैयार करना टिफिन बनाना आदि कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती। थोड़ा बहुत दोपहर में समय भी मिलता है, तो कुछ सीरियल टीवी पर देख कर मनोरंजन हो जाता है, फिर कजरी क्या है। उन्हें नहीं मालूम।
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