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Baghpat News: सज्जन-पुरुष प्राणों से अधिक 'प्रण' को महत्त्व देते हैं
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-ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा मेें बोले विशुद्धसागर महाराज
फोटो संख्या 8
बड़ौत। दिगम्बराचार्य विशुद्धसागर ने कहा कि सज्जन-पुरुष प्राणों से अधिक 'प्रण' को महत्त्व देते हैं। इसलिए मनुष्य को सोच-समझकर बोलना चाहिए।
जैनमुनि शनिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा मेें बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि गुणी-जनो का गुणानुवाद सज्जनों द्वारा ही किया जाता है। दुर्जन-पुरुष गुणी-जनो के भी गुणों का करता है। गान नहीं होता है, गुणीजनों के गुणानुवाद से सौभाग्य का जागरण पुण्य के कोश भरते हैं, पाप का क्षय होता है। संसार की सर्व-सम्पत्तियां गुरुओं के गुणगान एवं प्रभु भक्ति से सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। सत्ता के राग में व्यक्ति सत्य का बोध नहीं कर पाता। पक्षपात, अंध-भक्ति सत्य पर पहुंचने ही नहीं देती है। कषाय युक्त मानव सत्य को नहीं कहता है। सत्य जानना, सत्य सुनना एवं सत्य-मार्ग का अनुसरण करना अत्यंत कठिन है। सत्य बोध एवं सत्याचरण श्रम-साध्य है। सत्य का अन्वेषण महा पुरुष ही कर पाते हैं। 'दृढधर्मी प्रियधर्मी' होना चाहिए। जो अपने धर्म में, जो अपनी प्रतिज्ञा में दृढ़ होता है वही लोक में प्रसिद्धि को प्राप्त होता है। अपने व्रतों के प्रति अपने धर्म के प्रति समर्पण होना चाहिए। जो धर्मप्रिय होता है, वही शांति प्राप्त कर पाता है। लक्ष्य पर दृष्टि रखो, मार्गमत छोड़ो, श्रम करते रहो। अभ्यास और अनुभव कभी व्यर्थ नहीं जाता। सभा में विनोद जैन, प्रवीण जैन, अतुल जैन, दिनेश जैन, अशोक जैन, राकेश जैन, सुनील जैन शामिल रहे।
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बड़ौत। दिगम्बराचार्य विशुद्धसागर ने कहा कि सज्जन-पुरुष प्राणों से अधिक 'प्रण' को महत्त्व देते हैं। इसलिए मनुष्य को सोच-समझकर बोलना चाहिए।
जैनमुनि शनिवार को ऋषभदेव सभागार में आयोजित धर्मसभा मेें बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि गुणी-जनो का गुणानुवाद सज्जनों द्वारा ही किया जाता है। दुर्जन-पुरुष गुणी-जनो के भी गुणों का करता है। गान नहीं होता है, गुणीजनों के गुणानुवाद से सौभाग्य का जागरण पुण्य के कोश भरते हैं, पाप का क्षय होता है। संसार की सर्व-सम्पत्तियां गुरुओं के गुणगान एवं प्रभु भक्ति से सहज ही प्राप्त हो जाती हैं। सत्ता के राग में व्यक्ति सत्य का बोध नहीं कर पाता। पक्षपात, अंध-भक्ति सत्य पर पहुंचने ही नहीं देती है। कषाय युक्त मानव सत्य को नहीं कहता है। सत्य जानना, सत्य सुनना एवं सत्य-मार्ग का अनुसरण करना अत्यंत कठिन है। सत्य बोध एवं सत्याचरण श्रम-साध्य है। सत्य का अन्वेषण महा पुरुष ही कर पाते हैं। 'दृढधर्मी प्रियधर्मी' होना चाहिए। जो अपने धर्म में, जो अपनी प्रतिज्ञा में दृढ़ होता है वही लोक में प्रसिद्धि को प्राप्त होता है। अपने व्रतों के प्रति अपने धर्म के प्रति समर्पण होना चाहिए। जो धर्मप्रिय होता है, वही शांति प्राप्त कर पाता है। लक्ष्य पर दृष्टि रखो, मार्गमत छोड़ो, श्रम करते रहो। अभ्यास और अनुभव कभी व्यर्थ नहीं जाता। सभा में विनोद जैन, प्रवीण जैन, अतुल जैन, दिनेश जैन, अशोक जैन, राकेश जैन, सुनील जैन शामिल रहे।