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मेले में बेटियों की शादी के लिए सजती थी झांपी
Updated Mon, 13 Nov 2017 11:58 PM IST
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बलिया। ददरी मेला के मीना बाजार में रविवार के दिन से ही ठसाठस भीड़ देखने को मिल रही है। जहां लोगों के भीड़ को देख दूकानदार खुश है। वहीं मेले में आई महिलाओं ने अपने बेटियों की झांपी सजाने के लिए तैयारी शुरू कर दी है। मेले में आई दूकानों में स्टील के आलमीरा, बक्सा, दीवान की खरीदारी बढ़ गई।
महर्षि दर्दर मुनि के नाम पर लगने वाले मेले के मीना बाजार का काफी प्राचीन इतिहास रहा है। मुगल शासक अकबर के समय में मीना बाजार शुरू कराया गया था। प्राचीन काल से बाजार में न मिलने वाले समानों को महिलाएं मेले में खरीदती थी। लग्न से पहले शुरू होने वाले ददरी मेले की एक विशेषता थी कि जो सामान नगर के बाजार में नहीं मिल पाता था। उसे मेले में खरीदकर महिलाएं अपने विवाह योग्य बेटियों के लिए झांपियां सजाती थी। पिछले कई दशक से मेले में आ रहे दूकानदार रफीक बताते हैं कि करीब चार-पांच दशक से अपनी दूकान लेकर आते रहे हैं।
पहले लगन से संबंधित सामान पश्चिम बंगाल, बुलंदशहर, फिरोजाबाद सहित गैर प्रांतों से आती रही है। मेले में आने वाले दूकानदार पहले एक से बढ़कर एक सामान लाते थे। जिसे महिलाएं खरीदकर बेटियों की शादी के लिए बक्सा में रखती थी। मेले में लोहे के बक्से, आलमारी और झांपी मिल जाती थी। जिससे उनकेे शादी के बाद विदाई करने में सहूलियत होती थी। यह परंपरा अब भले ही कुछ कम हुई है। लेकिन अब शहर में ही ऐसे सामान मिल जाते थे। अब थोड़ी सी परंपरा लुप्त हो रही है। फिर भी दूकानें हर साल मेले में आती है।
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महर्षि दर्दर मुनि के नाम पर लगने वाले मेले के मीना बाजार का काफी प्राचीन इतिहास रहा है। मुगल शासक अकबर के समय में मीना बाजार शुरू कराया गया था। प्राचीन काल से बाजार में न मिलने वाले समानों को महिलाएं मेले में खरीदती थी। लग्न से पहले शुरू होने वाले ददरी मेले की एक विशेषता थी कि जो सामान नगर के बाजार में नहीं मिल पाता था। उसे मेले में खरीदकर महिलाएं अपने विवाह योग्य बेटियों के लिए झांपियां सजाती थी। पिछले कई दशक से मेले में आ रहे दूकानदार रफीक बताते हैं कि करीब चार-पांच दशक से अपनी दूकान लेकर आते रहे हैं।
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पहले लगन से संबंधित सामान पश्चिम बंगाल, बुलंदशहर, फिरोजाबाद सहित गैर प्रांतों से आती रही है। मेले में आने वाले दूकानदार पहले एक से बढ़कर एक सामान लाते थे। जिसे महिलाएं खरीदकर बेटियों की शादी के लिए बक्सा में रखती थी। मेले में लोहे के बक्से, आलमारी और झांपी मिल जाती थी। जिससे उनकेे शादी के बाद विदाई करने में सहूलियत होती थी। यह परंपरा अब भले ही कुछ कम हुई है। लेकिन अब शहर में ही ऐसे सामान मिल जाते थे। अब थोड़ी सी परंपरा लुप्त हो रही है। फिर भी दूकानें हर साल मेले में आती है।
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