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नमाज और रोजे की तरह जकात करना भी फर्ज
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संवाद न्यूज एजेंसी
अग्रवाल मंडी टटीरी। रमजान का दूसरा असरा मगफिरत का चल रहा है। रमजान माह में रोजे रखने की तरह जकात को भी फर्ज बताया है। जकात का मतलब हैं दान देना। अपनी आय के एक हिस्से को गरीबों में बांटने को ही जकात कहा जाता है। नमाज और रोजे की तरह जकात करना भी फर्ज है।
हाफिज अय्यूब ने बताया कि साढ़े बावन तोला चांदी या फिर साढ़े सात तोला सोना होना या इनके बराबर की रकम (पैसा) जिस मुसलमान के पास हैं, उस पर जकात फर्ज हो जाती हैं। एक साल का समय बीत जाने के बाद जकात दी जाती है। हर साल जकात देना फर्ज होता हैं। जकात को पूरे साल भर में कभी भी दिया जा सकता है। मगर, अधिकतर जकात को रमजान माह में दिया जाता है। इस माह में जकात देने से ज्यादा सबाब मिलता है। जकात का सबसे पहला फर्ज रिश्तेदारों और पड़ोसियों पर है। रिश्तेदारों में कोई गरीब है तो उसको जकात दिया जा सकता है। पड़ोस में रहने वाले गरीब, यतीम, विधवा महिलाओं को जकात दी जा सकती है। इसके अलावा मदरसों में जहां पर यतीम बच्चे पढ़ते हो, वहां पर भी जकात को दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि जकात के लिए शरीयत में नियम बनाए हैं। अपनी कुल आय का ढाई प्रतिशत हिस्सा जकात में दिया जाता हैं। जो कर्जदार होता हैं, उस पर जकात फर्ज नहीं हैं। कर्ज न होने के बावजूद जकात को न देने वाले मुसलमान को फर्ज को छोड़ने की बराबर गुनाह मिलता है। रमजान माह में इसी तरह से सदका-ए-फित्र भी देना वाजिब है। सदका-ए-फित्र हर मालदार पर वाजिब है। जिस पर जकात फर्ज है, उस पर सदका-ए-फित्र भी फर्ज है। सदका-ए-फित्र अदा करने की वजह यह है ताकि गरीब, यतीम, नादार (कमजोर) लोग भी ईद की खुशियों में शरीक होकर खुशियां मना सकें।
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अग्रवाल मंडी टटीरी। रमजान का दूसरा असरा मगफिरत का चल रहा है। रमजान माह में रोजे रखने की तरह जकात को भी फर्ज बताया है। जकात का मतलब हैं दान देना। अपनी आय के एक हिस्से को गरीबों में बांटने को ही जकात कहा जाता है। नमाज और रोजे की तरह जकात करना भी फर्ज है।
हाफिज अय्यूब ने बताया कि साढ़े बावन तोला चांदी या फिर साढ़े सात तोला सोना होना या इनके बराबर की रकम (पैसा) जिस मुसलमान के पास हैं, उस पर जकात फर्ज हो जाती हैं। एक साल का समय बीत जाने के बाद जकात दी जाती है। हर साल जकात देना फर्ज होता हैं। जकात को पूरे साल भर में कभी भी दिया जा सकता है। मगर, अधिकतर जकात को रमजान माह में दिया जाता है। इस माह में जकात देने से ज्यादा सबाब मिलता है। जकात का सबसे पहला फर्ज रिश्तेदारों और पड़ोसियों पर है। रिश्तेदारों में कोई गरीब है तो उसको जकात दिया जा सकता है। पड़ोस में रहने वाले गरीब, यतीम, विधवा महिलाओं को जकात दी जा सकती है। इसके अलावा मदरसों में जहां पर यतीम बच्चे पढ़ते हो, वहां पर भी जकात को दिया जाना चाहिए।
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उन्होंने कहा कि जकात के लिए शरीयत में नियम बनाए हैं। अपनी कुल आय का ढाई प्रतिशत हिस्सा जकात में दिया जाता हैं। जो कर्जदार होता हैं, उस पर जकात फर्ज नहीं हैं। कर्ज न होने के बावजूद जकात को न देने वाले मुसलमान को फर्ज को छोड़ने की बराबर गुनाह मिलता है। रमजान माह में इसी तरह से सदका-ए-फित्र भी देना वाजिब है। सदका-ए-फित्र हर मालदार पर वाजिब है। जिस पर जकात फर्ज है, उस पर सदका-ए-फित्र भी फर्ज है। सदका-ए-फित्र अदा करने की वजह यह है ताकि गरीब, यतीम, नादार (कमजोर) लोग भी ईद की खुशियों में शरीक होकर खुशियां मना सकें।
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