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Bahraich News: कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में होगा गैंडों का संरक्षण
Fri, 02 May 2025 12:34 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
Updated Fri, 02 May 2025 12:34 AM IST
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बहराइच। नेपाल के गैंडों को कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र अरसे से रास आ रहा है। पानी और नर्म घास की तलाश में नेपाल के रॉयल वर्दिया नेशनल पार्क से आने वाले गैंडे ट्रांस गेरुआ और खाता कॉरिडोर के रास्ते अब कतर्नियाघाट जंगल के होकर रह गए हैं। लगभग छह वयस्क और दो शिशु गैंडे इस समय कतर्नियाघाट के ग्रास लैंड में विचरण करते हुए दिखाई पड़ते हैं।
गैंडों को देखकर न सिर्फ जंगल आने वाले पर्यटक रोमांचित हो रहे हैं, बल्कि वन विभाग भी गदगद है। इन गैंडों के संरक्षण के लिए वन विभाग ने सुजौली और कतर्नियाघाट रेंज में विशेष परियोजना शुरू करने की कवायद की है। इसके लिए वन विभाग डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर काम कर रहा है।
कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र 551 वर्ग किमी में फैला हुआ है। यह जंगल बाघ, तेंदुआ और हाथी के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इसके अलावा हिरन की कई प्रजातियां तो मिलती ही हैं, जंगल से होकर बहने वाली नेपाल की गेरुआ नदी में डॉल्फिन और घड़ियाल भी संरक्षित वन क्षेत्र का आकर्षण बढ़ाते हैं।
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लेकिन अब कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र गैंडों के लिए भी जाना जाएगा। इसकी कवायद शुरू हो गई है कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के सुजौली और कतर्नियाघाट रेंज में गैंडा संरक्षण केंद्र बनाने की योजना पर अमल शुरू हो गया है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (विश्व प्रकृति निधि भारत) के साथ मिलकर वन विभाग इस परियोजना पर काम कर रहा है।
संख्या बढ़ने का कारण
कतर्नियाघाट सेंचुरी और नेपाल का रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क खाता काॅरिडोर और ट्रांस गेरुआ के रास्ते से जुड़े हुए हैं। ऐसे में आसानी से नेपाल के रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क के वन्य जीव और कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के वन्य जीवों का आवागमन एक दूसरी ओर होता रहता है।
कतर्नियां में नेपाल के रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क से आने वाले गैंडों का प्रवास स्थल अभी तक गेरुआ पार का जंगल था, लेकिन बीते दो साल से गैंडों ने नदी के इस पार बंधे के निकट के जंगल क्षेत्र को भी अपना प्रवास स्थल बना लिया है़।
सुजौली रेंज में स्थापित ग्रासलैंड गैंडों को काफी पसंद आ रहे हैं। जंगल में भी निरंतर पांच से छह गैंडों का मूवमेंट ग्रास लैंड में देखने को मिल रहा है। इससे लग रहा है़ कि इन्हें अब कतर्नियाघाट जंगल की आबोहवा रास आ रही है। जिससे नर्म घास और पानी की तलाश में आए गैंडे अब यहीं के होकर रह गए हैं।
डीएफओ ने बताया कि इन गैंडों के संरक्षण के लिए सुजौली और कतर्नियाघाट रेंज के अध्ययन में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की तकनीक मदद कर रही है।
गैंडों के अनुकूल है जंगल
गेरुआ के उस पार और इस पार घने जंगल के बीच छोटे-छोटे तालाब हैं, जिनमें शैवाल, कवक व मुलायम घास हैं। गैंडा पूरी तरह शाकाहारी होता है, शैवाल उसकी विशेष पसंद होती है। जंगल की इस आबोहवा के चलते ही कतर्नियाघाट जंगल को गैंगमेट ने अपना प्राकृतिक वास बनाया है़। डीएफओ ने कहा कि वन विभाग के साथ जंगल की सुरक्षा और संरक्षा के लिए कार्य कर रहीं स्वयंसेवी संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका है।
गैंडा संरक्षण नीति से हुआ फायदा
राज्य सरकार ने 2022 में गैंडा संरक्षण नीति लागू किया। इसी के बाद कतर्निया में गैंडों के ठहराव व पुनर्वास के लिए कार्य प्रारंभ हुआ। पहले चरण में सुरक्षा, खाने पीने योग्य वातावरण तैयार करने के साथ ही स्थानीय समुदाय को इसके लिए तैयार करने का कार्य हाे चुका है। अब गैंडे नेपाल से आ रहे हैं, उन्हें यहां नेचुरल वातावरण मिल रहा है। इसलिए उनका ठहराव भी हो रहा है। इधर कई बार गैंडों का पूरा कुटुंब देखने को मिला।
बी शिवशंकर डीएफओ
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गैंडों को देखकर न सिर्फ जंगल आने वाले पर्यटक रोमांचित हो रहे हैं, बल्कि वन विभाग भी गदगद है। इन गैंडों के संरक्षण के लिए वन विभाग ने सुजौली और कतर्नियाघाट रेंज में विशेष परियोजना शुरू करने की कवायद की है। इसके लिए वन विभाग डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर काम कर रहा है।
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र 551 वर्ग किमी में फैला हुआ है। यह जंगल बाघ, तेंदुआ और हाथी के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इसके अलावा हिरन की कई प्रजातियां तो मिलती ही हैं, जंगल से होकर बहने वाली नेपाल की गेरुआ नदी में डॉल्फिन और घड़ियाल भी संरक्षित वन क्षेत्र का आकर्षण बढ़ाते हैं।
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लेकिन अब कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र गैंडों के लिए भी जाना जाएगा। इसकी कवायद शुरू हो गई है कतर्नियाघाट सेंक्चुरी के सुजौली और कतर्नियाघाट रेंज में गैंडा संरक्षण केंद्र बनाने की योजना पर अमल शुरू हो गया है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (विश्व प्रकृति निधि भारत) के साथ मिलकर वन विभाग इस परियोजना पर काम कर रहा है।
संख्या बढ़ने का कारण
कतर्नियाघाट सेंचुरी और नेपाल का रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क खाता काॅरिडोर और ट्रांस गेरुआ के रास्ते से जुड़े हुए हैं। ऐसे में आसानी से नेपाल के रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क के वन्य जीव और कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के वन्य जीवों का आवागमन एक दूसरी ओर होता रहता है।
कतर्नियां में नेपाल के रॉयल बर्दिया नेशनल पार्क से आने वाले गैंडों का प्रवास स्थल अभी तक गेरुआ पार का जंगल था, लेकिन बीते दो साल से गैंडों ने नदी के इस पार बंधे के निकट के जंगल क्षेत्र को भी अपना प्रवास स्थल बना लिया है़।
सुजौली रेंज में स्थापित ग्रासलैंड गैंडों को काफी पसंद आ रहे हैं। जंगल में भी निरंतर पांच से छह गैंडों का मूवमेंट ग्रास लैंड में देखने को मिल रहा है। इससे लग रहा है़ कि इन्हें अब कतर्नियाघाट जंगल की आबोहवा रास आ रही है। जिससे नर्म घास और पानी की तलाश में आए गैंडे अब यहीं के होकर रह गए हैं।
डीएफओ ने बताया कि इन गैंडों के संरक्षण के लिए सुजौली और कतर्नियाघाट रेंज के अध्ययन में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की तकनीक मदद कर रही है।
गैंडों के अनुकूल है जंगल
गेरुआ के उस पार और इस पार घने जंगल के बीच छोटे-छोटे तालाब हैं, जिनमें शैवाल, कवक व मुलायम घास हैं। गैंडा पूरी तरह शाकाहारी होता है, शैवाल उसकी विशेष पसंद होती है। जंगल की इस आबोहवा के चलते ही कतर्नियाघाट जंगल को गैंगमेट ने अपना प्राकृतिक वास बनाया है़। डीएफओ ने कहा कि वन विभाग के साथ जंगल की सुरक्षा और संरक्षा के लिए कार्य कर रहीं स्वयंसेवी संस्थाओं की भी बड़ी भूमिका है।
गैंडा संरक्षण नीति से हुआ फायदा
राज्य सरकार ने 2022 में गैंडा संरक्षण नीति लागू किया। इसी के बाद कतर्निया में गैंडों के ठहराव व पुनर्वास के लिए कार्य प्रारंभ हुआ। पहले चरण में सुरक्षा, खाने पीने योग्य वातावरण तैयार करने के साथ ही स्थानीय समुदाय को इसके लिए तैयार करने का कार्य हाे चुका है। अब गैंडे नेपाल से आ रहे हैं, उन्हें यहां नेचुरल वातावरण मिल रहा है। इसलिए उनका ठहराव भी हो रहा है। इधर कई बार गैंडों का पूरा कुटुंब देखने को मिला।
बी शिवशंकर डीएफओ