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काठा गांव का दो हजार बीघा रकबा यमुना नदी के उस पार
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बागपत। काठा गांव में फिर मातम है। इस बार नाव नहीं डूबी... भैंसा और बुग्गी पलट गई। पहले भी किसानों को खेतों तक जाना था और इस बार भी मौत से मुकाबला करते किसान खेत में ही जा रहे हैं। फिर साबित हो गया कि सिस्टम अंधा भी है और बहरा भी। 19 लोगों की मौत के 19 महीने बाद सिर्फ गांव के बाहर चेतावनी बोर्ड लगाया। रकबा यमुना के पार है। किसान कहते हैं कि उन्हें या तो यमुना के इस पार ही जमीन दिला दी जाए या फिर गांव के सामने अस्थायी पुल का निर्माण किया जाए। प्रशासन को किसी बड़ी नाव का इंतजाम करना चाहिए।
बागपत के काठा गांव के किसानों की दो हजार बीघा जमीन यमुना नदी के पार है। सैकड़ों किसान और मजदूर रोजाना मौत से मुकाबला करते हुए नदी पार करते हैं। आए दिन हादसे होते हैं। नाव डूबी तब भी किसान खेतों में जा रहे थे और बुग्गी डूबी तब भी खेतों में जा रहे थे। किसान राममेहर, कृष्णपाल, सुरेश, सूरज ने कहा कि डीएम, एसडीएम और अन्य तमाम अधिकारियों को प्रार्थना पत्र दिए जा चुके हैं। मौके पर पहुंचे डीएम पवन कुमार से अस्थायी पुल के निर्माण की मांग की।
इसलिए चुना था मवी कलां का रास्ता
बागपत। किसानों ने बताया कि ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे के निर्माण के समय मवी कलां गांव के पास यमुना नदी में अस्थायी पुल बनाया गया था। तभी से किसान इसी जगह से नदी पार करने लगे। किसानों ने कई बार प्रशासन को प्रार्थना पत्र देकर एक्सप्रेस-वे से रास्ता बनवाने की मांग की, लेकिन अनदेखी की गई।
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कैसे छोड़ दें दो हजार बीघा जमीन
बागपत। किसान राहुल, रामपाल का कहना है कि दो हजार बीघा जमीन से सैकड़ों किसान मजदूरों के घर चलते हैं, लेकिन प्रशासन मामले की गंभीरता नहीं समझ रहा है। काठा गांव के किसान और मजदूर अगर अपने गांव के सामने से यमुना पार कर खेतों में जाएं तो दस मिनट का समय लगता है,। लेकिन अगर ग्रामीणों को गौरीपुर मोड़ के पुल से घूमकर खेतों तक जाना पड़े तो एक चक्कर करीब 70 किमी का बैठता है। यही वजह है कि किसान और मजदूर यमुना पार करने को ही तरजीह देते हैं।
विकल्प कई, लेकिन कौन बनें भगीरथ
बागपत। गौरीपुर का पुल दूर है, लेकिन इसके अलावा भी कई विकल्प है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को एक बड़ी नाव और इसके संचालन के लिए प्रशिक्षित नाविक का इंतजाम करना चाहिए। ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे पर यदि यमुना पुल के दोनों और किसानों को कट मिल जाए तो समस्या का समाधान हो जाएगा। गांव के सामने पुल का निर्माण कराया जाना चाहिए।
नाव हटाई, 19 माह बाद भी इंतजाम नहीं
बागपत। पुलिस ने सितंबर 2017 में 19 लोगों की मौत के बाद से यहां से नाव हटवा दी थी। लेकिन 19 माह बाद भी किसानों के पास खेतों में जाने के लिए कोई विकल्प नहीं है। अगर किसी किसान को खेत में जाना पड़ेगा, तो 70 किमी का फेर लगाना ही पड़ेगा।
धार से बदल जाते हैं खेत
बागपत। यमुना की धार के साथ किसानों के खेत और रकबा बदलता है। बागपत के किसानों को यमुना के पार जाना पड़ता है। रकबे का फैसला करने के लिए उमा शंकर दीक्षित अवार्ड बनाया, लेकिन अवार्ड के 42 साल बाद भी जमीन को लेकर फैसला नहीं हो सका है। रकबे की पैमाइश के लिए 14 फरवरी 1975 को तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री उमा शंकर दीक्षित की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया। 15 सितंबर 1975 को यह अवार्ड जारी किया, दोनों राज्यों के बीच रिकॉर्ड का आदान प्रदान हुआ, लेकिन विवाद जारी हैं। यूपी और हरियाणा के किसानों के बीच विवाद रहता है। फसलों की बुआई और कटाई के दौरान दोनों प्रदेशों के किसान आमने-सामने आ जाते हैं। इसके अलावा यूपी के किसानों के साथ आए दिन हादसे होते हैं।
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बागपत के काठा गांव के किसानों की दो हजार बीघा जमीन यमुना नदी के पार है। सैकड़ों किसान और मजदूर रोजाना मौत से मुकाबला करते हुए नदी पार करते हैं। आए दिन हादसे होते हैं। नाव डूबी तब भी किसान खेतों में जा रहे थे और बुग्गी डूबी तब भी खेतों में जा रहे थे। किसान राममेहर, कृष्णपाल, सुरेश, सूरज ने कहा कि डीएम, एसडीएम और अन्य तमाम अधिकारियों को प्रार्थना पत्र दिए जा चुके हैं। मौके पर पहुंचे डीएम पवन कुमार से अस्थायी पुल के निर्माण की मांग की।
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इसलिए चुना था मवी कलां का रास्ता
बागपत। किसानों ने बताया कि ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे के निर्माण के समय मवी कलां गांव के पास यमुना नदी में अस्थायी पुल बनाया गया था। तभी से किसान इसी जगह से नदी पार करने लगे। किसानों ने कई बार प्रशासन को प्रार्थना पत्र देकर एक्सप्रेस-वे से रास्ता बनवाने की मांग की, लेकिन अनदेखी की गई।
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कैसे छोड़ दें दो हजार बीघा जमीन
बागपत। किसान राहुल, रामपाल का कहना है कि दो हजार बीघा जमीन से सैकड़ों किसान मजदूरों के घर चलते हैं, लेकिन प्रशासन मामले की गंभीरता नहीं समझ रहा है। काठा गांव के किसान और मजदूर अगर अपने गांव के सामने से यमुना पार कर खेतों में जाएं तो दस मिनट का समय लगता है,। लेकिन अगर ग्रामीणों को गौरीपुर मोड़ के पुल से घूमकर खेतों तक जाना पड़े तो एक चक्कर करीब 70 किमी का बैठता है। यही वजह है कि किसान और मजदूर यमुना पार करने को ही तरजीह देते हैं।
विकल्प कई, लेकिन कौन बनें भगीरथ
बागपत। गौरीपुर का पुल दूर है, लेकिन इसके अलावा भी कई विकल्प है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को एक बड़ी नाव और इसके संचालन के लिए प्रशिक्षित नाविक का इंतजाम करना चाहिए। ईस्टर्न पेरिफेरल एक्सप्रेस-वे पर यदि यमुना पुल के दोनों और किसानों को कट मिल जाए तो समस्या का समाधान हो जाएगा। गांव के सामने पुल का निर्माण कराया जाना चाहिए।
नाव हटाई, 19 माह बाद भी इंतजाम नहीं
बागपत। पुलिस ने सितंबर 2017 में 19 लोगों की मौत के बाद से यहां से नाव हटवा दी थी। लेकिन 19 माह बाद भी किसानों के पास खेतों में जाने के लिए कोई विकल्प नहीं है। अगर किसी किसान को खेत में जाना पड़ेगा, तो 70 किमी का फेर लगाना ही पड़ेगा।
धार से बदल जाते हैं खेत
बागपत। यमुना की धार के साथ किसानों के खेत और रकबा बदलता है। बागपत के किसानों को यमुना के पार जाना पड़ता है। रकबे का फैसला करने के लिए उमा शंकर दीक्षित अवार्ड बनाया, लेकिन अवार्ड के 42 साल बाद भी जमीन को लेकर फैसला नहीं हो सका है। रकबे की पैमाइश के लिए 14 फरवरी 1975 को तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री उमा शंकर दीक्षित की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया। 15 सितंबर 1975 को यह अवार्ड जारी किया, दोनों राज्यों के बीच रिकॉर्ड का आदान प्रदान हुआ, लेकिन विवाद जारी हैं। यूपी और हरियाणा के किसानों के बीच विवाद रहता है। फसलों की बुआई और कटाई के दौरान दोनों प्रदेशों के किसान आमने-सामने आ जाते हैं। इसके अलावा यूपी के किसानों के साथ आए दिन हादसे होते हैं।