फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Baghpat News ›   Handling children in the Corona era became a challenge for parents

कोरोना काल में बच्चों को संभालना बना अभिभावकों के लिए चुनौती

Fri, 14 May 2021 10:31 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 14 May 2021 10:31 PM IST
विज्ञापन
Handling children in the Corona era became a challenge for parents
बड़ौत। स्कूल बंद होने से बच्चे घरों में कैद हैं। आनलाइन पढ़ाई के लिए अभिभावकों ने बच्चों को मोबाइल थमा दिए हैं। अधिकतर बच्चों को गेम खेलने की लत लग गई है। जिसका असर बच्चों पर पढ़ रहा है। बच्चे अभिभावकों को जवाब ही नहीं दे रहे हैं बल्कि चिड़चिड़े भी हो गए हैं। बच्चे धीरे-धीरे इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर का शिकार हो रहे हैं। जिद्दी और चिड़चिड़े हो चुके बच्चों के अभिभावक अब मनोचिकित्सक की मदद ले रहे हैं। गांधी रोड स्थित अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ दिनेश बंसल का कहना है कि यह एक मनोरोग है, जिसे इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर कहते हैं।
विज्ञापन

केस नंबर एक-----
-नगर निवासी प्रभा देवी व बबीता का कहना है कि कोरोना काल में घर के काम के साथ-साथ बच्चों पर ध्यान देना भी चुनौती बन गया है। ऑनलाइन क्लास के बहाने बच्चे मोबाइल पर गेम खेल रहे हैं।
विज्ञापन

केस नंबर दो------
- बड़ौली गांव निवासी कपिल का कहना है कि बच्चा कक्षा ग्यारह में है। ऑनलाइन पढ़ाई के लिए मोबाइल दिया था, लेकिन बच्चों का ज्यादा ध्यान गेम खेलने में रहता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

क्या है इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर-
- गेमिंग डिसऑर्डर मूलत: व्यवहार से जुड़ी बीमारी है। वर्ष 2018 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी गेमिंग डिसऑर्डर को अंतरराष्ट्रीय बीमारी की श्रेणी में शामिल किया था। इंटरनेट गेमिंग डिसऑर्डर इससे मिलती-जुलती बीमारी है, जिसे अमेरिकन साइकेटिक एसोसिएशन ने सबसे पहले बीमारी के रूप में स्वीकारा था। इस श्रेणी को आइसीडी-11 भी कहते हैं, जिसमें इलाज के लिए इलाज की जरूरत पड़ती है। इस बीमारी में बच्चा यह तय नहीं कर पाता कि वह कितना समय डिजिटल या मोबाइल गेम खेलकर बिताए।

ये बोली मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष-----
- दिगंबर जैन डिग्री कॉलेज में मनोविज्ञान विभागाध्यक्ष डॉ. अंशु अग्रवाल का कहना है कि बच्चों के बदलते व्यवहार से अभिभावक परेशान हैं। ऐसे बच्चों की काउंसिलिंग जरूरी है। बच्चे ही नहीं 25 साल की उम्र के नीचे के युवा भी प्रभावित हैं।
यह हैं लक्ष्ण-----
1- परिवार, सामाजिक जीवन, शिक्षा और खुद के निजी जीवन पर भी गेम हावी रहता है।
2- गेम खेलने की आदत पर नियंत्रण न रख पाना।
3- चिड़चिड़ापन और उग्रता बढ़ती है।
4-गेम को ही प्राथमिकता देना।
क्या हो सकती हैं समस्याएं
बच्चे। बच्चों में डिप्रेशन, स्ट्रेस, अनिद्रा की शिकायतें बढ़ती हैं। ऐसे बच्चों में मोटापा की समस्या भी बढ़ जाती है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed