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Bahraich News: हिंदू कारीगर की कला से सजेंगे इमाम हुसैन की याद में ताजिए
Tue, 01 Jul 2025 11:11 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
Updated Tue, 01 Jul 2025 11:11 PM IST
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बलरामपुर के -इटईरामपुर नव्वा गांव में ताजिया बनाता मलखा। संवाद
गैड़ास बुजुर्ग/बलरामपुर। मुहर्रम की दस्तक के साथ बलरामपुर एक बार फिर गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। यहां के इटईरामपुर नव्वा गांव में ताजियों की तैयारी अंतिम दौर में है। लेकिन खास बात यह है कि इन्हें तैयार कर रहे हैं कुशीनगर जिले के पड़रौना गांव निवासी हिंदू कारीगर मलखा प्रसाद। इनके द्वारा बनाया गया सात लाख का ताजिया मुस्लिम समाज के लोगों में आकर्षण का केंंद्र बना हुआ है।
आमताैर पर मुस्लिम कारीगरों द्वारा राम, रावण व मेघनाथ आदि के पुतले बनाने की बात सुनने में आती है। वहीं हिंदू कारीगर द्वारा ताजिया बनाना सांप्रदायिक सौहार्द की एक प्रेरणादायक तस्वीर पेश करता है। मलखा प्रसाद पिछले तीन महीनों से अपनी टीम के साथ मुहर्रम के ताजिए बना रहे हैं। इनकी टीम में उमर अंसारी, अशफाक, जहांगीर और कयाम जैसे मुस्लिम सहयोगी भी हैं, जो मिलकर करीब सात लाख रुपये की लागत से ये खूबसूरत ताजिए तैयार किया हैं। यह ताजिया खासताैर पर मुस्लिम समाज के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
इन ताजियों को 9वीं मुहर्रम की रात चौक पर रखा जाएगा और चार दिन बाद उन्हें दफन किया जाएगा। इनकी सुंदरता और भव्यता देखते ही बन रही है। बलरामपुर में मनाया जाने वाला मुहर्रम प्रदेश ही नहीं, देश भर में प्रसिद्ध है। यहां के ताजिए न केवल स्थानीय चौक पर सजे नजर आते हैं, बल्कि मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में भी भेजे जाते हैं।
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ताजियादार मुस्तफा खान बताते हैं कि यह सिर्फ धर्म का नहीं, बल्कि इंसानियत और शहादत की याद का पर्व है। कहा कि गांव के चौक पर जब मलखा के हाथों से बने ताजिए रखे जाएंगे तो यह सिर्फ कला नहीं होगी। बल्कि भाईचारे, श्रद्धा और साझा संस्कृति का उत्सव होगा।
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आमताैर पर मुस्लिम कारीगरों द्वारा राम, रावण व मेघनाथ आदि के पुतले बनाने की बात सुनने में आती है। वहीं हिंदू कारीगर द्वारा ताजिया बनाना सांप्रदायिक सौहार्द की एक प्रेरणादायक तस्वीर पेश करता है। मलखा प्रसाद पिछले तीन महीनों से अपनी टीम के साथ मुहर्रम के ताजिए बना रहे हैं। इनकी टीम में उमर अंसारी, अशफाक, जहांगीर और कयाम जैसे मुस्लिम सहयोगी भी हैं, जो मिलकर करीब सात लाख रुपये की लागत से ये खूबसूरत ताजिए तैयार किया हैं। यह ताजिया खासताैर पर मुस्लिम समाज के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
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इन ताजियों को 9वीं मुहर्रम की रात चौक पर रखा जाएगा और चार दिन बाद उन्हें दफन किया जाएगा। इनकी सुंदरता और भव्यता देखते ही बन रही है। बलरामपुर में मनाया जाने वाला मुहर्रम प्रदेश ही नहीं, देश भर में प्रसिद्ध है। यहां के ताजिए न केवल स्थानीय चौक पर सजे नजर आते हैं, बल्कि मुंबई, कोलकाता जैसे बड़े शहरों में भी भेजे जाते हैं।
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ताजियादार मुस्तफा खान बताते हैं कि यह सिर्फ धर्म का नहीं, बल्कि इंसानियत और शहादत की याद का पर्व है। कहा कि गांव के चौक पर जब मलखा के हाथों से बने ताजिए रखे जाएंगे तो यह सिर्फ कला नहीं होगी। बल्कि भाईचारे, श्रद्धा और साझा संस्कृति का उत्सव होगा।