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Baghpat News: अस्पताल में टूटती उम्मीद को मिला सहारा तो बेटा अपनी देह तपाने निकला
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बड़ौत। मेरे पापा ठीक हो जाएं भोलेनाथ...मैं अपना सबकुछ आपके चरणों में अर्पित कर दूंगा। यह कोई साधारण मन्नत नहीं थी, बल्कि एक बेटे की टूटती उम्मीद के लिए वह आखिरी आस थी, जो जिंदगी के लिए जूझ रहे अपने पिता के लिए हर देवता से गुहार लगा चुका था।
सोनीपत जिले के नाहरी गांव के दीपक के पिता मनोज दिल्ली के नरेला स्थित अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती थे। हालत यह थी कि हर कोई कहने लगा था कि बचने की उम्मीद बहुत कम है। परिवार दिल्ली, सोनीपत और हरियाणा के एक-एक अस्पताल के चक्कर काटकर थक चुका था लेकिन कहीं से राहत नहीं मिली। जब डॉक्टरों की दवाई भी बेअसर हो गई तो दीपक ने हाथ जोड़कर भोलेनाथ से प्रार्थना की..अब बस आप ही सहारा हो भोलेनाथ। मेरे पिता को जीवनदान दे दो, मैं हरिद्वार से कांवड़ लेकर आऊंगा और वह भी अपनी देह को भूमि से सटाकर।
भोलेनाथ की कृपा से लौटी पिता की सांस
दीपक ने बताया कि पिता की तबीयत धीरे-धीरे सुधरने लगी। जिस बीमारी ने महीनों परेशान किया, वह अब काबू में थी। अस्पताल से छुट्टी मिल गई। पिता की मुस्कान लौट आई और दीपक के अंदर से आवाज आई कि अब तो वादा निभाना है।
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बिना किसी सहारे जमीन पर लेटकर लाते हैं कांवड़
दीपक ने सिर्फ वादा नहीं निभाया, बल्कि शिवभक्ति की वह मिसाल पेश की, जो देखने वालों की आंखें नम कर दे। वह हरिद्वार से पैदल कांवड़ नहीं ला रहे बल्कि बिना किसी लाठी के सहारे जमीन पर लेटते हैं। कुछ दूरी तक पेट के बल लेटकर फिर खड़े होते हैं और फिर अपने शरीर के जितनी दूरी तय करके दोबारा से लेटते हैं। यह क्रम हर कदम पर दोहराया जा रहा है।
भोलेनाथ की महिमा अपरंपार
दीपक कहते हैं कि भोलेनाथ की महिमा अपरंपार है। जब भक्त सच्चे मन से भगवान भोलेनाथ को पुकारता है तो वह संजीवनी बन जाते हैं। दीपक की यह यात्रा शिवभक्ति की सिर्फ एक मिसाल नहीं, बल्कि आज के युग में श्रद्धा, पुत्रधर्म और भगवान में अटूट आस्था की जीवंत तस्वीर बन चुकी है
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सोनीपत जिले के नाहरी गांव के दीपक के पिता मनोज दिल्ली के नरेला स्थित अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती थे। हालत यह थी कि हर कोई कहने लगा था कि बचने की उम्मीद बहुत कम है। परिवार दिल्ली, सोनीपत और हरियाणा के एक-एक अस्पताल के चक्कर काटकर थक चुका था लेकिन कहीं से राहत नहीं मिली। जब डॉक्टरों की दवाई भी बेअसर हो गई तो दीपक ने हाथ जोड़कर भोलेनाथ से प्रार्थना की..अब बस आप ही सहारा हो भोलेनाथ। मेरे पिता को जीवनदान दे दो, मैं हरिद्वार से कांवड़ लेकर आऊंगा और वह भी अपनी देह को भूमि से सटाकर।
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भोलेनाथ की कृपा से लौटी पिता की सांस
दीपक ने बताया कि पिता की तबीयत धीरे-धीरे सुधरने लगी। जिस बीमारी ने महीनों परेशान किया, वह अब काबू में थी। अस्पताल से छुट्टी मिल गई। पिता की मुस्कान लौट आई और दीपक के अंदर से आवाज आई कि अब तो वादा निभाना है।
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बिना किसी सहारे जमीन पर लेटकर लाते हैं कांवड़
दीपक ने सिर्फ वादा नहीं निभाया, बल्कि शिवभक्ति की वह मिसाल पेश की, जो देखने वालों की आंखें नम कर दे। वह हरिद्वार से पैदल कांवड़ नहीं ला रहे बल्कि बिना किसी लाठी के सहारे जमीन पर लेटते हैं। कुछ दूरी तक पेट के बल लेटकर फिर खड़े होते हैं और फिर अपने शरीर के जितनी दूरी तय करके दोबारा से लेटते हैं। यह क्रम हर कदम पर दोहराया जा रहा है।
भोलेनाथ की महिमा अपरंपार
दीपक कहते हैं कि भोलेनाथ की महिमा अपरंपार है। जब भक्त सच्चे मन से भगवान भोलेनाथ को पुकारता है तो वह संजीवनी बन जाते हैं। दीपक की यह यात्रा शिवभक्ति की सिर्फ एक मिसाल नहीं, बल्कि आज के युग में श्रद्धा, पुत्रधर्म और भगवान में अटूट आस्था की जीवंत तस्वीर बन चुकी है