{"_id":"66d8ec7bb49382e12209b217","slug":"when-guruji-took-away-the-fear-of-science-he-became-a-scientist-baghpat-news-c-28-1-smrt1010-117656-2024-09-05","type":"story","status":"publish","title_hn":"Baghpat News: विज्ञान का गुरुजी ने निकाला डर तो बन गए वैज्ञानिक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Baghpat News: विज्ञान का गुरुजी ने निकाला डर तो बन गए वैज्ञानिक
Thu, 05 Sep 2024 04:55 AM IST
मेरठ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत
संवाद न्यूज एजेंसी, बागपत
Updated Thu, 05 Sep 2024 04:55 AM IST
विज्ञापन
बागपत। यहां ऐसे भी शिक्षक है, जिन्होंने अपने विद्यार्थियों को केवल शिक्षा ही नहीं दी। बल्कि इससे हटकर भी उनको मानसिक रूप से मजबूत बनाया तो आर्थिक रूप से कमजोर होने पर भी पढ़ाई में बाधा नहीं आने दी। वह विद्यार्थी भी आज देश व दुनिया में अपने गुरुओं का नाम रोशन कर रहे हैं। इन विद्यार्थियों ने खुद ही अपने गुरुओं के अपनी जिंदगी से जुड़े किस्सों को साझा किया।
अब्दुल कलाम और अन्य वैज्ञानिकों के बारे में बताकर मेरा डर निकाला
अमीनगर सराय के रहने वाले डाॅ. नीलेश पांडे बताते हैं कि मैं करीब 12 साल पहले कस्बे के सरस्वती शिशु मंदिर विद्या मंदिर इंटर काॅलेज में पढ़ाई कर रहा था। मुझे विज्ञान से डर लगता था और मैं विज्ञान से दूर भागता था। मैंने मन बना लिया था कि दसवीं में विज्ञान विषय नहीं लूंगा। मगर मेरे शिक्षक योगेश शर्मा ने मुझे डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम और अन्य कई बड़े वैज्ञानिकों के बारे में बताया कि किस तरह इन सभी का देश की तरक्की में योगदान रहा। मुझे कई दिन तक उन्होंने समझाया और मेरे अंदर से विज्ञान का डर निकाला तो मैंने विज्ञान विषय से पढ़ाई की। इसके बाद हरियाणा के कुरुक्षेत्र से बीटेक किया और कानुपर आईआईटी से एमटेक करने के बाद पीएचडी पूरी की। सेमी कंडक्टर की मेमोरी पर शोध करने के लिए देश के सबसे युवा वैज्ञानिक का खिताब मिला। इस समय मैं अमेरिका के टेक्सास में ऑस्टिन विवि में कार्यरत हूं। मुझे अमेरिका में भी युवा वैज्ञानिक का अवार्ड दिया गया। यह सबकुछ मेरे गुरुओं के सहारे ही हुआ है।
अखबार वितरण के साथ की पढ़ाई, गुरु की मदद से पहुंचा विदेश
ट्योढ़ी गांव के अमन कुमार ने बताया कि मैं कक्षा आठ में दाखिला लेने के लिए इंटरमीडिएट कॉलेज सरूरपुर खेडक़ी में पहुंचा तो मेरे पास पूरी फीस नहीं थी। क्योंकि उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और मैं अखबार वितरण करने के साथ ही पढ़ाई कर रहा था। तब मेरे प्रारंभिक गुरु डाॅ. राजबीर सिंह ने मेरी मदद की। मैं अखबार वितरण व घरेलू कार्यों के कारण कई बार काॅलेज में देरी से पहुंचता था। उनको पता था कि मैं बड़ौत से अखबार खरीदकर वितरित करता हूं और उसके बाद काॅलेज आता हूं। इसलिए गुरु डॉ़ राजबीर सिंह ने मुझे कभी देरी से पहुंचने पर कुछ नहीं कहा और मुझे समय प्रबंधन का पाठ अलग से पढ़ाया। जब मुझे पहली बार मलेशिया में अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस का निमंत्रण मिला तो उस समय गुरु डॉ़ राजबीर सिंह ने विद्यालय में प्रार्थना सभा में मेरी प्रशंसा की। डॉ़ राजबीर सिंह, प्रधानाचार्य होने के साथ ही हमारे अंग्रेजी के अध्यापक भी रहे। कक्षा में अक्सर अंग्रेजी का पाठ मुझसे ही कराते थे। जब मैंने पूछा कि गुरुजी आप अंग्रेजी का पाठ मुझसे ही क्यों कराते है तो उनका जवाब था, तुमको यहां नहीं रुकना है अमन। तुम्हें पूरे संसार की यात्रा करनी है। आज मुझे कई राष्ट्रीय अवार्ड भी मिल चुके हैं। मैं आज जिस भी मुकाम पर हूं, उसमें मेरे गुरु डॉ़ राजबीर सिंह का अहम योगदान है।
विज्ञापन
विज्ञापन
अब्दुल कलाम और अन्य वैज्ञानिकों के बारे में बताकर मेरा डर निकाला
अमीनगर सराय के रहने वाले डाॅ. नीलेश पांडे बताते हैं कि मैं करीब 12 साल पहले कस्बे के सरस्वती शिशु मंदिर विद्या मंदिर इंटर काॅलेज में पढ़ाई कर रहा था। मुझे विज्ञान से डर लगता था और मैं विज्ञान से दूर भागता था। मैंने मन बना लिया था कि दसवीं में विज्ञान विषय नहीं लूंगा। मगर मेरे शिक्षक योगेश शर्मा ने मुझे डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम और अन्य कई बड़े वैज्ञानिकों के बारे में बताया कि किस तरह इन सभी का देश की तरक्की में योगदान रहा। मुझे कई दिन तक उन्होंने समझाया और मेरे अंदर से विज्ञान का डर निकाला तो मैंने विज्ञान विषय से पढ़ाई की। इसके बाद हरियाणा के कुरुक्षेत्र से बीटेक किया और कानुपर आईआईटी से एमटेक करने के बाद पीएचडी पूरी की। सेमी कंडक्टर की मेमोरी पर शोध करने के लिए देश के सबसे युवा वैज्ञानिक का खिताब मिला। इस समय मैं अमेरिका के टेक्सास में ऑस्टिन विवि में कार्यरत हूं। मुझे अमेरिका में भी युवा वैज्ञानिक का अवार्ड दिया गया। यह सबकुछ मेरे गुरुओं के सहारे ही हुआ है।
विज्ञापन
अखबार वितरण के साथ की पढ़ाई, गुरु की मदद से पहुंचा विदेश
ट्योढ़ी गांव के अमन कुमार ने बताया कि मैं कक्षा आठ में दाखिला लेने के लिए इंटरमीडिएट कॉलेज सरूरपुर खेडक़ी में पहुंचा तो मेरे पास पूरी फीस नहीं थी। क्योंकि उस समय परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी और मैं अखबार वितरण करने के साथ ही पढ़ाई कर रहा था। तब मेरे प्रारंभिक गुरु डाॅ. राजबीर सिंह ने मेरी मदद की। मैं अखबार वितरण व घरेलू कार्यों के कारण कई बार काॅलेज में देरी से पहुंचता था। उनको पता था कि मैं बड़ौत से अखबार खरीदकर वितरित करता हूं और उसके बाद काॅलेज आता हूं। इसलिए गुरु डॉ़ राजबीर सिंह ने मुझे कभी देरी से पहुंचने पर कुछ नहीं कहा और मुझे समय प्रबंधन का पाठ अलग से पढ़ाया। जब मुझे पहली बार मलेशिया में अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस का निमंत्रण मिला तो उस समय गुरु डॉ़ राजबीर सिंह ने विद्यालय में प्रार्थना सभा में मेरी प्रशंसा की। डॉ़ राजबीर सिंह, प्रधानाचार्य होने के साथ ही हमारे अंग्रेजी के अध्यापक भी रहे। कक्षा में अक्सर अंग्रेजी का पाठ मुझसे ही कराते थे। जब मैंने पूछा कि गुरुजी आप अंग्रेजी का पाठ मुझसे ही क्यों कराते है तो उनका जवाब था, तुमको यहां नहीं रुकना है अमन। तुम्हें पूरे संसार की यात्रा करनी है। आज मुझे कई राष्ट्रीय अवार्ड भी मिल चुके हैं। मैं आज जिस भी मुकाम पर हूं, उसमें मेरे गुरु डॉ़ राजबीर सिंह का अहम योगदान है।
विज्ञापन