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अभावों के बीच मेधावी बनी अंशू व गरिमा
Updated Sat, 10 Jun 2017 02:19 AM IST
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अभावों के बीच अंशू व गरिमा ने लिखी सफलता की इबारत
बहराइच। हर मां-बाप की इच्छा होती है कि उसके बेटे और बेटियां पढ़-लिखकर उनका नाम रोशन करें। समस्याओं के बावजूद माता-पिता संतानों की शिक्षा के लिए हर जुगत करते हैं। कुछ इन्हीं परिस्थितियों से अंशू और गरिमा भी गुजरी हैं। उन्होंने अभावों के बीच पढ़ाई पूरी कर अपनी सफलता की इबारत लिखी।
पयागपुर कांधी कुइयां गांव निवासी अंशू तिवारी के पिता बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक थे। लेकिन कुछ दिनों पूर्व वह बर्खास्त हो गए थे। ऐसे में खेती-किसानी कर परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। परिवारीजनों की इच्छा थी कि उनकी बेटी पढ़ लिखकर मिशाल बने। बेटी ने भी माता-पिता के अरमानों को पंख लगाने के लिए कड़ी मेहनत की। जिसका नतीजा यह हुआ कि 91 प्रतिशत अंक हासिल कर अंशू जिले के मेधावियों की सूची में शामिल हो गई। अंशू का कहना है कि गांव से स्कूल की दूरी पांच किलोमीटर है। प्रतिदिन पैदल जाकर शिक्षा ग्रहण करती थी। पैसे के अभाव में ट्यूशन नहीं कर सकी। घर पर ही पढ़ाई की। पिता और शिक्षकों ने सहयोग किया, जिसका नतीजा सफलता के रूप में सामने आया। उधर, पयागपुर के भूपगंज निवासी गरिमा त्रिपाठी रामनरायन इंटर कॉलेज खजुरी की इंटर की छात्रा थी। वह भी मेधावियों की सूची में अव्वल रही। गरिमा के पिता कॉलेज में अस्थायी शिक्षक हैं। मामूली वेतन मिलता है। खेती किसानी का ही सहारा है। लेकिन उन्होंने बेटी की पढ़ाई में कोर कसर बाकी नहीं रखी। गरिमा के पिता कृपाल त्रिपाठी कहते हैं कि अपने खर्चों में कटौती कर बेटी की पढ़ाई की जरूरतों को पूरा किया। जिले में अव्वल रहने पर काफी खुशी हो रही है।
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बहराइच। हर मां-बाप की इच्छा होती है कि उसके बेटे और बेटियां पढ़-लिखकर उनका नाम रोशन करें। समस्याओं के बावजूद माता-पिता संतानों की शिक्षा के लिए हर जुगत करते हैं। कुछ इन्हीं परिस्थितियों से अंशू और गरिमा भी गुजरी हैं। उन्होंने अभावों के बीच पढ़ाई पूरी कर अपनी सफलता की इबारत लिखी।
पयागपुर कांधी कुइयां गांव निवासी अंशू तिवारी के पिता बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक थे। लेकिन कुछ दिनों पूर्व वह बर्खास्त हो गए थे। ऐसे में खेती-किसानी कर परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। परिवारीजनों की इच्छा थी कि उनकी बेटी पढ़ लिखकर मिशाल बने। बेटी ने भी माता-पिता के अरमानों को पंख लगाने के लिए कड़ी मेहनत की। जिसका नतीजा यह हुआ कि 91 प्रतिशत अंक हासिल कर अंशू जिले के मेधावियों की सूची में शामिल हो गई। अंशू का कहना है कि गांव से स्कूल की दूरी पांच किलोमीटर है। प्रतिदिन पैदल जाकर शिक्षा ग्रहण करती थी। पैसे के अभाव में ट्यूशन नहीं कर सकी। घर पर ही पढ़ाई की। पिता और शिक्षकों ने सहयोग किया, जिसका नतीजा सफलता के रूप में सामने आया। उधर, पयागपुर के भूपगंज निवासी गरिमा त्रिपाठी रामनरायन इंटर कॉलेज खजुरी की इंटर की छात्रा थी। वह भी मेधावियों की सूची में अव्वल रही। गरिमा के पिता कॉलेज में अस्थायी शिक्षक हैं। मामूली वेतन मिलता है। खेती किसानी का ही सहारा है। लेकिन उन्होंने बेटी की पढ़ाई में कोर कसर बाकी नहीं रखी। गरिमा के पिता कृपाल त्रिपाठी कहते हैं कि अपने खर्चों में कटौती कर बेटी की पढ़ाई की जरूरतों को पूरा किया। जिले में अव्वल रहने पर काफी खुशी हो रही है।
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