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मटेरा में हैट्रिक लगेगी या नया इतिहास बनेगा
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बहराइच। परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई मटेरा विधानसभा के पिछले एक दशक में हुए दो चुनाव में यहां से लगातार सपा जीतती आ रही है। 18वीं विधानसभा के चुनाव में सपा ने यहां से पूर्व मंत्री व मटेरा विधायक की धर्मपत्नी को चुनाव मैदान में उतारा है। वर्ष 2012 में कांग्रेस व 2017 में भाजपा के बीच हुई कड़ी टक्कर के बाद दोनों राजनीतिक दलों ने अपने पुराने प्रत्याशी व बसपा ने नए चेहरे पर भरोसा जताकर चुनाव मैदान में उतारा है। अब देखना यह है कि भाजपा, बसपा व कांग्रेस सपा के विजय रथ को रोकने में कहां तक सफल हो पाते हैं। और सपा इस सीट पर अपनी हैट्रिक ला पाती है अथवा नहीं।
जिले में वर्ष 2008 में हुए परिसीमन के बाद मटेरा विधानसभा अस्तित्व में आई थी। चरदा विधानसभा का अस्तित्व समाप्त कर इसी सीट का गठन किया गया था। मटेरा जिले का एक छोटा सा कस्बा है। यह कस्बा 2008 से पहले रिसिया विकास खंड व नानपारा तहसील के एक हिस्से के रूप में अपनी पहचान समेटे हुए था। अस्तित्व में आने के बाद इस सीट पर पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 2012 और दूसरा चुनाव 2017 में हुआ था। इस सीट पर हुए पहले चुनाव में सपा के कद़्दावर नेता रहे पूर्व कबीना मंत्री डॉ. वकार अहमद शाह के पुत्र यासर शाह यहां से विधायक चुने गए थे।
यासर 2012 के चुनाव में 41 हजार 944 मत पाकर विजयी हुए थे। दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस के अली अकबर ने 39 हजार 143 मत मिले थे। यासर ने कांग्रेस प्रत्याशी को दो हजार 801 मतों से पराजित किया था। इसके बाद उस सीट पर हुए दूसरे चुनाव में मोदी लहर चलने के बावजूद यासर ने 79 हजार 188 मत पाकर बहुत ही नजदीकी हुए चुनाव में भाजपा के अरूणवीर सिंह को महज एक हजार 595 मतों से पराजित कर सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा था।
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अब 18वीं विधानसभा चुनाव में सपा आलाकमान ने इस सीट पर विधायक रहे पूर्व मंत्री यासर शाह की धर्मपत्नी मरजीना शाह को चुनाव मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने 2012 के उपविजेता रहे अली अकबर व भाजपा ने 2017 के उपविजेता अरूणवीर पर भरोसा कर चुनाव मैदान में उतारा है। बसपा ने भी नए मुस्लिम चेहरे पर भरोसा जताकर मैदान में उतारा है। अब देखना यह है कि भाजपा, बसपा व कांग्रेस सपा के विजय रथ को रोकने में कहां तक सफल होते हैं, या सपा इस सीट पर अपनी हैट्रिक लगाने में कहां तक कामयाब होती है। यह आने वाले 10 मार्च को चुनाव नतीजे ही बतायेंगे। फिलहाल सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी जीत की दावेदारी शुरू कर दी है। (संवाद)
सामाजिक ताना बाना
मटेरा विधानसभा सीट पर सामाजिक समीकरणों की बात करें, तो यहां हर जाति वर्ग के लोग रहते हैं, हालांकि इस सीट की गिनती मुस्लिम बाहुल्य सीट में होती है। अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता भी यहां अच्छी तादाद में हैं और सीट के चुनाव का परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसी का नतीजा था कि 2017 केे चुनाव में सपा के टिकट पर उतरे पूर्व मंत्री यासर शाह ने मोदी लहर के बीच भाजपा की चुनौती को ध्वस्त कर सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा था।
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जिले में वर्ष 2008 में हुए परिसीमन के बाद मटेरा विधानसभा अस्तित्व में आई थी। चरदा विधानसभा का अस्तित्व समाप्त कर इसी सीट का गठन किया गया था। मटेरा जिले का एक छोटा सा कस्बा है। यह कस्बा 2008 से पहले रिसिया विकास खंड व नानपारा तहसील के एक हिस्से के रूप में अपनी पहचान समेटे हुए था। अस्तित्व में आने के बाद इस सीट पर पहला विधानसभा चुनाव वर्ष 2012 और दूसरा चुनाव 2017 में हुआ था। इस सीट पर हुए पहले चुनाव में सपा के कद़्दावर नेता रहे पूर्व कबीना मंत्री डॉ. वकार अहमद शाह के पुत्र यासर शाह यहां से विधायक चुने गए थे।
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यासर 2012 के चुनाव में 41 हजार 944 मत पाकर विजयी हुए थे। दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस के अली अकबर ने 39 हजार 143 मत मिले थे। यासर ने कांग्रेस प्रत्याशी को दो हजार 801 मतों से पराजित किया था। इसके बाद उस सीट पर हुए दूसरे चुनाव में मोदी लहर चलने के बावजूद यासर ने 79 हजार 188 मत पाकर बहुत ही नजदीकी हुए चुनाव में भाजपा के अरूणवीर सिंह को महज एक हजार 595 मतों से पराजित कर सीट पर अपना कब्जा बनाए रखा था।
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अब 18वीं विधानसभा चुनाव में सपा आलाकमान ने इस सीट पर विधायक रहे पूर्व मंत्री यासर शाह की धर्मपत्नी मरजीना शाह को चुनाव मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने 2012 के उपविजेता रहे अली अकबर व भाजपा ने 2017 के उपविजेता अरूणवीर पर भरोसा कर चुनाव मैदान में उतारा है। बसपा ने भी नए मुस्लिम चेहरे पर भरोसा जताकर मैदान में उतारा है। अब देखना यह है कि भाजपा, बसपा व कांग्रेस सपा के विजय रथ को रोकने में कहां तक सफल होते हैं, या सपा इस सीट पर अपनी हैट्रिक लगाने में कहां तक कामयाब होती है। यह आने वाले 10 मार्च को चुनाव नतीजे ही बतायेंगे। फिलहाल सभी पार्टियों ने अपनी-अपनी जीत की दावेदारी शुरू कर दी है। (संवाद)
सामाजिक ताना बाना
मटेरा विधानसभा सीट पर सामाजिक समीकरणों की बात करें, तो यहां हर जाति वर्ग के लोग रहते हैं, हालांकि इस सीट की गिनती मुस्लिम बाहुल्य सीट में होती है। अन्य पिछड़ा वर्ग के मतदाता भी यहां अच्छी तादाद में हैं और सीट के चुनाव का परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसी का नतीजा था कि 2017 केे चुनाव में सपा के टिकट पर उतरे पूर्व मंत्री यासर शाह ने मोदी लहर के बीच भाजपा की चुनौती को ध्वस्त कर सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा था।