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जंगल में जाना पड़ा सकता भारी

Sun, 20 Oct 2013 05:39 AM IST
Bahraich
Bahraich Updated Sun, 20 Oct 2013 05:39 AM IST
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बहराइच। इस समय जंगल में जाना खतरे से खाली नहीं है। बाघ और तेंदुए कभी भी आक्रामक हो सकते हैं। कारण इनके प्रजनन काल का शुरू होना है। इस समय एकांतवास पसंद करने वाले वन्यजीव दखलंदाजी के कारण ही हमला करते हैं। यही कारण है कि वन्यजीवों के हमले बढ़े हैं और वे सड़क व गांवों तक पहुंचने लगे हैं। ऐसे में सजगता से ही जान बचाई जा सकती है। जंगल सेे सटे इलाकों के लोगाें को विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है।
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कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र 551 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। जंगल में लगभग 36 बाघ और 50 तेंदुए हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों की मानें तो शीत ऋतु की दस्तक बाघ और तेंदुओं के प्रजननकाल की शुरुआत होती है। अक्तूबर के दूसरे पखवारे से 15 फरवरी तक का समय ऐसा होता है। जब प्रजननकाल के समय बाघ और तेंदुए भीड़भाड़ से बचना चाहते हैं, उनकी टेरेट्री (दायरा) में दखलंदाजी हमले का कारण बनती है। कतर्नियाघाट सेंक्चुरी में सप्ताह भर से अचानक बढ़े बाघ और तेंदुओं के हमलों का कारण भी यही माना जा रहा है। प्रभागीय वनाधिकारी आशीष तिवारी का कहना है कि मौसम में नमी आते ही बाघों व तेंदुओं का प्रजनन काल शुरू होता है। ऐसे में यह वन्यजीव अपने क्षेत्र में मनुष्यों की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं कर पाते। उन्होंने कहा कि अक्तूबर का अंतिम पखवारा तो प्रजननकाल की दस्तक है लेकिन एक नवंबर से 31 जनवरी तक जंगल में कतई प्रवेश नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस अवधि में कुछ वन्यजीव गांव व खुले स्थानाें पर पहुंच जाते हैं। उन्हें छेड़ने का प्रयास न करें।
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डब्ल्यूडब्ल्यूएफ (विश्व प्रकृतिनिधि भारत) के परियोजनाधिकारी दबीर हसन ने कहा कि अक्तूबर से फरवरी के बीच बाघ व तेंदुओं का व्यवहार भी परिवर्तित रहता है। ऐसे समय में कभी-कभी बाघ व तेंदुए आबादी की ओर भी रुख करते हैं, इसलिए उनकी आक्रामकता स्वयं बढ़ जाती है। चार माह का यह ऐसा समय है, जब जंगल से सटे गांव के लोगों को एहतियात बरतने की जरूरत होती है।
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अलर्ट की गई इको विकास समितियां
प्रभागीय वनाधिकारी ने कहा कि बाघ और तेंदुओं के हमलों को देखते हुए इको विकास समितियों के पदाधिकारियों को ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए अलर्ट किया गया है। निरंतर जागरूकता गोष्ठियों का भी आयोजन हो रहा है।

15 किलोमीटर की होती है टेरेट्री
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजनाधिकारी दबीर हसन ने बताया कि प्रजननकाल में बाघ अधिकर अपनी टेरेट्री में ही रहता है। उसकी टेरेट्री अधिकतम 15 किलोमीटर का होता है। इस क्षेत्रफल में बाघ को दखलंदाजी पसंद नहीं होती है।
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