विधानसभा चुनाव 2022: चौधरी परिवार के गढ़ छपरौली में और अधिक रोमांचक होगा मुकाबला, पिछली बार मामूली अंतर से जीती थी भाजपा
छपरौली विधानसभा सीट से किसानों के मसीहा कहे जाने वाले चौधरी चरण सिंह ने लगातार 40 साल तक विधायक रहकर छपरौली को रालोद के लिए अभेद किला बनाया। वह छपरौली से विधायक रहते हुए मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, फिर केंद्र की राजनीति में पहुंचकर प्रधानमंत्री भी बने। पिछली बार की बात करें तो इस सीट पर जीत का अंतर काफी कम रहा, इस बार जातीय गणित बिगड़ने से मुकाबला और अधिक रोमांचक होगा।
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विस्तार
किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह बागपत की छपरौली विधानसभा सीट से से लगातार 40 साल तक विधायक रहे। चौधरी साहब पहली बार 1937 में छपरौली विधानसभा सीट से विधायक बने थे। इसके बाद वह लगातार 1977 तक जीत दर्ज करते रहे। इसके बाद खुद अपनी मर्जी से इस विधानसभा सीट को छोड़ा और वह केंद्र की राजनीति में पहुंच गए। इस सीट से विधायक रहते हुए ही वह प्रदेश के मुख्यमंत्री तक रहे। देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने में यहां के लोगों का अहम योगदान रहा। एक तरह से कहा जाए तो इस विधानसभा सीट पर 84 साल से चौधरी परिवार और रालोद का कब्जा है।
बागपत, बड़ौत में छोड़ा साथ, छपरौली डटा रहा
बागपत को जहां पहले रालोद का गढ़ कहा जाता है, वहीं पिछले दो विधानसभा चुनाव से यह गढ़ टूट रहा है। बागपत व बड़ौत विधानसभा सीट वर्ष 2012 में बसपा के खाते में पहुंच गई तो वर्ष 2017 में दोनों सीटों पर कमल खिला। इसके बाद भी छपरौली के वोटर अड़े रहे और दोनों बार रालोद का विधायक बनाया। यह भी उस हालत में हुआ, जब वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला और छपरौली ने रालोद का साथ नहीं छोड़ा।
जातीय गणित बिगड़ने से रोमांचक होगा मुकाबला
छपरौली सीट से अभी तक जिस तरह से राजनीतिक दलों ने प्रत्याशी घोषित किए है या जिनके नाम पर चर्चा चल रही है, उसे देखते हुए इस सीट का चुनाव भी रोमांचक होगा। रालोद के लिए जीत का सबसे बड़ा आधार जाट-मुस्लिम रहा है।
अभी तक इस सीट से आप ने डॉ. राजेंद्र खोखर और कांग्रेस ने डॉ. यूनुस को प्रत्याशी बनाया है, जिनमें एक जाट व दूसरे मुस्लिम है। इसके अलावा बसपा में मुस्लिम प्रत्याशी के नाम पर चर्चा चल रही है। जबकि रालोद से जाट प्रत्याशी को मैदान में उतारा जाना तय है तो भाजपा के मौजूदा विधायक सहेंद्र सिंह रमाला भी जाट है। ऐसे में छपरौली का चुनाव कांटे का रहेगा।
प्रचार तक की नहीं पड़ती थी जरूरत
छपरौली कस्बे के रहने वाले 88 वर्षीय जगत सिंह बताते है कि पहले बुजुर्ग आपस में बैठकर तय करते थे कि आखिर किस प्रत्याशी को वोट दिया जाए जो समाज व क्षेत्र के लिए बेहतर होगा। लोग अपने विचार रखते थे और उसमें प्रत्याशी का नाम तय हो जाता था। इसके बाद सभी उसके पक्ष में अपनी वोट कर देते थे। तुगाना गांव के रहने वाले 85 वर्षीय देशपाल सिंह बताते है कि आज माहौल बदल गया है। चुनाव में पैसे की चमक दिखाई देती है, जबकि पहले लोग चंदा एकत्र करके कुछ खर्च के लिए देते थे। चौधरी चरण सिंह के समय में प्रचार की जरूरत तक नहीं पड़ती थी।
कौन-कौन कब रहा विधायक
वर्ष विधायक
1937-1977 चौधरी चरण सिंह
1977 नरेंद्र सिंह
1980 सरोज देवी
1988 नरेंद्र सिंह
1989 नरेंद्र सिंह
1991 प्रो. महक सिंह
1993 नरेंद्र सिंह
1998 गजेंद्र मुन्ना
2000 अजय कुमार
2007 डा. अजय तोमर
2012 वीरपाल राठी
2017 सहेंद्र सिंह रमाला
आंकड़ों में मतदाता
मतदाता 333078
महिला 148619
पुरुष 184455
अन्य 4
जातिगत आंकड़े
जाट 1 लाख 30 हजार
मुस्लिम 60 हजार
कश्यप 25 हजार
दलित 20 हजार
गुर्जर 15 हजार
मतदान केंद्र
मतदेय स्थल 368
मतदान केंद्र 205