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निगरानी समितियों के पास गांवों में नहीं है संसाधन
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बड़ौत। कोरोना संक्रमण से निपटने के लिए प्रशासन निगरानी समितियों को सुदृढ़ करने में जुटा है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में गांव और मजरों में निगरानी समितियां खाली हाथ है। इनके पास थर्मल स्क्रीनिंग करने जैसी सुविधाएं नहीं हैं। समितियों की भूमिका सूचना देने तक ही सीमित है।
तहसील क्षेत्र के तीन ब्लाक बड़ौत, बिनौली व छपरौली के अंतर्गत 126 ग्राम पंचायतें आती हैं। प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक निगरानी समिति बनाई गई है, यानी तहसील में कुल 126 निगरानी समितियां बनाई हैं। इन समितियों में राजस्व कर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि, आशा कार्यकर्ता आदि को शामिल किया गया है। निगरानी समितियों को बाहरी क्षेत्र से आने वाले लोगों की निगरानी और परीक्षण का जिम्मा देने के साथ सफाई, सैनिटाइजेशन आदि कामों के लिए भी कहा गया है। खास बात तो यह है कि निगरानी समितियां बन तो गईं, लेकिन किसी भी संदिग्ध रोगी की थर्मल स्क्रीनिंग करने तक के संसाधन नहीं हैं। जो सक्रिय निगरानी समितियां हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधि भी अभी अधिकार में न होने के कारण चुप्पी साधे हैं।
पहली लहर पर भी नहीं जुटाए संसाधन
बड़ौत। वैसे तो कोरोना की पहली लहर ने ग्रामीण क्षेत्रों को ज्यादा प्रभावित नहीं किया, ऐसे में पंचायतीराज विभाग ने भी संसाधनों पर गौर नहीं किया। ग्राम पंचायतों में लाखों रुपया बजट विकास कार्यों पर खर्च हुआ, लेकिन प्रधानों ने थर्मल स्कैनर और कोरोना से निपटने जैसे संसाधन नहीं जुटाए। सैनिटाइजेशन तक के लिए पंचायतों पर निजी व्यवस्थाएं नहीं हैं।
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ये बोले बीडीओ------
बड़ौत। इस संबंध में जब बीडीओ राहुल वर्मा से बातचीत की गयी तो उनका कहना है कि निगरानी समितियों के फीडबैक पर संबंधित विभागों से तत्काल कार्रवाई कराई जा रही है। प्रधानों को भी सफाई और शासन के निर्देशानुसार कोविड से निपटने के इंतजाम करने को कहा गया है।
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तहसील क्षेत्र के तीन ब्लाक बड़ौत, बिनौली व छपरौली के अंतर्गत 126 ग्राम पंचायतें आती हैं। प्रत्येक ग्राम पंचायत में एक निगरानी समिति बनाई गई है, यानी तहसील में कुल 126 निगरानी समितियां बनाई हैं। इन समितियों में राजस्व कर्मी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि, आशा कार्यकर्ता आदि को शामिल किया गया है। निगरानी समितियों को बाहरी क्षेत्र से आने वाले लोगों की निगरानी और परीक्षण का जिम्मा देने के साथ सफाई, सैनिटाइजेशन आदि कामों के लिए भी कहा गया है। खास बात तो यह है कि निगरानी समितियां बन तो गईं, लेकिन किसी भी संदिग्ध रोगी की थर्मल स्क्रीनिंग करने तक के संसाधन नहीं हैं। जो सक्रिय निगरानी समितियां हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में नवनिर्वाचित जनप्रतिनिधि भी अभी अधिकार में न होने के कारण चुप्पी साधे हैं।
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पहली लहर पर भी नहीं जुटाए संसाधन
बड़ौत। वैसे तो कोरोना की पहली लहर ने ग्रामीण क्षेत्रों को ज्यादा प्रभावित नहीं किया, ऐसे में पंचायतीराज विभाग ने भी संसाधनों पर गौर नहीं किया। ग्राम पंचायतों में लाखों रुपया बजट विकास कार्यों पर खर्च हुआ, लेकिन प्रधानों ने थर्मल स्कैनर और कोरोना से निपटने जैसे संसाधन नहीं जुटाए। सैनिटाइजेशन तक के लिए पंचायतों पर निजी व्यवस्थाएं नहीं हैं।
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ये बोले बीडीओ------
बड़ौत। इस संबंध में जब बीडीओ राहुल वर्मा से बातचीत की गयी तो उनका कहना है कि निगरानी समितियों के फीडबैक पर संबंधित विभागों से तत्काल कार्रवाई कराई जा रही है। प्रधानों को भी सफाई और शासन के निर्देशानुसार कोविड से निपटने के इंतजाम करने को कहा गया है।