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आधुनिकता की चकाचौंध में गुम हो रही सांस्कृतिक विरासत
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रागिनी कार्यक्रम में रागिनी प्रस्तुत करते गायक बिट्टू फौजी का फाइल फोटो
- फोटो : BARAUT
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आधुनिकता की चकाचौंध में गुम हो रही सांस्कृतिक विरासत
बड़ौत (बागपत)। भले ही हम इंटरनेट, ऑनलाइन, मोबाइल फोन ने हमें तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है, लेकिन आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में हमारी लोक कलाएं और सांस्कृतिक विरासतें गुम हो रहीं हैं। हमें अपनी परंपराओं को संजोने की जरूरत है।
लोग अपनी परंपराओं, लोक कला, लोक गीतों को भुलाते जा रहे हैं। ग्रामीणों के के लिए मनोरंजन का साधन माने जाने वाली रागिनी, मल्हार आदि लोकगीतों के संवाहक नहीं रह गए हैं। इन परंपराओं का दौर लगभग खत्म होता जा रहा है। इनसे जुड़े हुए गिने चुने कलाकार इसे आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। नई पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में इनमें कोई रुचि नहीं ले रही है। जिस कारण कलाकार भी परेशान हैं। विश्व एथनिक दिवस मनाकर लोक कला, लोक संस्कृति के संरक्षण का प्रयास किया जा रहा है।
- ये बोले रागिनी से जुडे़ कलाकार
रागिनी से जुडे़ कलाकार धर्मेंद्र तोमर हिलवाड़ी का कहना है कि दो दशक से नगर व देहात क्षेत्र में रागिनी का आयोजन करते आ रहे हैं, लेकिन पिछले पांच साल से रागिनी के प्रति लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो फिर भी कभी-कभार बुजुर्ग लोग रागिनी करा लेते हैं, लेकिन शहरी क्षेत्र में कार्यक्रम होने बंद हो गए हैं।
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गुलशन खड़ाना रागिनी कार्यक्रम में तबला बजाने का काम करते हैं, लेकिन जब से रागिनी का दौर खत्म होने की कगार पर है, उनका रोजगार भी लगभग बंद होता जा रहा है। गुलशन ने बताया कि पहले एक माह में 20 से 25 कार्यक्रम हुआ करते थे, लेकिन आज माह में चार या पांच कार्यक्रम होना भी बहुत बढ़ी बात है।
लोगों की आपसी रंजिश भी बना कारण
बिटटू फौजी भी पारंपरिक लोक लोक कला व संगीत से जुडे़ कलाकार है। उनका कहना है कि अब पहले जैसी बात नहीं रह गई है। अब तो गांव-गांव लोग आपसी रंजिश रखते हैं, किसी गांव में कार्यक्रम होता भी है तो विपक्ष के लोग कार्यक्रम का खराब करने की कोशिश में जुटे रहते हैं।
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बड़ौत (बागपत)। भले ही हम इंटरनेट, ऑनलाइन, मोबाइल फोन ने हमें तकनीकी क्षेत्र में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया है, लेकिन आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध में हमारी लोक कलाएं और सांस्कृतिक विरासतें गुम हो रहीं हैं। हमें अपनी परंपराओं को संजोने की जरूरत है।
लोग अपनी परंपराओं, लोक कला, लोक गीतों को भुलाते जा रहे हैं। ग्रामीणों के के लिए मनोरंजन का साधन माने जाने वाली रागिनी, मल्हार आदि लोकगीतों के संवाहक नहीं रह गए हैं। इन परंपराओं का दौर लगभग खत्म होता जा रहा है। इनसे जुड़े हुए गिने चुने कलाकार इसे आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। नई पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में इनमें कोई रुचि नहीं ले रही है। जिस कारण कलाकार भी परेशान हैं। विश्व एथनिक दिवस मनाकर लोक कला, लोक संस्कृति के संरक्षण का प्रयास किया जा रहा है।
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- ये बोले रागिनी से जुडे़ कलाकार
रागिनी से जुडे़ कलाकार धर्मेंद्र तोमर हिलवाड़ी का कहना है कि दो दशक से नगर व देहात क्षेत्र में रागिनी का आयोजन करते आ रहे हैं, लेकिन पिछले पांच साल से रागिनी के प्रति लोगों का रुझान कम होता जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो फिर भी कभी-कभार बुजुर्ग लोग रागिनी करा लेते हैं, लेकिन शहरी क्षेत्र में कार्यक्रम होने बंद हो गए हैं।
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गुलशन खड़ाना रागिनी कार्यक्रम में तबला बजाने का काम करते हैं, लेकिन जब से रागिनी का दौर खत्म होने की कगार पर है, उनका रोजगार भी लगभग बंद होता जा रहा है। गुलशन ने बताया कि पहले एक माह में 20 से 25 कार्यक्रम हुआ करते थे, लेकिन आज माह में चार या पांच कार्यक्रम होना भी बहुत बढ़ी बात है।
लोगों की आपसी रंजिश भी बना कारण
बिटटू फौजी भी पारंपरिक लोक लोक कला व संगीत से जुडे़ कलाकार है। उनका कहना है कि अब पहले जैसी बात नहीं रह गई है। अब तो गांव-गांव लोग आपसी रंजिश रखते हैं, किसी गांव में कार्यक्रम होता भी है तो विपक्ष के लोग कार्यक्रम का खराब करने की कोशिश में जुटे रहते हैं।

रागिनी गायक गुलशन खड़ाना- फोटो : BARAUT

रागिनी गायक धर्मेंद्र तोमर हिलवाड़ी का फाइल फोटो- फोटो : BARAUT