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श्रद्धाभाव से की उत्तम आर्जव धर्म की पूजा
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बरनावा के श्री चंद्रप्रभु मंदिर में पूजा अर्चना करते श्रद्धालु।
- फोटो : BARAUT
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बिनौली (बागपत)। बरनावा के श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में पर्युषण पर्व माघ माह के उपलक्ष्य में ग्यारह दिवसीय दशलक्षण पर्व के तीसरे सोपान में सोमवार को श्रद्धालुओं ने उत्तम आर्जव धर्म मनाया। इस अवसर पर दस श्रीफल समर्पित कर पूजा-अर्चना की।
पंडित प्रदीप पीयूष शास्त्री के निर्देशन में जैन समाज के लोगों ने श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना की। उन्होंने कहा कि निष्कपट हृदय, सरल परिणाम का होना ही आर्जव भाव है। मन, वचन और काय इन तीनों के स्वरों में सामंजस्य स्थापित करना, मन आत्मा की एक अत्यंत अपूर्व शक्ति है। आत्मा ने ही जन्म दिया, मनुष्य को सर्वप्रथम स्वयं के मन पर विजय प्राप्त करने का प्रमाणित प्रयत्न करना चाहिए। जिसका मन उन्नत हो गया, सरल-शांत-सुदृढ़ हो गया। उनका जीवन उसका भाग्य भी श्रेष्ठ हो गया। श्रेष्ठ मन ही समस्त पापों का क्षय करने में समर्थ है। जन्म-जरा-मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए मन का सरल होना नितांत आवश्यक है। मायाचारी करने वाला, स्वयं अपने मन को ही निरंतर ठगता रहता है। मायाचारी करने वाला बाहर से तो जी हुजूरी करने वाला अत्यंत सरल व विनम्र प्राणी प्रतीत होता है। हालांकि भीतर से वह कुछ और ही होता है।
उन्होंने कहा कि कौरवों की मायाचारी के कारण ही गीता का उपदेश देना पड़ा। दुष्ट कौरवों ने लाक्षागृह बनाकर अपने ही भाइयों को भस्म करने का मायाजाल रचाया था। हम अपनी जिंदगी को कभी समीप से देखें तो एक वहद पिये का जीवन दिखाई देता है। हम मुखोटे की जिंदगी जीते हैं। कुटिलता हमारे जीवन का हिस्सा होती जा रही है। कैसे-कैसे लोग होते है। मेहंदी भरे हाथों में सरसों को बोते है। ये हमारी दशा है। सर्प जब चलता है, तो वह टेड़ा-मेढ़ा चलता है, परंतु जब बिल में जाता है तो सीधा हो जाता है। हम भी जब सरल होंगे। तब ही सुख-शांति प्राप्ति होगी। पूजा-अर्चना में मुकेश जैन, लोकेश जैन, सीता जैन, राजेेद्र जैन आदि उपस्थित रहे।
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पंडित प्रदीप पीयूष शास्त्री के निर्देशन में जैन समाज के लोगों ने श्रद्धाभाव से पूजा-अर्चना की। उन्होंने कहा कि निष्कपट हृदय, सरल परिणाम का होना ही आर्जव भाव है। मन, वचन और काय इन तीनों के स्वरों में सामंजस्य स्थापित करना, मन आत्मा की एक अत्यंत अपूर्व शक्ति है। आत्मा ने ही जन्म दिया, मनुष्य को सर्वप्रथम स्वयं के मन पर विजय प्राप्त करने का प्रमाणित प्रयत्न करना चाहिए। जिसका मन उन्नत हो गया, सरल-शांत-सुदृढ़ हो गया। उनका जीवन उसका भाग्य भी श्रेष्ठ हो गया। श्रेष्ठ मन ही समस्त पापों का क्षय करने में समर्थ है। जन्म-जरा-मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए मन का सरल होना नितांत आवश्यक है। मायाचारी करने वाला, स्वयं अपने मन को ही निरंतर ठगता रहता है। मायाचारी करने वाला बाहर से तो जी हुजूरी करने वाला अत्यंत सरल व विनम्र प्राणी प्रतीत होता है। हालांकि भीतर से वह कुछ और ही होता है।
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उन्होंने कहा कि कौरवों की मायाचारी के कारण ही गीता का उपदेश देना पड़ा। दुष्ट कौरवों ने लाक्षागृह बनाकर अपने ही भाइयों को भस्म करने का मायाजाल रचाया था। हम अपनी जिंदगी को कभी समीप से देखें तो एक वहद पिये का जीवन दिखाई देता है। हम मुखोटे की जिंदगी जीते हैं। कुटिलता हमारे जीवन का हिस्सा होती जा रही है। कैसे-कैसे लोग होते है। मेहंदी भरे हाथों में सरसों को बोते है। ये हमारी दशा है। सर्प जब चलता है, तो वह टेड़ा-मेढ़ा चलता है, परंतु जब बिल में जाता है तो सीधा हो जाता है। हम भी जब सरल होंगे। तब ही सुख-शांति प्राप्ति होगी। पूजा-अर्चना में मुकेश जैन, लोकेश जैन, सीता जैन, राजेेद्र जैन आदि उपस्थित रहे।
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