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सिनौली में मिली तलवार, फिर ख्ुलेंगे राज
Updated Fri, 09 Mar 2018 01:12 AM IST
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बागपत। केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग उत्खनन शाखा द्वितीय और भारतीय पुरातत्व संस्थान लाल किला की टीम बरनावा के साथ सिनौली में उत्खनन का कार्य करा रही है। सिनौली में उत्खनन के दौरान बृहस्पतिवार को एक पुरानी तलवार मिली है। पुरातत्वविद इसके काल का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं। सिनौली में पहले भी हड़प्पा कालीन शवादान गृह मिल चुका है। यही वजह है कि यहां पर दोबारा उत्खनन का कार्य शुरू कराया।
केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में दिसंबर 2017 से मई 2018 तक उत्खनन कार्य को मंजूरी दी है। बरनावा में उत्खनन कार्य चल रहा है। इतिहास के पन्नों को जोड़ने के लिए पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में सिनौली में भी दोबारा उत्खनन का कार्य शुरू कराया । बृहस्पतिवार को यहां उत्खनन कार्य में सैकड़ों साल पुरानी एक तलवार मिली है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुरातत्वविद इस तलवार के काल का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं। असलियत में सिनौली में वर्ष 2005 के सितंबर माह में उत्खनन का कार्य कराया था। यहां हड़प्पा कालीन शव दान गृह मिला था। इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई थी। यही वजह है कि पुरातत्व विभाग की टीम दोबारा से यहां पर उत्खनन का कार्य करा रही है, जिससे सभ्यताओं के तार जुड़ सकें।
चंदायन और बरनावा में भी खुदाई
बागपत। वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। बरनावा के साथ पुरातत्व विभाग की टीम ने इस साइट का अवलोकन भी किया। यहां से पहले चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण भी मिल चुके हैं। बरनावा में भी गुप्त काल तक की सभ्यताओं के संकेत मिले हैं।
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बरनावा में धीमी हुई उत्खनन की चाल
बागपत। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के नेतृत्व में बरनावा में उत्खनन का कार्य चल रहा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से यहां पर उत्खनन का कार्य धीमा हो गया है। गुप्त काल तक की सभ्यता के यहां पर अवशेष मिल चुके हैं, जिसकी पुरातत्व विभाग ने पुष्टि नहीं की है। लाक्षा गृह होने के कारण महाभारत और उससे जुड़ी किवदंतियां के चलते यहां उत्खनन लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र कुुरुक्षेत्र और हस्तिानापुर के बीच में पड़ता है, इसलिए यहां के उत्खनन का कार्य शुरू हो जाने से लाक्षा गृह की हकीकत भी सामने आने की उम्मीद बनी हुई है।
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केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बरनावा में दिसंबर 2017 से मई 2018 तक उत्खनन कार्य को मंजूरी दी है। बरनावा में उत्खनन कार्य चल रहा है। इतिहास के पन्नों को जोड़ने के लिए पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के निर्देशन में सिनौली में भी दोबारा उत्खनन का कार्य शुरू कराया । बृहस्पतिवार को यहां उत्खनन कार्य में सैकड़ों साल पुरानी एक तलवार मिली है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। पुरातत्वविद इस तलवार के काल का पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं। असलियत में सिनौली में वर्ष 2005 के सितंबर माह में उत्खनन का कार्य कराया था। यहां हड़प्पा कालीन शव दान गृह मिला था। इससे इस क्षेत्र में हड़प्पा कालीन सभ्यता की पुष्टि हो गई थी। यही वजह है कि पुरातत्व विभाग की टीम दोबारा से यहां पर उत्खनन का कार्य करा रही है, जिससे सभ्यताओं के तार जुड़ सकें।
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चंदायन और बरनावा में भी खुदाई
बागपत। वर्ष 2015 में चंदायन गांव में उत्खनन का कार्य केंद्र सरकार करा चुकी है। बरनावा के साथ पुरातत्व विभाग की टीम ने इस साइट का अवलोकन भी किया। यहां से पहले चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति, कुषाण काल, गुप्त और राजपूत सभ्यताओं के प्रमाण भी मिल चुके हैं। बरनावा में भी गुप्त काल तक की सभ्यताओं के संकेत मिले हैं।
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बरनावा में धीमी हुई उत्खनन की चाल
बागपत। पुरातत्व संस्थान के निदेशक डॉ. एसके मंजुल के नेतृत्व में बरनावा में उत्खनन का कार्य चल रहा है, लेकिन पिछले कुछ दिनों से यहां पर उत्खनन का कार्य धीमा हो गया है। गुप्त काल तक की सभ्यता के यहां पर अवशेष मिल चुके हैं, जिसकी पुरातत्व विभाग ने पुष्टि नहीं की है। लाक्षा गृह होने के कारण महाभारत और उससे जुड़ी किवदंतियां के चलते यहां उत्खनन लोगों की जिज्ञासा का केंद्र बना हुआ है, क्योंकि यह पूरा क्षेत्र कुुरुक्षेत्र और हस्तिानापुर के बीच में पड़ता है, इसलिए यहां के उत्खनन का कार्य शुरू हो जाने से लाक्षा गृह की हकीकत भी सामने आने की उम्मीद बनी हुई है।