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Baghpat News: वेस्ट प्लास्टिक से बनेंगी गुड़िया, बच्चों के चेहरों पर लाएगी मुस्कान
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बागपत। यहां वेस्ट प्लास्टिक से पर्यावरण प्रदूषण नहीं होगा, बल्कि उससे गुड़िया बनाई जाएंगी। इन गुड़िया से बच्चे खेलेंगे और उनके चेहरे पर मुस्कान आएगी। ‘नन्ही कली’ के नाम से इस अभियान की शुरुआत 19 मार्च को मवीकलां के एक बैंक्वेट हॉल में विश्व चैंपियन बॉक्सर मैरीकॉम करेंगी।
‘नन्ही कली’ गुड़िया की खासियत यह है कि इसे बनाने में पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखा गया है। गुड़िया के अंदर आमतौर पर रूई को भरा जाता है, लेकिन बागपत की इस देसी गुड़िया में वेस्ट प्लास्टिक बोतलों से बने रूई जैसे बारीक रेशों का इस्तेमाल होगा। प्लास्टिक बोतलों को बारीक फाइबर में बदलकर मुलायम कपास जैसी सामग्री बनाई जाती है और वही गुड़िया के अंदर भरी जाती है। इन गुड़िया को गांव की महिलाओं ने बनाने का कार्य शुरू कर दिया है। इससे समूह की महिलाओं को ज्यादा जोड़ा जाएगा। कपड़े के टुकड़े, पुराने फैब्रिक और अन्य सामग्री का उपयोग कर वह गुड़िया को बनाती हैं। इससे महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनेंगी।
डीएम अस्मिता लाल ने बताया कि गांवों में पहले कपड़े से बनी गुड़िया की परंपरा थी। दादी-नानी अपने हाथों से बच्चों के लिए गुड़िया बनाती थीं और बच्चे उन्हें संभालकर रखते थे। बागपत की ‘नन्ही कली’ पहल इस पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करने का प्रयास भी है। इससे पर्यावरण संरक्षण होगा और बच्चों को गुड़िया मिलने पर उनके चेहरे पर मुस्कान आएगी। अधिकतर खिलौने विदेशी संस्कृति से प्रभावित होते हैं, मगर यह पूरी तरह से देसी है।
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‘नन्ही कली’ गुड़िया की खासियत यह है कि इसे बनाने में पर्यावरण संरक्षण का ध्यान रखा गया है। गुड़िया के अंदर आमतौर पर रूई को भरा जाता है, लेकिन बागपत की इस देसी गुड़िया में वेस्ट प्लास्टिक बोतलों से बने रूई जैसे बारीक रेशों का इस्तेमाल होगा। प्लास्टिक बोतलों को बारीक फाइबर में बदलकर मुलायम कपास जैसी सामग्री बनाई जाती है और वही गुड़िया के अंदर भरी जाती है। इन गुड़िया को गांव की महिलाओं ने बनाने का कार्य शुरू कर दिया है। इससे समूह की महिलाओं को ज्यादा जोड़ा जाएगा। कपड़े के टुकड़े, पुराने फैब्रिक और अन्य सामग्री का उपयोग कर वह गुड़िया को बनाती हैं। इससे महिलाएं भी आत्मनिर्भर बनेंगी।
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डीएम अस्मिता लाल ने बताया कि गांवों में पहले कपड़े से बनी गुड़िया की परंपरा थी। दादी-नानी अपने हाथों से बच्चों के लिए गुड़िया बनाती थीं और बच्चे उन्हें संभालकर रखते थे। बागपत की ‘नन्ही कली’ पहल इस पुरानी परंपरा को फिर से जीवित करने का प्रयास भी है। इससे पर्यावरण संरक्षण होगा और बच्चों को गुड़िया मिलने पर उनके चेहरे पर मुस्कान आएगी। अधिकतर खिलौने विदेशी संस्कृति से प्रभावित होते हैं, मगर यह पूरी तरह से देसी है।
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