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मनरेगा से निर्मित तालाबों की भी दशा दयनीय
Updated Sat, 24 Jun 2017 10:51 PM IST
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बलिया। मनरेगा की ओर से हर साल सैकड़ों तालाब तथा पोखरियों की खोदाई कराई जाती है लेकिन इसके बावजूद यह जल संचयन के लायक नहीं रहती। अधिकांश तालाब तथा पोखरियों पर अतिक्रमण होने के कारण ग्रामीण इलाकों में जल संचयन की व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। बताया जाता है कि तालाबों की खोदाई के नाम पर हर साल गड़बड़झाला किया जाता है।
वर्ष 2007-08 में मनरेगा के तहत हर गांवों में एक तालाब बनाने का अभियान चलाया गया। इसके अलावा गांवों में स्थित तालाबों को सफाई कराने का काम भी किया गया। वर्ष 2010-11 तक जिले में मनरेगा के तहत कुल 790 तालाबों का निर्माण कराया गया। हालांकि इसके बाद के सालों में हर साल औसत 250 से 300 तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाता रहा है। लेकिन इन तालाबों पर धीरे-धीरे अतिक्रमण होता गया और राजस्व विभाग की ओर से इसे रोकने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई। आलम यह है कि पिछले एक दशक में करीब करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गांवों में जल संचयन की माकूल व्यवस्था नहीं हो सकी है। अतिक्रमण के चलते एक ओर जहां तालाबों का दायरा सिमटता जा रहा है वहीं दूसरी शेष हिस्सा कूड़ा व विभिन्न घासों का जंगल होने के कारण जमीन के बराबर हो गया है।
बुजुर्गों की मानें तो गांवों में जगह-जगह तालाबों का इंतजाम किया गया था ताकि घरों से निकलने वाला पानी इसमें जमा हो सके। इससे पानी निकासी की समस्या नहीं होती थी वहीं दूसरी ओर गर्मी के दिनों में इन तालाबों में मवेशी जाकर घंटो रहा करते थे। उदाहरण के लिए सोहांव ब्लाक के भरौली गांव में वर्ष 2008-09 में लाखों रुपए खर्च कर तीन तालाबों की खोदाई मनरेगा के तहत की गई थी। लेकिन वर्तमान में इन तालाबों पर अतिक्रमण होने के एक ओर जहां इसका दायरा घट गया है वहीं दूसरी ओर घास व कूड़े से पटे होने कारण जल संचयन लायक नहीं रह गया है।
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जिले में मनरेगा से बने हैं 1200 तालाब
बलिया। वर्ष 2006-07 में जिले में मनरेगा का संचालन शुरु हुआ और वर्ष 2007-08 में ग्रामीण इलाकों में तालाब निर्माण व जीर्णोद्धार का अभियान चलाया गया। मनरेगा श्रम एवं रोजगार के उपायुक्त की मानें तो मनरेगा से बने जिले में कुल 1200 तालाब हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि अधिकांश तालाबों पर अतिक्रमण है। इसके चलते तालाबों का दायरा घटता जा रहा है।
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तालाबों के जीर्णोद्धार में किया गया खेल
बलिया। मनरेगा के तहत हर साल सैकड़ों तालाबों के जीर्णोद्धार पर करोड़ों का खेल’ किया जाता है। करोड़ों खर्च होने के बावजूद तालाबों का जल संचयन लायक नहीं होना जीर्णोद्धार के कार्य पर सवाल खड़ा करता है। हैरानी की बात है कि मनरेगा योजना के तहत जीर्णोद्धर किए गए तालाबों का कोई रकबा तक उपलब्ध नहीं है। खर्च का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है बीते तीन सालों में ही करीब 15 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। इसमें वर्ष 2014-15 में 320 तालाबों पर 4.12 करोड़, वर्ष 2015-16 में 570 तालाबों पर 7.24 करोड़ और वर्ष 2016-17 में 278 तालाबों पर 4.47 करोड़ की धनराशि खर्च की गई है। इसके अलावा मनरेगा की ओर से वर्ष 2017-18 में 323 तालाबों के जीर्णोद्धार के लिए तीन करोड़ 64 लाख 99 हजार का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
जल संचयन व जल संरक्षण के लिए हर साल ग्रामीण इलाकों में तालाबों का जीर्णोद्धार कराया जाता है। कहीं-कहीं नए तालाब का निर्माण भी कराया गया है। तालाबों पर अतिक्रमण के चलते कार्य कराने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
= यूके पाठक, उपायुक्त, श्रम एवं रोजगार, मनरेगा, बलिया
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वर्ष 2007-08 में मनरेगा के तहत हर गांवों में एक तालाब बनाने का अभियान चलाया गया। इसके अलावा गांवों में स्थित तालाबों को सफाई कराने का काम भी किया गया। वर्ष 2010-11 तक जिले में मनरेगा के तहत कुल 790 तालाबों का निर्माण कराया गया। हालांकि इसके बाद के सालों में हर साल औसत 250 से 300 तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाता रहा है। लेकिन इन तालाबों पर धीरे-धीरे अतिक्रमण होता गया और राजस्व विभाग की ओर से इसे रोकने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई। आलम यह है कि पिछले एक दशक में करीब करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गांवों में जल संचयन की माकूल व्यवस्था नहीं हो सकी है। अतिक्रमण के चलते एक ओर जहां तालाबों का दायरा सिमटता जा रहा है वहीं दूसरी शेष हिस्सा कूड़ा व विभिन्न घासों का जंगल होने के कारण जमीन के बराबर हो गया है।
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बुजुर्गों की मानें तो गांवों में जगह-जगह तालाबों का इंतजाम किया गया था ताकि घरों से निकलने वाला पानी इसमें जमा हो सके। इससे पानी निकासी की समस्या नहीं होती थी वहीं दूसरी ओर गर्मी के दिनों में इन तालाबों में मवेशी जाकर घंटो रहा करते थे। उदाहरण के लिए सोहांव ब्लाक के भरौली गांव में वर्ष 2008-09 में लाखों रुपए खर्च कर तीन तालाबों की खोदाई मनरेगा के तहत की गई थी। लेकिन वर्तमान में इन तालाबों पर अतिक्रमण होने के एक ओर जहां इसका दायरा घट गया है वहीं दूसरी ओर घास व कूड़े से पटे होने कारण जल संचयन लायक नहीं रह गया है।
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जिले में मनरेगा से बने हैं 1200 तालाब
बलिया। वर्ष 2006-07 में जिले में मनरेगा का संचालन शुरु हुआ और वर्ष 2007-08 में ग्रामीण इलाकों में तालाब निर्माण व जीर्णोद्धार का अभियान चलाया गया। मनरेगा श्रम एवं रोजगार के उपायुक्त की मानें तो मनरेगा से बने जिले में कुल 1200 तालाब हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि अधिकांश तालाबों पर अतिक्रमण है। इसके चलते तालाबों का दायरा घटता जा रहा है।
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तालाबों के जीर्णोद्धार में किया गया खेल
बलिया। मनरेगा के तहत हर साल सैकड़ों तालाबों के जीर्णोद्धार पर करोड़ों का खेल’ किया जाता है। करोड़ों खर्च होने के बावजूद तालाबों का जल संचयन लायक नहीं होना जीर्णोद्धार के कार्य पर सवाल खड़ा करता है। हैरानी की बात है कि मनरेगा योजना के तहत जीर्णोद्धर किए गए तालाबों का कोई रकबा तक उपलब्ध नहीं है। खर्च का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है बीते तीन सालों में ही करीब 15 करोड़ खर्च किए जा चुके हैं। इसमें वर्ष 2014-15 में 320 तालाबों पर 4.12 करोड़, वर्ष 2015-16 में 570 तालाबों पर 7.24 करोड़ और वर्ष 2016-17 में 278 तालाबों पर 4.47 करोड़ की धनराशि खर्च की गई है। इसके अलावा मनरेगा की ओर से वर्ष 2017-18 में 323 तालाबों के जीर्णोद्धार के लिए तीन करोड़ 64 लाख 99 हजार का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
जल संचयन व जल संरक्षण के लिए हर साल ग्रामीण इलाकों में तालाबों का जीर्णोद्धार कराया जाता है। कहीं-कहीं नए तालाब का निर्माण भी कराया गया है। तालाबों पर अतिक्रमण के चलते कार्य कराने में परेशानी का सामना करना पड़ता है।
= यूके पाठक, उपायुक्त, श्रम एवं रोजगार, मनरेगा, बलिया