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तीन तलाक मजहबी मसला, दखल का हक नहीं

Sat, 20 May 2017 12:43 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Updated Sat, 20 May 2017 12:43 AM IST
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बागपत। तीन तलाक के मामले में छह दिन तक सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित कर लिया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में कहा देशभर के काजी को निकाहनामा की नई एडवाइजरी भेजी जाएगी। इस पर समाज के लोगों की अपनी-अपनी राय है। मुस्लिम समाज के कुछ लोगों ने कहा सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद ही वह कुछ कह सकते हैं।
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जामिया इशातुल इस्लाम शांति केंद्र, रठौड़ा के राशिद अहमद कासमी ने कहा  तीन तलाक पर देशभर में राजनीति की जा रही है। इसे सिर्फ अपनी-अपनी इज्जत का मसला बना लिया है। तीन तलाक इस्लाम धर्म का एक मजहबी कानून है। इसमें कोई भी छेड़छाड़ या बदलाव नहीं किया जा सकता है। शरीयत के कानून के हिसाब से ही तीन तलाक दिया जा सकता है, एक साथ खड़े होकर तीन तलाक कह देना ही तीन तलाक नहीं है।
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रठौड़ा के ही मुदस्सिर बासिर ने कहा शरई कानून में पहले एक तलाक का नियम है। इसके बाद दंपति को कुछ समय दिया जाता है, ताकि वह एक-दूसरे को समझ सकें। किसी भी निभाव की स्थिति में दूसरा और फिर तीसरे तलाक की नौबत आती है। कुछ लोग एक साथ खड़े होकर तीन तलाक बोल देने को ही तीन तलाक मानते हैं। मुस्लिम समाज में जागरूकता की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट का अभी फैसला नहीं आया है, जैसे ही फैसला आया है, तभी इस पर कोई प्रतिक्रिया दी जा सकती है। 
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