हजारों साल से हो रही मां भगवती की आराधना
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पूर्वी बंगाल की उर्वरा भूमि के मध्य स्थिति त्रिपुरा राज्य के शासकों ने अपने राज्य में विनिमय के साधन के तौर पर उपयोग की जाने वाली चांदी धातु से निर्मित टंका नामक मुद्रा प्रचलित की। इन पर उन्होंने हिंदू देवी और देवता की भक्ति भावना से प्रेरित होकर अपने आराध्य का अंकन किया। वर्ष 1532 से 1564 ई तक त्रिपुरा के हिंदू साम्राज्य पर सम्राट विजय माणिक्य ने शासन किया।
विजय माणिक्य ने अपने पूर्व वर्त्ती शासकों द्वारा प्रचलन में लाई हिंदू देवी और देवता के अंकन से युक्त मुद्रा के ही आधार पर रजत मुद्राएं एक अलग ही प्रकार से तैयार कराई। शहजाद राय शोध संस्थान में मौजूद नारी शक्ति की आराधना का दिग्दर्शन कराने वाली त्रिपुरा राज्य की रजत मुद्रा में सम्राट विजय माणिक्य की मुद्रा महत्वपूर्ण है। देवी भगवती दुर्गा के अंकन युक्त रजत मुद्रा पर किए विशिष्ठ अनुसंधान के परिणामों पर प्रकाश डालकर संस्थान के निदेशक अमित राय जैन बताते है 15वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में त्रिपुरा क्षेत्र पर हिंदू शासकों का साम्राज्य था, जो हिंदू देवियों के उपासक थे।
अपनी उपासना भक्ति को आम जन तक पहुंचाने के लिए उन्होंने अपने चांदी के सिक्कों पर देवी दुर्गा का अंकन किया, जो शेर पर सवार है और उनकी बराबर में भगवान शिव का भी अंकन कराया, जो अपनी सवारी नंदी बैल पर बैठे हैं। यह रजत मुद्रा आज वर्तमान में नवरात्रों के दौरान नव देवियों की विशेष आराधना करने वाले भक्तों के लिए विशेष श्रद्धा का आधार है, क्योंकि इनके ऊपर उनकी आराध्य देवियों का अंकन अत्यंत श्रद्धा पूर्वक किया गया है। त्रिपुरा साम्राज्य के शासकों द्वारा हिंदू देवियों के अंकन से युक्त रजत मुद्रा के अध्ययन से यह भी पता चलता है कि यह सिक्के प्रचलित करने का उद्देश्य साम्राज्य में शांति, देवियों की आराधना व प्रकृति का आदर रहा है।