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Bahraich News: कतर्नियाघाट में झुंड से बिछड़े पांच टस्कर हाथी मचा रहे उत्पात
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कतर्नियाघाट में बंधे पर दिखा हाथियों का झुंड।
- फोटो : कतर्नियाघाट में बंधे पर दिखा हाथियों का झुंड।
मिहींपुरवा। कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र में इन दिनों पांच टस्कर (दांत वाले नर) हाथियों की सक्रियता ने ग्रामीण इलाकों में दहशत है। वन विभाग के अनुसार ये हाथी मुख्य झुंड से अलग होकर इधर-उधर विचरण कर हमला कर रहे हैं, जिससे दो लोगों की मौत चुकी है और फसल नुकसान व संपत्ति का नुकसान हुआ है।
पिछले कुछ दिनों में सीमावर्ती गांवों में हाथियों के खेतों में घुसने, खड़ी फसल रौंदने और रात के समय आबादी के नजदीक पहुंचने की घटनाएं सामने आई हैं। रविवार रात कटियारा बीट में पुजारी सुरेश दास को हाथी ने पैरों से कुचलकर मार डाला। उसके एक दिन पहले हमले में लखीमपुर निवासी एक महिला की मौत हुई। ग्रामीणों का कहना है कि शाम ढलते ही लोग घरों में सिमटने को मजबूर हो रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर खास चिंता है।
वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार हाथियों के हमलों में दो मोतों के साथ ही कई बीघा फसल को नुकसान पहुंचा है। संवेदनशील गांवों आंबा, बर्दिया, विशुनापुर आदि में गश्त बढ़ा दी है। ड्रोन और ट्रैकिंग टीमों के जरिए हाथियों की लोकेशन पर नजर रखी जा रही है। ग्रामीणों को लाउडस्पीकर के माध्यम से सतर्क रहने और रात में खेतों की रखवाली अकेले न करने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि झुंड से अलग हुए टस्कर अधिक आक्रामक प्रवृत्ति के हो सकते हैं। भोजन और सुरक्षित मार्ग की तलाश में वे आबादी की ओर बढ़ते हैं, जिससे टकराव की स्थिति बनती है।
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संघर्ष कम करने की योजना पर हो रहा काम
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने बताया, कतर्नियाघाट क्षेत्र में पांच टस्कर हाथियों की गतिविधि की पुष्टि हुई है। हमारी टीमें लगातार मॉनिटरिंग कर रही हैं। जहां-जहां हाथियों की मूवमेंट है, वहां अलर्ट जारी किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए विभाग दीर्घकालिक योजना पर काम कर रहा है। इसमें हाथियों के पारंपरिक गलियारों की सुरक्षा, अवैध अतिक्रमण पर रोक और सामुदायिक जागरूकता अभियान शामिल है।
क्यों बढ़ रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष
कतर्नियाघाट जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में आबादी का विस्तार, खेतों का जंगल की सीमा तक पहुंचना और प्राकृतिक आवास में बदलाव भी संघर्ष का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। बीते वर्षों में तेंदुए, हाथी और अन्य वन्यजीवों की आबादी के संपर्क में आने की घटनाएं बढ़ी हैं।
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पिछले कुछ दिनों में सीमावर्ती गांवों में हाथियों के खेतों में घुसने, खड़ी फसल रौंदने और रात के समय आबादी के नजदीक पहुंचने की घटनाएं सामने आई हैं। रविवार रात कटियारा बीट में पुजारी सुरेश दास को हाथी ने पैरों से कुचलकर मार डाला। उसके एक दिन पहले हमले में लखीमपुर निवासी एक महिला की मौत हुई। ग्रामीणों का कहना है कि शाम ढलते ही लोग घरों में सिमटने को मजबूर हो रहे हैं। बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर खास चिंता है।
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वन विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार हाथियों के हमलों में दो मोतों के साथ ही कई बीघा फसल को नुकसान पहुंचा है। संवेदनशील गांवों आंबा, बर्दिया, विशुनापुर आदि में गश्त बढ़ा दी है। ड्रोन और ट्रैकिंग टीमों के जरिए हाथियों की लोकेशन पर नजर रखी जा रही है। ग्रामीणों को लाउडस्पीकर के माध्यम से सतर्क रहने और रात में खेतों की रखवाली अकेले न करने की सलाह दी गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि झुंड से अलग हुए टस्कर अधिक आक्रामक प्रवृत्ति के हो सकते हैं। भोजन और सुरक्षित मार्ग की तलाश में वे आबादी की ओर बढ़ते हैं, जिससे टकराव की स्थिति बनती है।
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संघर्ष कम करने की योजना पर हो रहा काम
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने बताया, कतर्नियाघाट क्षेत्र में पांच टस्कर हाथियों की गतिविधि की पुष्टि हुई है। हमारी टीमें लगातार मॉनिटरिंग कर रही हैं। जहां-जहां हाथियों की मूवमेंट है, वहां अलर्ट जारी किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए विभाग दीर्घकालिक योजना पर काम कर रहा है। इसमें हाथियों के पारंपरिक गलियारों की सुरक्षा, अवैध अतिक्रमण पर रोक और सामुदायिक जागरूकता अभियान शामिल है।
क्यों बढ़ रहा मानव-वन्यजीव संघर्ष
कतर्नियाघाट जैसे संवेदनशील वन क्षेत्र में आबादी का विस्तार, खेतों का जंगल की सीमा तक पहुंचना और प्राकृतिक आवास में बदलाव भी संघर्ष का एक बड़ा कारण माना जा रहा है। बीते वर्षों में तेंदुए, हाथी और अन्य वन्यजीवों की आबादी के संपर्क में आने की घटनाएं बढ़ी हैं।