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Baghpat News: जितना-जितना छोड़ते जाओगे उतनी सुख-शांति की वृद्धि होगी
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-दिगंबर जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने किए प्रवचन
संख्या 3
बड़ौत। दिगंबर जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि जितना-जितना आप परिग्रह जोड़ोंगे, उतना-उतना अशांति, दुःख को प्राप्त करोगे। वहीं जितना-जितना छोड़ते जाओगे उतनी सुख-शांति की वृद्धि होगी।
जैनमुनि मंगलवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की जितनी-जितनी आसक्ति रहती है, राग रूप परिणति होती है, कषाय परिणाम होता है, उतना-उतना कर्म का आसव-बंध होता है। निरन्तर कषाय को मंद करो। कषाय से बचो। कषाय कष्टकारी ही होती है। कषाय की एक कणिका साधना को भंग कर देती है, जिस प्रकार विष का एक कण भोजन को विषाक्त कर देता है। तपस्या, साधना कोई मनोरंजन नहीं है, जो हंसी-हंसी में भी त्यागी की उपेक्षा करता है, उसकी दुर्गति निश्चित है। त्यागी-व्रती, महात्माओं की सेवा करो, गुरुओं के उपदेश सुनो और कष्टों से दूर होने का उपाय करो। धर्म-धर्मात्माओं की रक्षा करो। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में प्रवीण जैन, सुनील जैन, अतुल जैन, विनोद एडवोकेट, मनोज जैन, पुनीत जैन, राकेश सभासद शामिल रहे।
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संख्या 3
बड़ौत। दिगंबर जैनाचार्य विशुद्धसागर महाराज ने कहा कि जितना-जितना आप परिग्रह जोड़ोंगे, उतना-उतना अशांति, दुःख को प्राप्त करोगे। वहीं जितना-जितना छोड़ते जाओगे उतनी सुख-शांति की वृद्धि होगी।
जैनमुनि मंगलवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि व्यक्ति की जितनी-जितनी आसक्ति रहती है, राग रूप परिणति होती है, कषाय परिणाम होता है, उतना-उतना कर्म का आसव-बंध होता है। निरन्तर कषाय को मंद करो। कषाय से बचो। कषाय कष्टकारी ही होती है। कषाय की एक कणिका साधना को भंग कर देती है, जिस प्रकार विष का एक कण भोजन को विषाक्त कर देता है। तपस्या, साधना कोई मनोरंजन नहीं है, जो हंसी-हंसी में भी त्यागी की उपेक्षा करता है, उसकी दुर्गति निश्चित है। त्यागी-व्रती, महात्माओं की सेवा करो, गुरुओं के उपदेश सुनो और कष्टों से दूर होने का उपाय करो। धर्म-धर्मात्माओं की रक्षा करो। सभा का संचालन पंडित श्रेयांस जैन ने किया। सभा में प्रवीण जैन, सुनील जैन, अतुल जैन, विनोद एडवोकेट, मनोज जैन, पुनीत जैन, राकेश सभासद शामिल रहे।
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