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माता महाकाली के दर्शन से हो जाती है मन्नतें पूरी
Updated Fri, 22 Sep 2017 01:11 AM IST
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बागपत। नवरात्र में मां दुर्गा के अलग-अलग रूपों की पूजा होती है। शहर में यमुना किनारे स्थित शालिगराम मंदिर में भी लोग पूजा के लिए पहुंचने शुरू हो गए हैं। यहां महाकाली की विशाल मूर्ति हैं। मंदिर में अष्टमी पर यज्ञ होता है।
शहर में प्राचीन शालिगराम मंदिर है, इसमें माता महाकाली विराजमान है। मंदिर का इतिहास कई सौ साल पूरा है। पहले मंदिर कच्चे घाट के नाम से प्रसिद्ध था। बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और यहां पर महाकाली की मूर्ति को स्थापित कराया। मान्यता है यहां सच्चे मन से मन्नते मांगने पर पूरी हो जाती है। नवरात्र की अष्टमी में कई साल से मंदिर में हवन होता है । माता की आराधना की जाती है। मंदिर समिति के विशंबर दयाल, गगन गौड़, पुनीत शर्मा, अनिल गुप्ता बताते है मंदिर का इतिहास तो 600-700 साल पुराना है। पहले मंदिर को कच्चा घाट कडियूगट्टा से जाना जाता था। यमुना मंदिर के पीछे बहती थी। साधु तपस्या और योग साधना करते थे। अब शालिगराम मंदिर के साथ-साथ काली मंदिर से भी विख्यात है। दूर दराज से लोग पूजा अर्चना के लिए पहुंचते हैं। अष्टमी पर विशेष पूजा और हवन होता है। इसका अलग ही महत्व है।
भगवान विष्णु का रूप है शालिगराम
मंदिर के पुजारी राकेश शास्त्री के अनुसार शालिगराम भगवान विष्णु का एक रूप है। जिनकी उत्पत्ति गंडगी नदी से हुई थी। प्राचीन कथाओं के अनुसार बृंदा ने भगवान शालिगराम को श्राप दिया, इसके बाद भगवान विष्णु ने बृंदा को पौधे बन जाने का श्राप दिया जो तुलसी के नाम से प्रसिद्ध हुई। शालिगराम मंदिर प्राचीन कथाओं से जुड़ा हुआ है। जो सत्य है। मंदिर का इतिहास काफी पुराना है।
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शहर में प्राचीन शालिगराम मंदिर है, इसमें माता महाकाली विराजमान है। मंदिर का इतिहास कई सौ साल पूरा है। पहले मंदिर कच्चे घाट के नाम से प्रसिद्ध था। बाद में इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और यहां पर महाकाली की मूर्ति को स्थापित कराया। मान्यता है यहां सच्चे मन से मन्नते मांगने पर पूरी हो जाती है। नवरात्र की अष्टमी में कई साल से मंदिर में हवन होता है । माता की आराधना की जाती है। मंदिर समिति के विशंबर दयाल, गगन गौड़, पुनीत शर्मा, अनिल गुप्ता बताते है मंदिर का इतिहास तो 600-700 साल पुराना है। पहले मंदिर को कच्चा घाट कडियूगट्टा से जाना जाता था। यमुना मंदिर के पीछे बहती थी। साधु तपस्या और योग साधना करते थे। अब शालिगराम मंदिर के साथ-साथ काली मंदिर से भी विख्यात है। दूर दराज से लोग पूजा अर्चना के लिए पहुंचते हैं। अष्टमी पर विशेष पूजा और हवन होता है। इसका अलग ही महत्व है।
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भगवान विष्णु का रूप है शालिगराम
मंदिर के पुजारी राकेश शास्त्री के अनुसार शालिगराम भगवान विष्णु का एक रूप है। जिनकी उत्पत्ति गंडगी नदी से हुई थी। प्राचीन कथाओं के अनुसार बृंदा ने भगवान शालिगराम को श्राप दिया, इसके बाद भगवान विष्णु ने बृंदा को पौधे बन जाने का श्राप दिया जो तुलसी के नाम से प्रसिद्ध हुई। शालिगराम मंदिर प्राचीन कथाओं से जुड़ा हुआ है। जो सत्य है। मंदिर का इतिहास काफी पुराना है।
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